विदेश नीति किसी भी राष्ट्र की शक्ति, प्राथमिकताओं और वैश्विक दृष्टिकोण का दर्पण होती है। 21वीं सदी के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक हितों और बहुध्रुवीय विश्व की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए निरंतर अपनी विदेश नीति का विस्तार कर रहा है। इसी संदर्भ में दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत-यात्रा न केवल एक द्विपक्षीय कार्यक्रम थी, बल्कि उस दीर्घकालीन भारत-रूस मैत्री का पुनर्संयोजन भी थी जो शीत युद्ध काल से ही भारत की विदेश नीति का आधार रही है।
पुतिन की यह यात्रा एक ऐसे समय में हुई जब वैश्विक शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है—यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट, बढ़ती चीन-रूस निकटता और पश्चिमी देशों के साथ भारत के उभरते रणनीतिक संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दी है। इस यात्रा ने यह स्पष्ट किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए स्वतंत्र कूटनीतिक निर्णय लेने में सक्षम है।
भारत-रूस संबंधों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत-रूस संबंध राष्ट्रों की पारंपरिक मित्रता का एक दुर्लभ उदाहरण हैं।
- 1971 की भारत-सोवियत शांति एवं मैत्री संधि ने द्विपक्षीय संबंधों की नींव मजबूत की।
- सोवियत संघ ने भारत को परमाणु कार्यक्रम, अंतरिक्ष मिशन (क्राइओ इंजन), रक्षा आधुनिकीकरण और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया।
- रूस ने भारत की UNSC स्थायी सदस्यता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की लगातार वकालत की।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण भारत-रूस संबंध केवल सामरिक गणनाओं पर आधारित नहीं, बल्कि विश्वास, साझेदारी और दीर्घकालिक सहयोग पर टिके रहे।
यात्रा 2025 का महत्व
दिसंबर 2025 की यह यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण थी:
1. वार्षिक शिखर वार्ता की पुनः शुरुआत
COVID-19, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक तनावों के कारण कुछ वर्षों तक उच्च स्तरीय वार्ताएँ सीमित रहीं। यह वार्षिक प्रणाली पुनः सक्रिय हुई, जो स्वयं में संबंधों की स्थिरता का संकेत है।
2. अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता
यह यात्रा दिखाती है कि भारत किसी भी वैश्विक दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर कूटनीतिक निर्णय लेता है।
3. बहुध्रुवीय विश्व में भारत की सशक्त भूमिका
भारत न तो किसी पश्चिमी धुरी में शामिल होना चाहता है और न ही किसी प्रतिद्वंद्वी ब्लॉक में। पुतिन की यात्रा भारत की इस बहु-दिशात्मक विदेश नीति का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
यात्रा की मुख्य उपलब्धियाँ
1. व्यापार और आर्थिक सहयोग का विस्तार
भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा।
- ऊर्जा, उर्वरक, दवाइयों, खनिज, कृषि उत्पाद और टेक्नोलॉजी में व्यापक सहयोग की योजना बनी।
- दोनों देशों ने व्यापार में रुपये-रूबल तंत्र और वैकल्पिक भुगतान तंत्र को मजबूत करने पर चर्चा की।
2. ऊर्जा सुरक्षा में नया आयाम
रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
- इस यात्रा में LNG और दीर्घकालीन तेल-आपूर्ति समझौतों पर जोर दिया गया।
- परमाणु ऊर्जा सहयोग—कुदनकुलम के बाद नई परियोजनाओं पर भी सहमति बनी।
यह भारत की ऊर्जा विविधता और कीमत स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
3. रक्षा सहयोग का रूपांतरण
भारत-रूस रक्षा संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं, पर अब दोनों देश केवल आयात-आधारित मॉडल से आगे बढ़ रहे हैं।
- ब्रह्मोस-II, पनडुब्बी सहयोग, हेलीकॉप्टर निर्माण जैसे प्रोजेक्ट पुनः सक्रिय हुए।
- ‘Co-Production’ और ‘Co-Development’ मॉडल को प्राथमिकता दी गई, जो Make in India के अनुरूप है।
4. अंतरिक्ष, साइबर और उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग
- अंतरिक्ष तकनीक, ग्लोनास नेविगेशन सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर-सुरक्षा जैसे नए क्षेत्रों में साझेदारी विकसित हुई।
- यह भारत को 21वीं सदी की टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा में मजबूत करेगा।
5. कूटनीति और भू-राजनीतिक संवाद
दोनों देशों ने
- एशिया में सुरक्षा
- आतंकवाद
- अफगानिस्तान
- आर्कटिक सहयोग
जैसे विषयों पर सामरिक संवाद को गहराया।
यह संवाद वैश्विक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
भू-राजनीतिक संदर्भ: इस यात्रा का वैश्विक महत्व
1. रूस-चीन गठजोड़ के बीच भारत की भूमिका
रूस का चीन के साथ बढ़ता सामरिक सहयोग भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है।
ऐसे में पुतिन की भारत यात्रा यह संकेत देती है कि रूस भारत को एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में देखता है।
2. पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में संतुलन
भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ गहरे संबंध रखता है।
फिर भी भारत रूस जैसे पारंपरिक साथी से दूरी नहीं बनाना चाहता।
यह संतुलन भारत के ‘नॉन-अलाइनमेंट 2.0’ दृष्टिकोण का सार है।
3. वैश्विक दक्षिण में रूस की भूमिका और भारत का नेतृत्व
रूस भारत को ग्लोबल साउथ के नेतृत्वकर्ता के रूप में देखता है।
यह रणनीतिक तालमेल बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करता है।
भारत के लिए लाभ
1. ऊर्जा सुरक्षित और सस्ती बनी
रूस से सस्ते तेल ने भारत की महंगाई नियंत्रण नीति को स्थिर किया।
यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा लाभ है।
2. रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को गति
Co-production समझौतों से भारत अपनी रक्षा निर्भरता कम कर सकता है।
3. वैश्विक मंचों पर समर्थन
रूस भारत की UNSC स्थायी सदस्यता का समर्थन करता रहा है।
यह भारत के दीर्घकालीन सामरिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है।
4. द्विपक्षीय व्यापार का विस्तार
भारत के लिए रूसी बाजार में दवाइयाँ, कृषि उत्पाद, आईटी और मशीनरी के लिए बड़े अवसर खुले हैं।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
1. व्यापार असंतुलन
भारत के निर्यात कम और आयात अधिक हैं।
इसे संतुलित करने की आवश्यकता है।
2. पश्चिमी दबाव
अमेरिका-यूरोप रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं।
भारत को इन शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना है।
3. रूस की आर्थिक स्थिति
यूक्रेन युद्ध और प्रतिबंधों ने रूसी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है।
दीर्घकालीन सहयोग इसकी स्थिरता पर निर्भर करेगा।
4. रूस-चीन निकटता
रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए नई भू-राजनीतिक चिंताएँ पैदा कर सकती है।
आगे की राह
1. व्यापार का विविधीकरण
भारत को रूस के साथ फार्मा, आईटी, कृषि और टेक्नोलॉजी में व्यापार विस्तार करना चाहिए।
2. ऊर्जा साझेदारी का दीर्घकालीन ढांचा
दीर्घकालीन LNG और परमाणु ऊर्जा सहयोग को बढ़ाना चाहिए।
3. रक्षा सह-विकास की गति बढ़ाना
भारत को रक्षा उत्पादन और अनुसंधान में रूस के साथ संयुक्त परियोजनाएँ बढ़ानी चाहिए।
4. मल्टीलेटरल प्लेटफॉर्म्स पर सहयोग
BRICS, SCO, G20 और UN जैसे मंचों पर भारत-रूस सहयोग वैश्विक शासन को स्थिर बना सकता है।
निष्कर्ष
पुतिन की 2025 की भारत-यात्रा केवल परंपरागत मित्रता की पुनर्पुष्टि नहीं थी, बल्कि एक बदलती वैश्विक व्यवस्था में दोनों देशों द्वारा नए सिरे से रणनीतिक तालमेल विकसित करने का प्रयास भी थी। भारत ने इस यात्रा के माध्यम से यह सिद्ध किया कि वह किसी भी ध्रुव का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों पर आधारित निर्णय लेने में सक्षम है। वहीं रूस ने भी यह संदेश दिया कि भारत उसके लिए केवल एक क्षेत्रीय साझेदार नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक शक्ति है।
यह यात्रा भारत-रूस संबंधों के नए युग की शुरुआत है—एक ऐसा युग जिसमें द्विपक्षीय सहयोग पुराने रक्षा और ऊर्जा ढांचे से आगे बढ़कर व्यापार, तकनीक, अंतरिक्ष, साइबर और वैश्विक शासन के नए क्षेत्रों में विस्तारित हो रहा है। ऐसे समय में जब विश्व राजनीति तीव्र ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है, भारत और रूस के बीच संतुलित, विश्वासपूर्ण और स्वायत्त सहयोग वैश्विक स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभर सकता है।
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