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मोनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine)

मोनरो सिद्धांत अमेरिका की एक महत्वपूर्ण विदेश नीति (foreign policy) है, जिसका उद्देश्य यूरोपीय हस्तक्षेप को अमेरिकी महाद्वीपों में रोकना था।

मोनरो सिद्धांत अमेरिका की एक महत्वपूर्ण विदेश नीति (foreign policy) है, जिसका उद्देश्य यूरोपीय हस्तक्षेप को अमेरिकी महाद्वीपों में रोकना था। इस सिद्धांत का लक्ष्य यूरोपीय शक्तियों को यह चेतावनी देना था कि अमेरिका के मामलों में हस्तक्षेप न करें।

हाल ही में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (US National Security Strategy) में पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प की “लचीली यथार्थवाद” (flexible realism) की नीति का उल्लेख किया गया है और 19वीं शताब्दी के मोनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित करने की वकालत की गई है, जिसने पूरे पश्चिमी गोलार्ध को वाशिंगटन के प्रभाव क्षेत्र के रूप में घोषित किया था।

मोनरो सिद्धांत के बारे में

  • मोनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) संयुक्त राज्य अमेरिका के पाँचवें राष्ट्रपति जेम्स मोनरो द्वारा 2 दिसंबर 1823 को कांग्रेस को दिए गए अपने वार्षिक संदेश में प्रस्तुत किया गया एक ऐतिहासिक विदेश नीति वक्तव्य था।
  • यह सिद्धांत अमेरिका की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से यूरोपीय शक्तियों को अमेरिका के मामलों में हस्तक्षेप से रोकने के लिए बनाया गया था।
  • इस सिद्धांत का मसौदा विदेश मंत्री जॉन क्विंसी एडम्स (John Quincy Adams) ने तैयार किया था।
  • सिद्धांत ने यूरोप को अमेरिका के मामलों से दूर रहने की चेतावनी दी, साथ ही अमेरिका ने भी भविष्य के यूरोपीय संघर्षों में तटस्थता (neutrality) बनाए रखने का वादा किया।

मोनरो सिद्धांत की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि

  • 19वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोपीय शक्तियाँ विशेषकर स्पेन, फ्रांस और रूस लैटिन अमेरिका के नवस्वतंत्र राष्ट्रों पर फिर से नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास कर रही थीं।
  • ब्रिटेन और अमेरिका दोनों को यह भय था कि यूरोप के औपनिवेशिक इरादे पश्चिमी गोलार्ध की स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकते हैं।
  • इसी संदर्भ में ब्रिटिश विदेश मंत्री जॉर्ज कैनिंग (George Canning) ने अमेरिका को एक संयुक्त घोषणा का सुझाव दिया।
  • हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन क्विंसी एडम्स (John Quincy Adams) ने स्वतंत्र अमेरिकी नीति की वकालत की और अंततः राष्ट्रपति मोनरो ने अमेरिका की ओर से एकपक्षीय घोषणा जारी की जो “मोनरो सिद्धांत” के रूप में प्रसिद्ध हुई।

1820 के दशक में यूरोपीय शक्तियाँ फिर से अमेरिका में अपने प्रभाव को स्थापित करने की कोशिश कर रही थीं।

  • रूस अलास्का क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था।
  • स्पेन अपने पुराने उपनिवेशों पर फिर से नियंत्रण चाहता था।
  • ब्रिटेन अमेरिका के राजनीतिक और आर्थिक भविष्य में प्रमुख भूमिका निभाना चाहता था।

इन परिस्थितियों ने अमेरिका को यह सिद्धांत अपनाने के लिए प्रेरित किया ताकि वह स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय (self-determination) के पक्ष में खड़ा रह सके।

मोनरो सिद्धांत के चार मुख्य सिद्धांत

  1. अमेरिका यूरोपीय शक्तियों के आंतरिक मामलों या उनके युद्धों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  2. अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में पहले से मौजूद यूरोपीय उपनिवेशों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  3. पश्चिमी गोलार्ध (Western Hemisphere) भविष्य में किसी भी नए उपनिवेशीकरण के लिए बंद रहेगा।
  4. यदि कोई यूरोपीय शक्ति अमेरिका के किसी राष्ट्र पर नियंत्रण या हस्तक्षेप का प्रयास करेगी, तो उसे अमेरिका के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कदम माना जाएगा।

सिद्धांत का अनुप्रयोग और विस्तार

19वीं शताब्दी में सीमित प्रभाव: 1823 में अमेरिका सैन्य रूप से इतना मजबूत नहीं था कि वह पूरे पश्चिमी गोलार्ध की रक्षा कर सके, इसलिए प्रारंभिक वर्षों में यह सिद्धांत प्रतीकात्मक रहा। अमेरिका ने 1833 में फॉकलैंड द्वीपों पर ब्रिटिश कब्ज़े या लैटिन अमेरिका में ब्रिटिश विस्तार का विरोध नहीं किया।

राष्ट्रपति जेम्स के. पोल्क (1845–1848): पोल्क ने “मैनिफेस्ट डेस्टिनी (Manifest Destiny)” की विचारधारा के तहत मोनरो सिद्धांत की नई व्याख्या की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूरोपीय देशों को अमेरिका के क्षेत्रीय विस्तार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

गृहयुद्ध और फ्रांस पर दबाव (1867): अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद अमेरिका ने मेक्सिको में फ्रांसीसी कठपुतली शासन के विरुद्ध दबाव बनाया। अंततः फ्रांस ने 1867 में अपनी सेनाएँ वापस बुला लीं, जो इस सिद्धांत की वास्तविक सफलता मानी गई।

रूजवेल्ट परिशिष्ट (Roosevelt Corollary, 1904): राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने मोनरो सिद्धांत को और आगे बढ़ाते हुए घोषणा की कि “यदि कोई लैटिन अमेरिकी देश बार-बार अनुचित व्यवहार करता है या अपने कर्ज़ों का भुगतान नहीं करता, तो अमेरिका को उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है।”

यह “Big Stick Policy” के नाम से प्रसिद्ध हुआ और अमेरिका की अर्धपुलिस शक्ति का द्योतक बना।

ऐतिहासिक प्रभाव

  • 19वीं शताब्दी के मध्य में अमेरिका ने इस सिद्धांत का उपयोग अपने साम्राज्यवादी प्रभाव (imperialistic influence) को बढ़ाने के लिए किया।
  • 1898 के स्पेनअमेरिका युद्ध (Spanish-American War) में पहली बार अमेरिका ने किसी यूरोपीय शक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की।
  • यह सिद्धांत 19वीं शताब्दी में अमेरिकी अलगाववादी नीति (Isolationism) की नींव बन गया।
  • 1930 के दशक के बाद, अमेरिका ने इस नीति को सहयोगी दृष्टिकोण से बदलने की कोशिश की और अमेरिकन स्टेट्स संगठन (OAS) के साथ परामर्श शुरू किया।
  • 20वीं शताब्दी के दो विश्व युद्धों ने अमेरिका को एक वैश्विक शक्ति (global power) के रूप में उभरने के लिए प्रेरित किया।

 


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