मुनरो सिद्धांत संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति का एक आधारभूत दस्तावेज है, जिसकी घोषणा 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने की थी। यह सिद्धांत पश्चिमी गोलार्द्ध को अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र घोषित करता है और यूरोपीय शक्तियों को इस क्षेत्र में हस्तक्षेप से रोकता है। आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में, विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में, यह सिद्धांत पुनर्जीवित हो रहा है, जो अमेरिकी प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
यह सिद्धांत 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में उभरा, जब लैटिन अमेरिकी देश स्पेन और पुर्तगाल से स्वतंत्र हो रहे थे। मुनरो ने अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि अमेरिकी महाद्वीप अब यूरोपीय उपनिवेशवाद के लिए बंद हैं। इसका मूल मंत्र “अमेरिका अमेरिकियों के लिए” था, जो अमेरिका को इस गोलार्ध का संरक्षक बनाता है। रूस के वैंकूवर के उत्तर में दावों और यूरोपीय पुनःउपनिवेशीकरण की आशंकाओं ने इसे जन्म दिया। नेपोलियन युद्धों के बाद यूरोपीय पवित्र गठबंधन की सक्रियता ने भी अमेरिका को सतर्क किया।
सिद्धांत के तीन मुख्य सिद्धांत थे: पहला, अमेरिकी महाद्वीपों को भविष्य के यूरोपीय उपनिवेशों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दूसरा, यूरोपीय राजनीतिक प्रणाली अमेरिकी गोलार्ध से भिन्न है, इसलिए उसका विस्तार खतरनाक होगा। तीसरा, मौजूदा यूरोपीय उपनिवेशों को सहन किया जाएगा, लेकिन नए हस्तक्षेप को शत्रुता माना जाएगा। जॉन क्विंसी एडम्स ने इसका मसौदा तैयार किया, जो अमेरिकी विस्तारवाद का प्रतीक बना।
मुनरो सिद्धांत का ऐतिहासिक विकास:
1845 में राष्ट्रपति जेम्स पोल्क ने इसे पहली बार व्यावहारिक रूप से लागू किया, जब टेक्सास और ओरेगोन के विलय को उचित ठहराया। कैलिफोर्निया पर ब्रिटिश दावों का विरोध और मेक्सिको युद्ध में इसका उपयोग हुआ। 19वीं शताब्दी के अंत में, थियोडोर रूजवेल्ट ने “रूजवेल्ट सहायक” जोड़ा, जो आक्रामक हस्तक्षेप की अनुमति देता था। वेनेजुएला संकट में ब्रिटेन के दावों पर अमेरिका ने दबाव डाला।

20वीं शताब्दी में, यह सिद्धांत लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप का औजार बना। 1903 में पनामा नहर का निर्माण, डोमिनिकन गणराज्य पर नियंत्रण, और क्यूबा, निकारागुआ में सैन्य कार्रवाइयां इसके उदाहरण हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विल्सन ने इसे वैश्विक लोकतंत्र से जोड़ा, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में यह पीछे हट गया। 1933 में फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने “अच्छा पड़ोसी नीति” से गैर-हस्तक्षेप पर जोर दिया, जो संगठन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स के माध्यम से बहुपक्षवाद को बढ़ावा देता था।
शीत युद्ध काल में, सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए इसका पुनरुत्थान हुआ। 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट में जॉन एफ. कैनेडी ने इसे आधार बनाया। हालांकि, 1960-70 के दशक में लैटिन अमेरिकी देशों ने इसे साम्राज्यवादी बताकर अस्वीकार किया। सिमोन बोलिवर की पनामा कांग्रेस ने 1826 में इसका विरोध दर्ज किया था। कुल मिलाकर, यह अमेरिकी वर्चस्व का प्रतीक रहा।
आलोचनाएं और सीमाएं
मुनरो सिद्धांत को साम्राज्यवादी और एकतरफा माना जाता है। लैटिन अमेरिकी नेताओं ने इसे “यांकी साम्राज्यवाद” कहा, क्योंकि यह अमेरिकी हस्तक्षेप को वैध बनाता था। 1898 के बाद बहुपक्षवाद की मांग बढ़ी, लेकिन अमेरिका ने अक्सर इसे नजरअंदाज किया। यूरोपीय शक्तियों ने शुरू में इसे गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि अमेरिका तब कमजोर था।
इसकी कमजोरी अमेरिकी सैन्य शक्ति की कमी थी। ब्रिटिश नौसेना ने अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन किया। आधुनिक संदर्भ में, यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के गैर-हस्तक्षेप सिद्धांत से टकराता है। लैटिन अमेरिका में चोआ गिलिबर्टो जैसे विद्वानों ने इसे पुनर्व्याख्या की मांग की। फिर भी, यह अमेरिकी विदेश नीति का स्थायी हिस्सा बना रहा।
ट्रंप युग में पुनरुत्थान
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में, 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने मुनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित किया। दस्तावेज में “ट्रंप सहायक” का उल्लेख है, जो पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व बहाल करने पर जोर देता है। वेनेजुएला, क्यूबा और कैरेबियन में नशीली दवाओं के जहाजों पर हमले, 10,000 सैनिकों की तैनाती इसका प्रमाण हैं।
ट्रंप ने “लचीला यथार्थवाद” को नीति का आधार बनाया, जो अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देता है। दस्तावेज यूरोप को “सभ्यतागत विनाश” की चेतावनी देता है और नाटो में बदलाव की मांग करता है। रूस के साथ तनाव कम करने और यूक्रेन में शीघ्र समाधान का प्रस्ताव है। चीन के ताइवान और दक्षिण चीन सागर में प्रभाव को रोकने के लिए सैन्य निर्माण पर बल दिया गया।
यह रणनीति पनामा नहर, ग्रीनलैंड और कनाडा पर ट्रंप के पुराने बयानों से जुड़ती है। कैरेबियन में विमानवाहक पोत, युद्धपोत और फाइटर जेट तैनात हैं। ड्रग तस्करी, अवैध प्रवासन और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण उद्देश्य हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था को हिला रहा है।
वर्तमान प्रासंगिकता
आज मुनरो सिद्धांत चीन के लैटिन अमेरिकी निवेशों के खिलाफ प्रासंगिक है। ब्राजील, अर्जेंटीना में चीनी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अमेरिकी चिंता बढ़ा रही हैं। ट्रंप की नीति इनका मुकाबला करती है। रूस-चीन गठबंधन को पश्चिमी गोलार्द्ध से दूर रखने का प्रयास है।
भारत जैसे देशों के लिए, यह वैश्विक शक्ति संतुलन प्रभावित करता है। ट्रंप की रणनीति में भारत को चीन के विरुद्ध हथियार बनाया गया है। यूरोप पर बोझ साझा करने की मांग से नाटो पुनर्गठन हो सकता है। हालांकि, लैटिन अमेरिकी देश इसे साम्राज्यवाद मान सकते हैं।
माइग्रेशन, ड्रग तस्करी और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर यह उपयोगी है। अमेरिकी नौसेना और कोस्ट गार्ड का विस्तार समुद्री लेन नियंत्रित करेगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में स्वावलंबन पर जोर है। यह सिद्धांत अमेरिकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति का प्रतीक है, जो बहुपक्षवाद से हटकर यथार्थवाद अपनाता है। भविष्य में, यह क्षेत्रीय संघर्षों को जन्म दे सकता है या स्थिरता ला सकता है।
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