19वीं शताब्दी की प्रमुख घटनाएँ (19th Century Events)
- वियना कांग्रेस (Congress of Vienna) – 1815 : नेपोलियन बोनापार्ट की पराजय के बाद यूरोप में शांति और शक्ति संतुलन बनाए रखने हेतु वियना कांग्रेस (1815) आयोजित की गई थी। इसमें ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रिया और प्रशा (Prussia) जैसे प्रमुख देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन का उद्देश्य यूरोप में साम्राज्यवादी स्थिरता और राजतंत्र की पुनर्स्थापना करना था (Palmer, 1954)।

- क्राइमियन युद्ध (Crimean War) – 1853–1856: यह युद्ध रूसी साम्राज्य और ओटोमन साम्राज्य के बीच हुआ, जिसमें ब्रिटेन और फ्रांस ने ओटोमन पक्ष का समर्थन किया। यह युद्ध रूस की विस्तारवादी नीति के विरुद्ध था। रूस की हार ने यूरोप में शक्ति-संतुलन की नीति को नया रूप दिया (Seton-Watson, 1964)।
- जर्मनी और इटली का एकीकरण – 1871: 19वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद की लहर के परिणामस्वरूप जर्मनी और इटली दोनों का एकीकरण हुआ। जर्मनी का एकीकरण ओट्टो वॉन बिस्मार्क के नेतृत्व में हुआ, जबकि इटली का एकीकरण ग्यूसेपे गैरीबाल्डी और कैमिलो कैवूर के नेतृत्व में संपन्न हुआ (Hobsbawm, 1962)। इस एकीकरण ने यूरोप की शक्ति संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व की घटनाएँ (Before World War I)
बाल्कन संकट (Balkan Crisis) – 1912–1913: ओटोमन साम्राज्य की कमजोरी के कारण बाल्कन देशों सर्बिया, बुल्गारिया, ग्रीस और मोंटेनेग्रो ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। इन संघर्षों को ‘यूरोप का पाउडर केग’ (Powder Keg of Europe) कहा गया क्योंकि यही तनाव बाद में प्रथम विश्व युद्ध का कारण बना (Taylor, 1954)।

प्रथम विश्व युद्ध और उसके परिणाम (World War I and Its Consequences)
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918): प्रथम विश्व युद्ध आधुनिक इतिहास का पहला वैश्विक संघर्ष था, जिसमें मित्र राष्ट्रों ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली और बाद में अमेरिका ने मध्य शक्तियों जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध लड़ा। इसके प्रमुख कारणों में साम्राज्यवाद, सैन्यवाद, गुप्त संधियाँ और तीव्र राष्ट्रवाद शामिल थे। युद्ध ने यूरोप की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। लगभग 6 करोड़ लोगों की मृत्यु और व्यापक विनाश ने इसे इतिहास का सबसे भीषण संघर्ष बना दिया।
- रूस की बोल्शेविक क्रांति (1917): युद्ध के दौरान रूस में आंतरिक असंतोष और आर्थिक संकट ने बोल्शेविक क्रांति को जन्म दिया। व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने जार निकोलस द्वितीय को सत्ता से हटाकर साम्यवादी सरकार की स्थापना की। इस क्रांति ने सोवियत संघ (USSR) के उदय का मार्ग प्रशस्त किया और वैश्विक राजनीति में साम्यवाद को एक सशक्त विचारधारा के रूप में स्थापित किया।
- पेरिस शांति सम्मेलन (1919): युद्ध के बाद विजयी राष्ट्रों ने पेरिस में एक शांति सम्मेलन आयोजित किया। इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली जिन्हें ‘Big Four’ कहा गया ने पराजित राष्ट्रों पर कठोर शर्तें लगाईं। इस सम्मेलन ने यूरोप की नई राजनीतिक सीमाओं का निर्धारण किया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय की।
- वर्साय संधि (1919): पेरिस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम वर्साय संधि थी। इस संधि के तहत जर्मनी को भारी युद्ध हर्जाना चुकाना पड़ा, उसकी सैन्य शक्ति पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए और उसे क्षेत्रीय नुकसान सहना पड़ा। यह संधि जर्मनी में गहरे असंतोष का कारण बनी और द्वितीय विश्व युद्ध के बीज बोए।

- राष्ट्र संघ (1920): शांति और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से 1920 में राष्ट्र संघ (League of Nations) का गठन किया गया। इसका उद्देश्य भविष्य में युद्धों को रोकना था। किंतु अमेरिका की सदस्यता से बाहर रहने और संगठन की संरचनात्मक कमजोरियों के कारण यह द्वितीय विश्व युद्ध को रोकने में विफल रहा।
द्वितीय विश्व युद्ध और उसके कारण (World War II and Causes)
- म्यूनिख समझौता (1938): 1938 का म्यूनिख समझौता द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में एक निर्णायक क्षण था। ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के सुडेटेनलैंड क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की अनुमति दी। इस नीति को ‘Appeasement Policy’ कहा गया, जिसका उद्देश्य हिटलर की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं को शांत करना था। किंतु इसके विपरीत, इस नीति ने हिटलर को और अधिक साहसी बना दिया और उसने यूरोप में विस्तारवादी अभियान को तेज़ कर दिया।
- नाजी–सोवियत संधि (1939): 1939 में जर्मनी और सोवियत संघ के बीच एक गुप्त संधि हुई, जिसे Molotov-Ribbentrop Pact कहा जाता है। इस संधि के अंतर्गत पोलैंड को दोनों शक्तियों के बीच बाँटने का समझौता हुआ। यह संधि यूरोप की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को अस्थिर कर गई और जर्मनी को पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध छेड़ने का अवसर प्रदान किया। बाद में हिटलर ने इस संधि को तोड़कर सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया, जिससे युद्ध और भी व्यापक हो गया।
- द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945): द्वितीय विश्व युद्ध मित्र राष्ट्रों (अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस) और धुरी शक्तियों (जर्मनी, इटली, जापान) के बीच लड़ा गया। यह मानव इतिहास का सबसे विनाशकारी युद्ध था, जिसमें लगभग 6 करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। युद्ध ने न केवल यूरोप बल्कि एशिया और अफ्रीका को भी प्रभावित किया। यह संघर्ष आधुनिक तकनीकी हथियारों, औद्योगिक उत्पादन और वैचारिक टकराव का प्रतीक था।
- पर्ल हार्बर पर हमला (1941): 7 दिसम्बर 1941 को जापान ने अमेरिका के हवाई स्थित नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर अचानक हमला किया। इस घटना ने अमेरिका को सीधे युद्ध में शामिल कर दिया। इसके बाद युद्ध का स्वरूप वैश्विक हो गया और प्रशांत महासागर क्षेत्र में भी तीव्र संघर्ष शुरू हुआ।
- हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम (1945): अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। यह मानव इतिहास का सबसे भयावह क्षण था, जिसने युद्ध की प्रकृति को हमेशा के लिए बदल दिया। इन हमलों के परिणामस्वरूप जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध का अंत हुआ। परमाणु हथियारों का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-संतुलन और नैतिकता पर गहरे प्रश्न उठाता है।
युद्ध के बाद का युग (Post-War Era)
- संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना (1945): द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात वैश्विक शांति, सुरक्षा और सहयोग सुनिश्चित करने हेतु संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना की गई। यह संस्था राष्ट्रसंघ (League of Nations) की विफलताओं से सीख लेकर बनाई गई थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, सोवियत संघ (अब रूस), ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को विशेषाधिकार प्राप्त हुआ। इस संरचना ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को संस्थागत रूप दिया और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा मानवाधिकारों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- शीत युद्ध की शुरुआत (1947): 1947 से अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई, जिसे शीत युद्ध कहा जाता है। यह संघर्ष पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच वैश्विक शक्ति-संघर्ष था, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को द्विध्रुवीय (bipolar) स्वरूप प्रदान किया। शीत युद्ध ने सैन्य गठबंधनों, हथियारों की दौड़ और वैचारिक प्रचार को जन्म दिया, जिससे विश्व राजनीति दशकों तक प्रभावित रही।
- नाटो की स्थापना (1949): सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव और पूर्वी यूरोप में साम्यवादी विस्तार को रोकने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) की स्थापना की। यह सैन्य गठबंधन सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत पर आधारित था, जिसके अनुसार किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता। नाटो ने शीत युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों की सामरिक एकता को सुदृढ़ किया।
- कोरियाई युद्ध (1950–1953): कोरियाई प्रायद्वीप पर उत्तर कोरिया (सोवियत समर्थित) और दक्षिण कोरिया (अमेरिकी समर्थित) के बीच संघर्ष हुआ। यह युद्ध शीत युद्ध की प्रत्यक्ष सैन्य टकराहटों में से एक था। यद्यपि युद्धविराम समझौते के बाद स्थिति एक ‘स्टेलमेट’ में समाप्त हुई, किंतु इसने एशिया में वैचारिक विभाजन को स्थायी बना दिया और अमेरिका-चीन संबंधों को भी प्रभावित किया।
- वियतनाम युद्ध (1955–1975): वियतनाम युद्ध शीत युद्ध का सबसे लंबा और विवादास्पद संघर्ष था। अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम का समर्थन करते हुए उत्तरी वियतनाम के कम्युनिस्टों से युद्ध किया। यह युद्ध अमेरिका की सैन्य शक्ति और विदेश नीति की सीमाओं को उजागर करता है। अंततः उत्तरी वियतनाम की विजय हुई और देश का एकीकरण हुआ। इस युद्ध ने अमेरिकी समाज में गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक विभाजन उत्पन्न किए।
- क्यूबा मिसाइल संकट (1962): 1962 में सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात करने पर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध का खतरा उत्पन्न हुआ। यह संकट शीत युद्ध का सबसे गंभीर क्षण था, जिसने विश्व को परमाणु संघर्ष के कगार पर पहुँचा दिया। अंततः कूटनीतिक समझौते के माध्यम से संकट का समाधान हुआ, जिससे परमाणु हथियार नियंत्रण और संवाद की आवश्यकता स्पष्ट हुई।

- सोवियत संघ का पतन (1991): आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुधारवादी नीतियों (जैसे ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका) के कारण 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ। इसके परिणामस्वरूप 15 स्वतंत्र गणराज्यों का गठन हुआ और शीत युद्ध का अंत हुआ। इस घटना ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को एकध्रुवीय (unipolar) बना दिया, जिसमें अमेरिका प्रमुख महाशक्ति के रूप में उभरा।
21वीं सदी की प्रमुख घटनाएँ (21st Century Events)
- 9/11 आतंकी हमला (2001): 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर अल-कायदा द्वारा समन्वित आतंकवादी हमले किए गए। इन हमलों में लगभग 3,000 लोगों की मृत्यु हुई तथा वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया गया। इस घटना ने न केवल अमेरिकी विदेश नीति को गहराई से प्रभावित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी अभियानों की दिशा भी निर्धारित की। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने ‘War on Terror’ की घोषणा की और अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप किया
- इराक युद्ध (2003): 2003 में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इराक पर यह आरोप लगाते हुए सैन्य कार्रवाई की कि वहाँ ‘सामूहिक विनाश के हथियार’ (Weapons of Mass Destruction) मौजूद हैं। बाद में यह दावा असत्य सिद्ध हुआ, किंतु इस युद्ध ने मध्य-पूर्व की राजनीतिक स्थिरता को गहराई से प्रभावित किया। इराक युद्ध ने अमेरिकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े किए और क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा दिया, जिससे आतंकवादी संगठनों को नए अवसर मिले
- अरब स्प्रिंग (2010–2012): अरब स्प्रिंग लोकतांत्रिक आंदोलनों की एक श्रृंखला थी, जिसकी शुरुआत ट्यूनीशिया से हुई और शीघ्र ही मिस्र, लीबिया, यमन तथा सीरिया तक फैल गई। इन आंदोलनों का उद्देश्य अधिनायकवादी शासन का अंत कर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करना था। यद्यपि कुछ देशों में राजनीतिक परिवर्तन हुए, किंतु कई स्थानों पर यह आंदोलन हिंसक संघर्ष और गृहयुद्ध में परिवर्तित हो गया। अरब स्प्रिंग ने अरब जगत की राजनीतिक संरचना को पुनर्परिभाषित किया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।
- अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी (2021): लगभग दो दशकों तक सैन्य उपस्थिति बनाए रखने के बाद अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेनाएँ वापस बुला लीं। इस वापसी के तुरंत बाद तालिबान ने देश पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह घटना अमेरिकी विदेश नीति की सीमाओं और ‘राष्ट्र-निर्माण’ (nation-building) की जटिलताओं को उजागर करती है। अफगानिस्तान की स्थिति ने वैश्विक सुरक्षा, मानवाधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर प्रश्न उठाए (BBC Report, 2021)।
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