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मैकॉले की शिक्षा प्रणाली से मुक्ति: संज्ञानात्मक विऔपनिवेशीकरण की दिशा में

कौन थे Macaulay?

प्रधानमंत्री ने देशवासियों से आग्रह किया है कि वे वर्ष 2035 तक मैकॉले की सोच के प्रभाव से पूरी तरह बाहर निकलें। तब तक भारत में मैकॉले की रणनीतिक योजना के 200 वर्ष पूरे होंगे, तब हमें औपनिवेशिक शिक्षा की मानसिकता से पूर्ण मुक्ति प्राप्त करनी होगी।

स्वतंत्र भारत में सबसे गहरे जड़ें जमाने वाले विचारों में से एक थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की शिक्षा प्रणाली थी। यह प्रणाली भारतीय समाज को उनकी संस्कृति, परंपरा और आत्म-सम्मान से काटने के लिए बनाई गई थी।

कौन थे Macaulay ?

  • पूरा नाम: थॉमस बैबिंगटन मैकाले
  • भारत की गवर्नर-जनरल की परिषद के प्रथम विधि सदस्य (1834–1838)
  • चार्टर एक्ट 1833 के तहत नियुक्त
  • भारतीय दंड संहिता (IPC) और शिक्षा नीति पर गहरा प्रभाव।

1835 का Macaulay Minute

  • संस्कृत, अरबी, फारसी, हिंदी तमिल,तेलगु  जैसी भारतीय भाषाओं को निरर्थक घोषित किया गया।
  • अंग्रेजी भाषा को “उच्च ज्ञान” का एकमात्र माध्यम बताया गया।
  • सरकारी धन केवल अंग्रेजी शिक्षा पर खर्च करने का प्रस्ताव।
  • भारतीय साहित्य, दर्शन, चिकित्सा, गणित आदि को पश्चिमी विज्ञान से निम्न साबित करने की कोशिश।
  • एक “मध्यस्थ वर्ग तैयार करने की योजना: “Indian in blood and colour, but English in tastes, opinions, morals and intellect.”

यह शिक्षा नीति भारत की सांस्कृतिक, भाषाई और बौद्धिक आत्मा पर सीधा हमला थी।

मैकॉले की दूरदर्शिता योजनाबद्ध थी. उसकी शिक्षा प्रणाली इतनी गहरी और प्रभावशाली थी कि उसने भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैश्विक प्रसार को रोक दिया। भारत की प्राचीन सभ्यता का जो ज्ञान विश्व के लिए लाभकारी हो सकता था, उसे अंग्रेज़ी शिक्षा ने सीमित कर दिया।

इस नीति ने भारतीयों को आत्मगौरव से दूर कर, विदेशी भाषा और संस्कृति के प्रति दास मानसिकता विकसित की। अंग्रेज़ी ज्ञान का प्रतीक बन गई और भारतीय भाषाओं को “कमतर” समझा जाने लगा।

भारत में औपनिवेशिक मानसिकता

  • भारत में औपनिवेशिक मानसिकता केवल अंग्रेज़ी भाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने समाज, संस्कृति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और शिक्षा सभी क्षेत्रों में गहरी पैठ बना ली। अंग्रेज़ी को सफलता और उच्चता का प्रतीक बना दिया गया, जिससे भारतीय भाषाएँ शिक्षा और अवसरों से हाशिए पर चली गईं।
  • पश्चिमी जीवनशैली को आदर्श बताकर भारतीय संस्कृति, परंपरा और ज्ञान प्रणालियों को ‘पिछड़ा’ या ‘अवैज्ञानिक’ ठहराया गया।
  • औपनिवेशिक शासन ने ऐसे कानून और संस्थाएँ बनाई जिनका उद्देश्य जनता की स्वतंत्रता नहीं बल्कि शासन का नियंत्रण बनाए रखना था, जैसे IPC (1860), राजद्रोह कानून, और पुलिस कानून (1861)
  • आर्थिक स्तर पर भारत को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और ब्रिटेन के उत्पादों का उपभोक्ता बना दिया गया, जिससे स्थानीय उद्योगों का विनाश और धन की भारी निकासी हुई।
  • शिक्षा और अनुसंधान में भी पश्चिमी मानकों को ‘वैज्ञानिक’ और भारतीय परंपराओं को ‘अंधविश्वास’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

संज्ञानात्मक विऔपनिवेशीकरण (Cognitive Decolonisation)

भारत अब उस चरण में है जहाँ मानसिक स्वतंत्रता आवश्यक है। इसके तीन स्तर हैं-नीतिगत, सांस्कृतिक, व्यवहारिक।

संज्ञानात्मक विऔपनिवेशीकरण (Cognitive Decolonisation) का समय है जिसका अर्थ है अपने सोच, नीति और व्यवहार में भारतीयता की पुनर्स्थापना। इसके लिए तीन स्तरों पर परिवर्तन हो रहा है:

  1. पहला, नीतिगत स्तर पर, नई शिक्षा नीति (NEP 2020) मातृभाषा आधारित शिक्षा, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) और कौशल-आधारित शिक्षण को प्रोत्साहित करती है। औपनिवेशिक कानूनों को हटाकर नए भारतीय न्याय संहिताओं का निर्माण किया जा रहा है। उदाहरण के रूप में राजपथ का नाम कर्तव्य पथ रखा गया, जो शक्ति के प्रदर्शन से सेवा और उत्तरदायित्व की ओर मानसिक बदलाव का प्रतीक है।
  2. दूसरा, सांस्कृतिक पुनरुद्धार में भारत अपनी स्मृतियों और गौरव को पुनः जागृत कर रहा है। योग को वैश्विक पहचान मिली है और इसके सम्मान में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। शिल्प, लोककला और पारंपरिक त्योहारों को नई ऊर्जा दी जा रही है। नए संसद भवन में स्थापित सेंगोल भारतीय राज्य परंपरा, धर्मनिष्ठ शासन और कर्तव्य-आधारित नेतृत्व का प्रतीक है यह दर्शाता है कि भारत अपने शासन की आत्मा को फिर से भारतीय दृष्टिकोण से परिभाषित कर रहा है।
  3. इस प्रकार, भारत अब केवल औपनिवेशिक ढांचे को बदल नहीं रहा, बल्कि अपनी सांस्कृतिक, वैचारिक और नीतिगत पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वतंत्र सोच के साथ भारतीयता को गौरवपूर्वक आत्मसात कर सकें।

आठ दशकों की स्वतंत्रता और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के बाद भी हम अंग्रेज़ी माध्यम के मोह से बाहर नहीं आ पाए हैं। दिल्ली जैसे शहरों में अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों की माँग अब भी बढ़ रही है। वास्तविक स्वतंत्रता तब होगी जब भारतीय भाषाएँ और भारतीय ज्ञान प्रणाली शिक्षा का केंद्र बनेंगी।

निष्कर्ष

मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारत की सोच, संस्कृति और आत्मविश्वास पर गहरा असर डाला। अब समय है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौटे जहाँ शिक्षा भारतीय भाषाओं, परंपराओं और मूल्यों पर आधारित हो।

 


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