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राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities – NCM), 1992

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग: भारतीय लोकतंत्र की आवश्यकता

भारत की पहचान उसकी विविधता और बहुलतावाद में निहित है। विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों से बने इस देश में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार है।

इसी उद्देश्य से 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities – NCM) की स्थापना की गई थी।

किंतु आज यह संस्था अपनी प्रभावशीलता खोती जा रही है। अप्रैल 2025 से आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सभी सदस्य पद रिक्त हैं, जिससे यह लगभग निष्क्रिय स्थिति में है।

यह स्थिति न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की चिंता भी उत्पन्न करती है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) क्या है?

  • स्थापना: 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम (NCM Act, 1992) के तहत।
  • पहला आयोग: 17 मई 1993 को गठित।
  • संरचना: अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य सभी केंद्र सरकार द्वारा नामित।
  • अल्पसंख्यक समुदाय: मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी (ज़ोरोस्ट्रियन), और जैन (2014 से)।
  • प्रकृति: सांविधिक (Statutory) एवं अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) संस्था।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक सांविधिक निकाय है जिसकी स्थापना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना, उनकी शिकायतों की जांच करना तथा सरकार को नीतिगत सुझाव देना है।
  • वर्तमान में भारत में छह धार्मिक समुदाय मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी (ज़ोरोस्ट्रियन) और जैन को अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचित किया गया है। आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य होते हैं, जिनमें से पाँच का संबंध अल्पसंख्यक समुदायों से होना आवश्यक है।

अल्पसंख्यकों की जनसंख्या

धर्मसंख्या (करोड़ में)%
मुस्लिम17.2214.2
ईसाई2.782.3
सिख2.081.7
बौद्ध0.840.7
जैन0.450.4
कुल23.3719.30

स्रोत: जनगणना 2011

आयोग की वर्तमान स्थिति

हाल के वर्षों में आयोग की संस्थागत निष्क्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

  • सभी प्रमुख पद लंबे समय से खाली हैं।
  • आयोग के पास दंडात्मक या बाध्यकारी अधिकार नहीं हैं, जिससे इसकी सिफारिशें केवल सलाह बनकर रह जाती हैं।
  • “अल्पसंख्यक” की परिभाषा केवल धार्मिक दृष्टिकोण से की गई है, जिससे भाषाई या सांस्कृतिक अल्पसंख्यक उपेक्षित रह जाते हैं।
  • नियुक्तियाँ केंद्र सरकार के विवेकाधिकार पर निर्भर होने से आयोग की स्वायत्तता प्रभावित होती है।
  • परिणामस्वरूप, आयोग की विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों कमजोर हुए हैं।

चुनौतियाँ

  1. रिक्तियाँ और प्रशासनिक शिथिलता: प्रमुख पदों की अनुपस्थिति आयोग को निष्क्रिय बना देती है।
  2. सीमित शक्तियाँ: आयोग केवल सिफारिशें दे सकता है, उन्हें लागू नहीं कर सकता।
  3. राजनीतिक हस्तक्षेप: नियुक्तियों की पारदर्शिता न होने से निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
  4. संविधानिक दर्जे की कमी: अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग की तरह इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है।
  5. सार्वजनिक जागरूकता का अभाव: आम जनता आयोग की भूमिका और अधिकारों से अनभिज्ञ है।

सशक्तिकरण के उपाय

  1. वैश्विक मॉडल से सीख: ब्रिटेन के Equality and Human Rights Commission या दक्षिण अफ्रीका के Commission for Cultural, Religious and Linguistic Communities जैसे मॉडलों से सीखना उपयोगी होगा।
  2. विधायी और संस्थागत सुधार: NCM को संवैधानिक दर्जा (NCSC/NCST की तर्ज पर) देने या NCM अधिनियम, 1992 में संशोधन कर इसकी सिफारिशों को बाध्यकारी बनाने की आवश्यकता है। साथ ही इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिये नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शी मानदंड तय किये जाने चाहिये।
  3. कार्यात्मक सशक्तीकरण: NCM को स्वतः संज्ञान लेने, अनुपालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई करने और स्वतंत्र जाँच करने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिये। इसके लिये उसके जाँच तंत्र को एक समर्पित एवं प्रशिक्षित टीम के साथ मज़बूत किया जाना आवश्यक है।
  4. न्यायिक निगरानी और समीक्षा: अदालतों को NCM के आदेशों की निगरानी करने और जनहित याचिकाओं में इसकी रिपोर्टों का उपयोग करने में सक्षम बनाया जाना चाहिये। साथ ही सुनवाई, परामर्श और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से जनसहभागिता को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
  5. शासन प्रणाली में एकीकरण: अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं जैसे छात्रवृत्ति और कौशल विकास की निगरानी को NCM की सूचना एवं संचार प्रणाली के साथ जोड़कर ज़मीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन का आकलन बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
  6. इसके अलावा, समन्वित नीतिगत कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिये गृह, शिक्षा, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालयों की स्थायी अंतर-मंत्रालयी समिति बनाई जानी चाहिये।

NCM के कार्य

  • यह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के तहत अल्पसंख्यकों के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करता है।
  • यह केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए बनाए गए संवैधानिक कानूनों के कामकाज की निगरानी करता है।
  • यह अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षात्मक उपायों के कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें करता है।
  • यह अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित करने के संबंध में शिकायतों को देखने के लिए जांच करता है।
  • यह भेदभाव से उत्पन्न अल्पसंख्यकों के मुद्दों से संबंधित अध्ययन की पहल करता है।
  • यह अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक विकास से संबंधित मुद्दों से संबंधित अध्ययन, अनुसंधान और विश्लेषण करता है।
  • यह केंद्र सरकार को अल्पसंख्यकों और उनसे जुड़े मुद्दों से संबंधित वार्षिक या विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
  • यह उन मामलों को नियंत्रित करता है जिन्हें केंद्र सरकार संदर्भित करती है।

संवैधानिक सुरक्षा उपाय

भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों को अनेक अधिकार दिए गए हैं;

  • अनुच्छेद 29: सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा।
  • अनुच्छेद 30: अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रबंधित करने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 25-28: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार।
  • अनुच्छेद 14-16: समानता और गैर-भेदभाव की गारंटी।
    इन प्रावधानों का सही क्रियान्वयन तभी संभव है जब NCM जैसी संस्थाएँ सक्रिय, स्वतंत्र और प्रभावी हों।

Additional Information:

  • गृह मंत्रालय (MHA) के संकल्प 1978 में अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना के विचार को परिकल्पना की गई थी।
  • 1992 तक, अल्पसंख्यक आयोग एक गैरसांविधिक निकाय था।
  • 1984 में, अल्पसंख्यक आयोग को MHA से अलग कर दिया गया और कल्याण मंत्रालय के अधीन लाया गया।
  • वर्तमान में, यह आयोग अल्पसंख्यक मंत्रालय के तहत कार्य करता है।
  • भाषाई अल्पसंख्यक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं क्योंकि कल्याण मंत्रालय का संकल्प 1988 पारित किया गया था।
  • पहला राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग 17 मई 1993 को स्थापित किया गया था।

निष्कर्ष

भारत की लोकतांत्रिक संरचना तभी सुदृढ़ हो सकती है जब हर नागरिक चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक अपने अधिकारों को सुरक्षित महसूस करे। वर्तमान समय में NCM का निष्क्रिय रहना न केवल प्रशासनिक कमजोरी का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी चुनौती है।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को सशक्त, स्वायत्त और जवाबदेह बनाना भारतीय लोकतंत्र के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

 


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