परिचय:
हिंद महासागर, जिसने युगों से विश्व के व्यापार मार्गों को संजोया है और मानवता की सभ्यता को पोषित किया है, आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। यह महासागर न केवल भारत की सुरक्षा और समृद्धि की धुरी है, बल्कि वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में भी केंद्रीय भूमिका निभाता है। वर्तमान शताब्दी में, जब जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में वृद्धि, और अनियंत्रित मानवजनित गतिविधियों के कारण समुद्री पर्यावरण पर अभूतपूर्व दबाव पड़ रहा है, तब इस क्षेत्र को मात्र भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के अखाड़े के रूप में देखना एक अदूरदर्शी दृष्टिकोण होगा। भारत के सामने यह एक पुनीत अवसर है कि वह अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए, हिंद महासागर को एक नई ‘नील अर्थव्यवस्था’ (Blue Economy) के उद्गम स्थल के रूप में रूपांतरित करे। यह अर्थव्यवस्था संवहनीयता (Sustainability), जलवायु उत्थानशीलता (Climate Resilience), समावेशी विकास और क्षेत्रीय सहयोग के सिद्धांतों पर आधारित होगी, जो प्रतिद्वंद्विता के स्थान पर सामूहिक प्रगति को प्राथमिकता देगी।
नील अर्थव्यवस्था की अवधारणा, समुद्री संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के माध्यम से आर्थिक विकास और आजीविका में सुधार के साथ-साथ महासागरों के स्वास्थ्य को बनाए रखने पर केंद्रित है। हिंद महासागर क्षेत्र, अपनी विशाल तटीय रेखा, समृद्ध जैव विविधता और महत्वपूर्ण समुद्री यातायात के साथ, इस नवीन आर्थिक प्रतिमान को अपनाने की सर्वाधिक क्षमता रखता है। भारत का नेतृत्व इस रूपांतरण के लिए अपरिहार्य है, क्योंकि इसकी नीतिगत विरासत और भौगोलिक स्थिति इसे क्षेत्रीय सहयोग और वैश्विक जलवायु नेतृत्व के लिए स्वाभाविक दावेदार बनाती है। यह लेख इसी दूरदर्शी दृष्टि और उसके तीन प्रमुख स्तंभों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता
भारत ने हमेशा महासागरों को वैश्विक समता और अपने भविष्य के लिए केंद्रीय माना है। स्वतंत्रता के पश्चात, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही सर्वप्रथम महासागरों के महत्व को देश की सुरक्षा और समृद्धि के लिए आवश्यक बताया था। भारत की यह दूरदर्शिता संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) की वार्ताओं के दौरान मुखर हुई, जब उसने कमजोर द्वीप राष्ट्रों के साथ मिलकर समुद्र तल को ‘मानवता की साझा विरासत’ के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए मजबूत पक्ष रखा। यह सैद्धांतिक प्रतिबद्धता भारत के न्याय और निष्पक्षता के मौलिक मूल्यों को दर्शाती है।
किन्तु आज, हिंद महासागर को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अति-मत्स्यन (Overfishing) के कारण समुद्री जैव विविधता का तेजी से क्षरण हो रहा है, प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) विरंजन (Bleaching) के कारण संकटग्रस्त हैं, और प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचा रहा है। इन सबसे ऊपर, जलवायु संकट के कारण समुद्री जल का अम्लीकरण (Acidification) हो रहा है और तूफानों की तीव्रता तथा बारंबारता बढ़ती जा रही है, जिससे तटीय समुदायों की आजीविका और सुरक्षा सीधे तौर पर खतरे में है। इन जटिल, अंतर्संबंधित खतरों को देखते हुए, भारत को अब केवल सिद्धांतों की बात करने के बजाय, उन्हें व्यवहार में बदलने का ऐतिहासिक दायित्व निभाना होगा। इस रूपांतरण का लक्ष्य हिंद महासागर को मात्र एक रणनीतिक युद्धक्षेत्र के बजाय, सहयोग, नवाचार और सामूहिक उत्थानशीलता के क्षेत्र के रूप में स्थापित करना होना चाहिए।

भारत की ‘नील महासागर रणनीति’: त्रि-आयामी दृष्टिकोण
हिंद महासागर को सहयोग और संवहनीयता के केंद्र में बदलने के लिए, भारत की प्रस्तावित नील महासागर रणनीति तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी हुई है: समुद्री संपदा का प्रबंधन, जलवायु उत्थानशीलता का निर्माण, और समावेशी तथा हरित विकास को बढ़ावा देना।
1-पहला स्तंभ: समुद्री संपदा का प्रबंधन
भारत को हिंद महासागर को ‘साझा वैश्विक संपदा’ के विचार को सशक्त करना चाहिए। इसका अर्थ है कि महासागर के संसाधनों पर किसी एक राष्ट्र का अनन्य अधिकार नहीं हो सकता, बल्कि उनका उपयोग पूरे क्षेत्र के सामूहिक और दीर्घकालिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
- पारिस्थितिकी तंत्र बहाली और जैव विविधता संरक्षण: भारत को क्षेत्रीय स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र बहाली (Ecosystem Restoration) के प्रयासों में नेतृत्व करना चाहिए। इसमें मैंग्रोव वनों का पुनरुद्धार, समुद्री घास के मैदानों का संरक्षण और समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (Marine Protected Areas) के विस्तार के लिए एक समन्वित क्षेत्रीय कार्यक्रम शामिल हो सकता है। संवहनीय मत्स्यन नीतियों को बढ़ावा देकर और अवैध, अनियमित तथा अनियंत्रित मत्स्यन (Illegal, Unregulated and Unreported Fishing) पर अंकुश लगाकर, भारत प्रतिस्पर्धी शोषण की प्रवृत्ति को हतोत्साहित कर सकता है और महासागर के संसाधनों की पुनर्पूर्ति में सहायता कर सकता है।
- सहकारी महासागर प्रशासन: भारत को क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से एक ऐसा ढाँचा स्थापित करना चाहिए जो साझा नियमों और मानदंडों को बढ़ावा दे, जिससे समुद्री शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो।
2-दूसरा स्तंभ: जलवायु उत्थानशीलता का निर्माण
हिंद महासागर क्षेत्र जलवायु जोखिमों की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने की क्षमता को बढ़ाना इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण आयाम है।
- क्षेत्रीय उत्थानशीलता और महासागर नवाचार केंद्र: भारत को एक ‘क्षेत्रीय उत्थानशीलता और महासागर नवाचार केंद्र’ स्थापित करने की अगुआई करनी चाहिए। यह मंच उन्नत समुद्री निगरानी, मौसम के प्रतिमानों का सटीक पूर्वानुमान और तूफानों के लिए शीघ्र चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करेगा।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण: यह केंद्र विशेष रूप से अल्पविकसित द्वीप राष्ट्रों और अफ्रीकी तटीय राज्यों को आवश्यक प्रौद्योगिकी और ज्ञान का हस्तांतरण सुनिश्चित करेगा, ताकि वे जलवायु आपदाओं का सामना करने और उनसे उबरने के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकें। इसमें तटीय अवसंरचना को जलवायु-प्रूफ बनाना और आपदा प्रबंधन प्रोटोकॉल का मानकीकरण शामिल होगा। इस प्रकार, उत्थानशीलता एक साझा क्षेत्रीय विशेषता बन जाएगी।
3-तीसरा स्तंभ: समावेशी और हरित विकास को बढ़ावा
नील अर्थव्यवस्था की सफलता के लिए आवश्यक है कि विकास के अवसर ऐसे क्षेत्रों में तलाशे जाएँ जो जलवायु के अनुकूल हों और समावेशी हों।
- हरित नौपरिवहन और अक्षय ऊर्जा: ‘हरित नौपरिवहन गलियारों’ के विकास में निवेश करने की आवश्यकता है, जिसमें जहाजों को स्वच्छ ईंधन (जैसे अमोनिया या हाइड्रोजन) से संचालित करने के लिए आवश्यक बंदरगाह और रसद सहायता प्रदान की जाए। इसके अतिरिक्त, अपतटीय पवन और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से विशाल अक्षय ऊर्जा क्षमता को अनलॉक किया जा सकता है, जिससे तटीय राष्ट्रों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी और कार्बन उत्सर्जन कम होगा।
- सतत जलकृषि और समुद्री जैव प्रौद्योगिकी: संवहनीय जलकृषि को बढ़ावा देना, विशेष रूप से कम-इनपुट वाली और पारिस्थितिकी के अनुकूल प्रणालियों को प्रोत्साहित करना, खाद्य सुरक्षा और आजीविका को बढ़ाएगा। साथ ही, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Marine Biotechnology) में अनुसंधान और विकास के लिए क्षेत्रीय भागीदारी आवश्यक है, जिससे नए औषधीय यौगिकों और टिकाऊ सामग्रियों की खोज हो सकेगी। इन क्षेत्रों में निवेश के लिए दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धता और समन्वित क्षेत्रीय कार्रवाई आवश्यक है।
हिंद महासागर “ब्लू फंड” की स्थापना
पिछले कुछ वर्षों में, वैश्विक पहल महासागर कार्रवाई के लिए बढ़ती वित्तीय प्रतिबद्धता का संकेत दे रही हैं। मोनाको में आयोजित ब्लू इकोनॉमी एंड फाइनेंस फोरम (BEFF) 2025 और बेलेम में COP30 जैसे मंचों ने नील अर्थव्यवस्था की परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर की राशि जुटाई है। बीईएफएफ 2025 में, हितधारकों ने महासागर निवेशों की 25 बिलियन यूरो की पाइपलाइन का प्रदर्शन किया और 8.7 बिलियन यूरो की नई प्रतिबद्धताओं की घोषणा की, जो सार्वजनिक और निजी स्रोतों के बीच समान रूप से विभाजित थीं। सार्वजनिक विकास बैंकों ने ‘फाइनेंस इन कॉमन ओशन कोएलिशन’ के माध्यम से प्रतिवर्ष 7.5 बिलियन डॉलर देने का संकल्प लिया, जबकि लैटिन अमेरिका के विकास बैंक ने 2030 तक अपने नील अर्थव्यवस्था लक्ष्य को 2.5 बिलियन डॉलर तक बढ़ा दिया। इसके अतिरिक्त, COP30 में ब्राजील ने ‘वन ओशन पार्टनरशिप’ की शुरुआत की, जिसमें 2030 तक महासागर कार्रवाई के लिए 20 बिलियन डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
भारत को इस वैश्विक गति का लाभ उठाना चाहिए। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम ‘हिंद महासागर नील कोष’ (Indian Ocean Blue Fund) की स्थापना हो सकता है।
- कोष का स्वरूप और उद्देश्य: यह कोष भारत द्वारा बीज पूंजी (Seed Capital) के रूप में शुरू किया जा सकता है, जिसे बाद में बहुपक्षीय विकास बैंकों, परोपकारी संस्थाओं और निजी निवेशकों के समर्थन से बढ़ाया जा सकता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक स्तर पर की गई वित्तीय प्रतिज्ञाओं को हिंद महासागर क्षेत्र की विशिष्ट, मूर्त और संवहनीय परियोजनाओं में परिवर्तित करना होगा।
- परियोजना वित्तपोषण: यह कोष छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों, विशेष रूप से तटीय समुदायों के नेतृत्व वाले व्यवसायों को वित्तपोषित कर सकता है जो संवहनीय मत्स्यन, हरित पर्यटन, और अपशिष्ट प्रबंधन में लगे हुए हैं। यह ‘नील बांड’ (Blue Bonds) और अन्य नवीन वित्तीय साधनों को जारी करने के लिए एक क्षेत्रीय मंच के रूप में भी कार्य कर सकता है, जिससे निजी पूंजी को महासागर संरक्षण की ओर आकर्षित किया जा सकेगा। इस प्रकार, भारत वित्त को एक रणनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग करके क्षेत्र के विकास को उत्प्रेरित कर सकता है।
संवहनीयता के माध्यम से सुरक्षा: ‘सागर’ सिद्धांत का विस्तार
हिंद महासागर पर होने वाली अधिकांश चर्चाएँ अक्सर नौसैनिक शक्ति के प्रदर्शन, सैन्य ठिकानों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित होती हैं। तथापि, वास्तविक महासागर सुरक्षा की शुरुआत समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने और जलवायु खतरों का समाधान करने से होती है।
- सुरक्षा की पुनर्संरचना: अवैध मत्स्यन स्थानीय मछुआरों की आजीविका को सीधे तौर पर खतरा पहुँचाता है और खाद्य सुरक्षा को कमजोर करता है, जबकि प्रवाल (Coral) का क्षरण और बढ़ते तूफान क्षेत्रीय स्थिरता को कम करते हैं। इस परिदृश्य में, भारत का ‘सागर’ (क्षेत्र के सभी के लिए सुरक्षा और विकास) सिद्धांत समुद्री सुरक्षा को संवहनीयता, सहयोग और साझा समृद्धि के इर्द-गिर्द केंद्रित करके एक नया ढाँचा प्रस्तुत करता है।
- एकीकृत दृष्टिकोण: ‘सागर’ को विस्तारित करते हुए, भारत को पर्यावरण प्रबंधन को समुद्री जागरूकता, आपदा प्रतिक्रिया, और क्षेत्रीय सहयोग के साथ एकीकृत करना चाहिए। इसका अर्थ है कि एक क्षेत्रीय नौसैनिक अभ्यास में न केवल युद्ध की तैयारी पर, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण, समुद्री खोज और बचाव कार्यों, और समुद्री कचरा हटाने के अभियानों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। इस प्रकार, भारत प्रतिद्वंद्विता पर उत्तरदायित्व (Responsibility over Rivalry) की दृष्टि को बढ़ावा दे सकता है, जिससे हिंद महासागर संवहनीय और सहकारी सुरक्षा के लिए एक वैश्विक प्रतिमान बन सके।
निष्कर्ष: नेतृत्व का अवसर और भावी राह
भारत की महासागर कूटनीति की लंबी विरासत उसे इस क्षेत्र के नेतृत्व के लिए विश्वसनीयता प्रदान करती है, जबकि उसकी भविष्य की महत्वाकांक्षाएँ उसे एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपती हैं। 2026 जैसे महत्वपूर्ण वर्ष में, जब तीसरे संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC3) और जैविक विविधता के परे राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार (BBNJ) समझौते के लागू होने से वैश्विक महासागर प्रशासन में गति आ रही है, भारत के लिए नेतृत्व का यह अवसर और भी स्पष्ट हो जाता है।
भारत द्वारा बीएनजेजे समझौते का संभावित अनुसमर्थन (Ratification) उसे ‘हरित नौपरिवहन गलियारों’, ‘नील बांड’, ‘समावेशी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण’ और सुशासित ‘महासागर कार्बन समाधानों’ (Ocean Carbon Solutions) जैसे नवाचारों के माध्यम से नेतृत्व करने का मौका देता है। हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) जैसे मंचों का उपयोग करके, भारत को अपने दृष्टिकोण को वित्त, साझेदारी और स्थायी क्षेत्रीय संस्थानों में रूपांतरित करने की चुनौती को स्वीकार करना होगा।
भारत को विनम्रता, महत्वाकांक्षा और समावेशिता के साथ नेतृत्व करते हुए यह दर्शाना होगा कि महासागर प्रशासन में सहयोग और एकजुटता, प्रतिद्वंद्विता पर विजय प्राप्त कर सकती है। हिंद महासागर को एक नई, संवहनीय वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाना न केवल भारत के हित में है, बल्कि यह क्षेत्र और मानवता के भविष्य के लिए भी अपरिहार्य है। यह संवहनीयता और समृद्धि का एक ऐसा साझा भविष्य है, जिसके निर्माण में भारत को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।
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