मद्रास राज्य बनाम चंपकम दोरैराजन (State of Madras vs Champakam Dorairajan, 1951) भारत के स्वतंत्र न्यायिक इतिहास के सबसे प्रारंभिक और महत्वपूर्ण मामलों में से एक है। इस निर्णय ने मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) के बीच संबंध को स्पष्ट किया तथा भारत के पहले संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 का मार्ग प्रशस्त किया।
यह मामला जाति आधारित आरक्षण और समानता के अधिकार से जुड़ा था और इसने भारत की सामाजिक न्याय व्यवस्था की दिशा तय की।
पृष्ठभूमि और मुद्दा
- वर्ष 1948 में मद्रास सरकार ने एक Communal Government Order (GO) जारी किया, जिसके तहत शिक्षण संस्थानों में सीटों का बँटवारा जाति और धर्म के आधार पर किया गया।
- सरकार ने इस नीति को अनुच्छेद 46 का हवाला देते हुए उचित ठहराया, जो राज्य को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्गों की शिक्षा और आर्थिक उन्नति के लिए प्रोत्साहित करता है।
- चंपकम दोरैराजन, जो एक ब्राह्मण महिला थीं, उन्हें इस आदेश के कारण मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला, जबकि उनके अंक अधिक थे।
- उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, यह कहते हुए कि यह आदेश अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
मुख्य संवैधानिक प्रश्न
- क्या यह आदेश अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन करता है?
- क्या अनुच्छेद 15(1) (धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव निषेध) का उल्लंघन हुआ?
- क्या नीति निदेशक तत्व (DPSPs) का उपयोग किसी ऐसे कार्य को उचित ठहराने के लिए किया जा सकता है जो मौलिक अधिकारों का हनन करता हो?
- क्या सामाजिक न्याय के उद्देश्य से राज्य को व्यक्तिगत समानता के अधिकारों को सीमित करने का अधिकार है?
- क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है?
- क्या शिक्षा में आरक्षण, संविधान के प्रथम संशोधन से पहले वैध था?
- क्या सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों को नीति निदेशक तत्वों से ऊपर रखना चाहिए?
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (1951)
- पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और Communal GO को असंवैधानिक घोषित किया।
- न्यायालय ने कहा कि यह आदेश अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन करता है क्योंकि यह जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव करता है।
- अदालत ने यह स्पष्ट किया कि नीति निदेशक तत्व (DPSPs), मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) से निम्न स्तर पर हैं मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा लागू किए जा सकते हैं, जबकि DPSPs केवल मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
- सामाजिक न्याय के लक्ष्यों का अनुसरण संविधान के उल्लंघन की कीमत पर नहीं किया जा सकता।
- अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के मूल स्वरूप में केवल सार्वजनिक रोजगार (Article 16(4)) में आरक्षण की अनुमति थी, शिक्षा में नहीं।
इस संशोधन ने शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लिये संवैधानिक आधार प्रदान किया।
कमज़ोर वर्गों के लिये प्रमुख संवैधानिक प्रावधान क्या हैं?
- अनुच्छेद 15(1): धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
- अनुच्छेद 16(4): पिछड़े वर्गों के लिये सार्वजनिक रोज़गार में आरक्षण की अनुमति प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है।
- अनुच्छेद 46 (DPSP): SC, ST और कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का अधिदेश देता है।
| अनुच्छेद | प्रावधान |
| अनुच्छेद 15(1) | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध |
| अनुच्छेद 15(4) | SEBC, SC, ST के लिए विशेष प्रावधान और शिक्षा में आरक्षण |
| अनुच्छेद 16(4) | पिछड़े वर्गों के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण |
| अनुच्छेद 17 | अस्पृश्यता का उन्मूलन |
| अनुच्छेद 46 (DPSP) | SC, ST और कमजोर वर्गों के शैक्षणिक व आर्थिक हितों को बढ़ावा देना |
प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा कौन से प्रावधान संशोधित किये गए?
- अनुच्छेद 15(4): SEBC, SC औरST के लिये विशेष प्रावधानों की अनुमति दी गई।
- अनुच्छेद 19: स्वतंत्र भाषण परउचित प्रतिबंधों का विस्तार (अनुच्छेद 19(2)), जिसमें राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अपराधों के लिये उकसावा शामिल है।
- राज्यव्यावसायिक योग्यताएँ निर्धारित कर सकता है तथा राज्य के स्वामित्व वाले निगमों के माध्यम से व्यापार, कारोबार या उद्योग को विनियमित या राष्ट्रीयकृत कर सकता है।
- अनुच्छेद 85 और 174: यह सुनिश्चित किया गया कि दो संसदीय या राज्य विधान सत्रों के बीच काअंतराल छह महीने से अधिक न हो।
- अनुच्छेद 87 और 176: विधानमंडल में राष्ट्रपति/राज्यपाल का अभिभाषणअब प्रत्येक आम चुनाव के बाद केवल एक बार और प्रत्येक वर्ष पहले सत्र की शुरुआत में अनिवार्य होगा।
- अनुच्छेद 31A: संपदा और संपत्ति के अधिकार के अधिग्रहणसे संबंधित कानूनों को मौलिक अधिकारों के तहत चुनौती दिये जाने से सुरक्षित किया गया।
- अनुच्छेद 31B: मौलिक अधिकारोंके संबंध में सूचीबद्ध कानूनों को न्यायिक समीक्षा से सुरक्षित करते हुए नौवीं अनुसूची बनाई गई।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति: राष्ट्रपति को प्रत्येक राज्य के लिये अनुसूचित जाति (अनुच्छेद 341) और अनुसूचित जनजाति (अनुच्छेद 342) को अलग-अलग निर्दिष्ट करने का अधिकार दिया गया।
निर्णय का प्रभाव और महत्त्व
- इस केस ने मौलिक अधिकारों की सर्वोच्चता को स्थापित किया।
- इसने भारत में आरक्षण नीति की संवैधानिक नींव तैयार की।
- यह निर्णय संविधान संशोधन की शक्ति को भी मान्यता देता है।
- सामाजिक न्याय, समानता और संविधान की व्याख्या पर यह मामला आज भी एक मील का पत्थर है।
FR और DPSP के बीच टकराव पर प्रमुख न्यायिक निर्णय
गोलकनाथ मामला (1967)
- पंजाब सरकार ने भूमि सुधार कानूनों को लागू किया, जिन्हें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
- FR को संविधान का “पवित्र और अटल” हिस्सा माना गया।
- इस निर्णय ने चंपकम दोरायराजन केस में स्थापित दृष्टिकोण को पलट दिया, क्योंकि अब DPSP को लागू करने के लिए FR में संशोधन असंभव बना दिया गया था।
- इस निर्णय के बाद सरकार ने 24वाँ, 25वाँ, और 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किए, ताकि संसद की संशोधन शक्ति को पुनः स्पष्ट किया जा सके।
केशवानंद भारती मामला (1973)
- 25वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 के तहत अनुच्छेद 31C जोड़ा गया।
- इस अनुच्छेद ने कहा कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानूनों को न्यायिक समीक्षा से मुक्त रखा जाएगा, भले ही वे FR (अनुच्छेद 14, 19, या 31) का उल्लंघन करें।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 31C के पहले भाग (जो अनुच्छेद 39(b) और (c) के कार्यान्वयन से संबंधित था) को वैध ठहराया।
- परंतु, न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाने वाले दूसरे भाग को असंवैधानिक घोषित किया।
- इस निर्णय में पहली बार “संविधान की मूल संरचना (Basic Structure Doctrine)” की अवधारणा दी गई।
मुख्य बिंदु
संसद संविधान में संशोधन कर सकती है,
लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (जैसे– न्यायिक समीक्षा, सीमित सरकार, स्वतंत्रता के अधिकार) को नष्ट नहीं कर सकती।
मिनर्वा मिल्स मामला (1980)
- 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 31C का दायरा सभी DPSP तक बढ़ा दिया गया था।
- इसका अर्थ था कि अब कोई भी कानून जो DPSP को लागू करता है, उसे FR का उल्लंघन करने के बावजूद न्यायिक समीक्षा से छूट मिलेगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन के तहत अनुच्छेद 31C के विस्तार को रद्द कर दिया।
- निर्णय दिया कि संविधान का संतुलन बनाए रखने के लिए FR और DPSP के बीच सामंजस्य (Harmony) आवश्यक है।
- DPSP के नाम पर मौलिक अधिकारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
वर्तमान संवैधानिक स्थिति
| पहलू | स्थिति |
| प्राथमिकता | मौलिक अधिकारों (FR) को DPSP पर वरीयता प्राप्त है। |
| अपवाद | संसद अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने के लिए अनुच्छेद 14 व 19 में संशोधन कर सकती है। |
| न्यायिक समीक्षा | संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, इसे समाप्त नहीं किया जा सकता। |
निष्कर्ष
- चंपकम दोरायराजन केस (1951) ने FR की सर्वोच्चता स्थापित की।
- गोलकनाथ केस (1967) ने FR को अटल घोषित किया।
- केशवानंद भारती केस (1973) ने “मूल ढाँचा सिद्धांत” स्थापित किया और संसद की शक्ति सीमित की।
- मिनर्वा मिल्स केस (1980) ने FR और DPSP के बीच संतुलन (Harmony) को संविधान की आत्मा बताया।
अंततः भारतीय संविधान न तो केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है, न ही केवल राज्य की नीति पर बल्कि दोनों के बीच एक संतुलित सेतु है।
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