हाल ही में संसद में संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक और निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किए गए, जिनका उद्देश्य दलबदल विरोधी क़ानून को अधिक प्रभावी बनाना है। दलबदल का प्रभाव केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सीधे-सीधे शासन की स्थिरता, लोकतांत्रिक नैतिकता और जनता के विश्वास को प्रभावित करता है।
आज की राजनीति में दलबदल एक व्यवसायिक गतिविधि जैसा बनता जा रहा है जहाँ पद, पैसा और सत्ता का लेन-देन खुलेआम हो रहा है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मतदाता जिन उम्मीदों के साथ प्रतिनिधि चुनते हैं, वे पूरी तरह से ठगा हुआ महसूस करते हैं।
दल–बदल विरोधी कानून का अर्थ
दल–बदल का सामान्य अर्थ है, किसी राजनीतिक दल या संगठन को छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल हो जाना, प्रायः पद, सत्ता या भौतिक लाभ के उद्देश्य से।
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे सामान्यतः दल–बदल विरोधी कानून कहा जाता है, को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया। इसका मुख्य उद्देश्य था:
- पद और निजी लाभ के लालच में होने वाले राजनीतिक दलबदल को रोकना
- सरकारों को स्थिरता प्रदान करना
- दलगत अनुशासन बनाए रखना
- मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना
यह कानून संसद तथा राज्य विधानसभाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है। वर्ष 2002–03 (91वाँ संशोधन) के माध्यम से इसे और अधिक सख़्त बनाया गया।
दलबदल: लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती
भारत में दलबदल की समस्या नई नहीं है। 1967 के आम चुनावों के बाद यह समस्या खुलकर सामने आई। “आया राम, गया राम” की राजनीति ने सरकारों की स्थिरता को कमजोर किया और लोकतंत्र की साख पर सवाल खड़े किए। इसी पृष्ठभूमि में 52वाँ संविधान संशोधन (1985) लाया गया, जिसके तहत दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
इसका उद्देश्य था:
- राजनीतिक अस्थिरता को रोकना
- निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना
- मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना
दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता के आधार
दसवीं अनुसूची के अंतर्गत सांसदों और विधायकों को निम्नलिखित परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है:
- यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
- यदि कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
- यदि कोई स्वतंत्र निर्वाचित सदस्य बाद में किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- यदि कोई मनोनीत सदस्य, मनोनयन के छह माह के बाद किसी दल में शामिल हो जाता है।
इन मामलों में अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष/सभापति को दिया गया है।
समस्या कहाँ है?
दसवीं अनुसूची के बावजूद दलबदल रुका नहीं। इसका मुख्य कारण क़ानून के क्रियान्वयन में कमज़ोरी है। दलबदल के मामलों में निर्णय देने का अधिकार विधानसभा/लोकसभा अध्यक्ष को दिया गया, लेकिन:
- निर्णय में अत्यधिक देरी होती है
- अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं
- राजनीतिक दबाव और दलगत निष्ठा निर्णयों को प्रभावित करती है
अक्सर देखा गया है कि दलबदल करने वाले विधायक वर्षों तक मंत्री बने रहते हैं और बाद में निर्णय आता है, जिससे दलबदल का राजनीतिक लाभ पहले ही मिल चुका होता है।
न्यायिक हस्तक्षेप और उसकी सीमाएँ
दलबदल से संबंधित अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार पीठासीन अधिकारी (Speaker/Chairman) को प्राप्त है। प्रारंभ में कानून में यह प्रावधान था कि अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होगा और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
न्यायिक समीक्षा
हालाँकि, किहोटो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करता है
- उसका निर्णय दुर्भावना, प्रक्रिया की त्रुटि या संवैधानिक उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा
- किंतु अध्यक्ष के निर्णय से पहले न्यायिक हस्तक्षेप सामान्यतः नहीं किया जा सकता
न्यायालयों ने यह भी कहा है कि:
- दलबदल के मामलों में समय-सीमा तय होनी चाहिए
- लोकतांत्रिक नैतिकता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए
‘स्वेच्छा से सदस्यता त्याग’ की न्यायिक व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि:
- “स्वेच्छा से सदस्यता त्याग” केवल औपचारिक इस्तीफे तक सीमित नहीं है
- किसी सदस्य का आचरण, सार्वजनिक बयान या विरोधी दल को समर्थन देना भी सदस्यता त्याग माना जा सकता है
- बिना इस्तीफा दिए भी सदस्य अयोग्य ठहराया जा सकता है
दल–बदल विरोधी कानून के अंतर्गत अपवाद
दसवीं अनुसूची कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता से छूट भी प्रदान करती है:
- यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो–तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय कर लेते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
- अध्यक्ष/सभापति चुने जाने पर कोई सदस्य अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकता है और पद छोड़ने के बाद पुनः पार्टी में शामिल हो सकता है।
- प्रारंभिक कानून में दल विभाजन की अनुमति थी, लेकिन अब इसे हटा दिया गया है।
निजी सदस्य विधेयक और नए सुझाव
निजी सदस्य विधेयक में यह सुझाव दिया गया है कि:
- दलबदल के मामलों का निर्णय स्वतंत्र न्यायाधिकरण द्वारा किया जाए
- अध्यक्ष को इस प्रक्रिया से अलग रखा जाए
- दलबदल करने वाले सदस्य को न केवल अयोग्य ठहराया जाए, बल्कि भविष्य के चुनावों से भी कुछ समय के लिए वंचित किया जाए
यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि जब तक दलबदल की क़ीमत भारी नहीं होगी, तब तक यह प्रवृत्ति रुकेगी नहीं।
दलबदल और शासन की स्थिरता
दलबदल केवल सरकार गिराने या बनाने तक सीमित नहीं है। यह:
- नीति निर्माण को प्रभावित करता है
- प्रशासनिक निरंतरता को तोड़ता है
- जनता के विश्वास को कमज़ोर करता है
जब विधायकों को यह भरोसा हो जाता है कि दलबदल के बाद भी उन्हें मंत्री पद या सत्ता मिल जाएगी, तब क़ानून का भय समाप्त हो जाता है।
क्या दल–बदल विरोधी कानून विधायकों की स्वतंत्रता को सीमित करता है?
यह कानून सरकार की स्थिरता बनाए रखने में सहायक है, लेकिन इसकी आलोचना भी की जाती है क्योंकि:
- यह विधायकों को अंतरात्मा और विवेक के अनुसार मतदान से रोकता है
- विधायिका की निगरानी भूमिका (oversight) कमजोर होती है
- सांसद/विधायक पार्टी नेतृत्व के निर्देशों तक सीमित हो जाते हैं
- निर्वाचक और प्रतिनिधि के बीच का संबंध कमजोर पड़ता है
इसी कारण कई विशेषज्ञों का मत है कि यह कानून केवल विश्वास/अविश्वास प्रस्ताव और बजट जैसे मामलों तक सीमित होना चाहिए।
सुधार संबंधी सिफारिशें
दल-बदल विरोधी कानून को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कई समितियों और संस्थाओं ने सुझाव दिए हैं:
(क) दिनेश गोस्वामी समिति
- अयोग्यता केवल स्वैच्छिक दल त्याग और विश्वास मत से जुड़े मामलों में हो
(ख) विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट)
- विलय संबंधी छूट हटाई जाए
- चुनाव पूर्व गठबंधनों को एक दल माना जाए
- व्हिप केवल महत्वपूर्ण मामलों में जारी किया जाए
(ग) निर्वाचन आयोग
- अयोग्यता पर निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल करें
- चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह ली जाए
दलबदल विरोधी क़ानून को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि:
- निर्णय प्रक्रिया तेज़ और निष्पक्ष हो
- दलबदल करने पर कठोर दंड हो
- जनादेश के साथ विश्वासघात को गंभीर अपराध माना जाए
- संस्थागत नैतिकता को मज़बूत किया जाए
निष्कर्ष
दलबदल विरोधी कानून भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता और नैतिकता बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक उपकरण है। किंतु निर्णय में देरी, अध्यक्ष की राजनीतिक भूमिका और व्हिप के अत्यधिक प्रयोग ने इसके प्रभाव को कमज़ोर कर दिया है।
आज आवश्यकता है कि दसवीं अनुसूची का संचालन पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्धता के साथ किया जाए, ताकि सरकार की स्थिरता भी बनी रहे और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी हो सके।
दलबदल विरोधी क़ानून का उद्देश्य केवल सरकारों को बचाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा जनादेश की रक्षा करना है। जब तक दलबदल को एक लाभकारी राजनीतिक रणनीति के बजाय एक महँगा सौदा नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। लोकतंत्र में दल बदलने की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि जनता के प्रति निष्ठा सर्वोपरि होनी चाहिए।
इस लेख का आधार THE TRIBUNE में छपे “Anti-defection law needs teeth to bite” है परीक्षा के उपयोग हेतु इसमें पृष्टभूमि को शामिल किया है
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


