लोक प्रशासन का मूल उद्देश्य निश्चित सार्वजनिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु मानव एवं भौतिक संसाधनों का समन्वित उपयोग करना है। प्रशासन तभी प्रभावी बन सकता है जब संगठनात्मक ढाँचा स्पष्ट, तर्कसंगत तथा मानवीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो। इसी कारण कहा जाता है कि संगठन समस्त प्रशासन की पूर्व क्रिया है। प्रशासन में अनेक व्यक्ति सामूहिक रूप से कार्य करते हैं और संगठन वह ढाँचा है जो उनके कार्यों, उत्तरदायित्वों तथा संबंधों को सुव्यवस्थित करता है।
- संक्षिप्त ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, “किसी वस्तु का स्वरूप निर्धारित करना और उसे कार्यशील अवस्था में लाना ही संगठन है।” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि संगठन केवल संरचना नहीं, बल्कि एक गतिशील प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को समझने के लिए संगठन सिद्धांतों का विकास हुआ, जिनमें वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत, नौकरशाही (अधिकारी तंत्र) सिद्धांत तथा मानव संबंध सिद्धांत प्रमुख हैं।
- वुडरो विल्सन और संगठनात्मक प्रशासन की वैचारिक पृष्ठभूमि
- वुडरो विल्सन (1856–1924) को लोक प्रशासन का प्रणेता माना जाता है। यद्यपि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उनका योगदान अधिक प्रसिद्ध है, फिर भी प्रशासनिक विचारों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके लेख “The Study of Administration” (1887) से लोक प्रशासन एक स्वतंत्र अनुशासन के रूप में स्थापित हुआ।
- विल्सन का मानना था कि प्रशासन एक विज्ञान है और इसे राजनीति से पृथक करके पढ़ाया जाना चाहिए। उनका यह विश्वास संगठन सिद्धांतों की आधारशिला बनता है क्योंकि वे दक्षता, विशेषज्ञता और तकनीकी प्रशिक्षण पर बल देते हैं। लोकतंत्र में प्रशासन को संगठित करना राजतंत्र की अपेक्षा अधिक कठिन है, इसलिए प्रशासनिक संगठन को अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत होना चाहिए।
- विल्सन की यह सोच आगे चलकर टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन, फेयोल के सामान्य प्रशासन सिद्धांत और वेबर की नौकरशाही अवधारणा में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- परंपरागत (शास्त्रीय) संगठन सिद्धांत : गुलिक और उर्विक
- शास्त्रीय संगठन सिद्धांत का विकास कार्यकुशलता और दक्षता की आवश्यकता के परिणामस्वरूप हुआ। लूथर गुलिक और लिंडल उर्विक इसके प्रमुख प्रवर्तक हैं। उन्होंने 1937 में “Papers on the Science of Administration” का संपादन किया।
- इस दृष्टिकोण में मनुष्यों की अपेक्षा कार्य और संरचना पर अधिक बल दिया गया। संगठन को एक यांत्रिक व्यवस्था माना गया जिसमें प्रत्येक पद, नियम और प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है। टेलर के मानव‑मशीन मॉडल और फेयोल के औद्योगिक प्रबंधन का इन पर गहरा प्रभाव था।
(क) संगठन की अवधारणा
- लूथर गुलिक के अनुसार, “संगठन सत्ता का औपचारिक ढाँचा है जिसके माध्यम से कार्यों का विभाजन, निर्धारण और समन्वय किया जाता है।” वहीं हर्बर्ट साइमन संगठन को सहकारी कार्यों की नियोजित व्यवस्था मानते हैं।
(ख) POSDCORB सिद्धांत
- गुलिक ने प्रशासनिक कार्यों को समझाने के लिए POSDCORB मॉडल प्रस्तुत किया
Planning, Organising, Staffing, Directing, Co‑ordination, Reporting और Budgeting। - यह मॉडल प्रशासन को एक विज्ञान के रूप में प्रस्तुत करता है और कार्यकुशलता पर बल देता है। 1937 की राष्ट्रपति समिति तथा बाद की समितियों ने भी इस मॉडल को अपनाया।
(ग) गुलिक और उर्विक के सिद्धांत
- गुलिक ने विशिष्टीकरण और विभागीयकरण के सिद्धांत दिए तथा विभागीयकरण के चार आधार बताए कार्य, प्रक्रिया, व्यक्ति और स्थान (Four P’s)।
- उर्विक ने संगठन के सात सिद्धांत प्रतिपादित किए- उद्देश्य, अधिकार, उत्तरदायित्व, नियंत्रण विस्तार, विशेषज्ञता, समन्वय आदि।
(घ) आलोचना और योगदान
- POSDCORB की आलोचना लेविस मेरियम ने की। उनके अनुसार यह दृष्टिकोण केवल प्रशासनिक तकनीकों तक सीमित है और मानवीय पहलू की उपेक्षा करता है। फिर भी, शास्त्रीय सिद्धांतों का योगदान यह है कि इन्होंने प्रशासनिक शब्दावली और अवधारणाओं को स्पष्ट रूप दिया, जो आगे के व्यवहारवादी अध्ययनों का आधार बनीं।
हेनरी फेयोल : सामान्य प्रशासन सिद्धांत
हेनरी फेयोल (1841–1926) को प्रबंध के सामान्य सिद्धांतों का पिता माना जाता है। उनकी पुस्तक “General and Industrial Management” (1916) प्रशासनिक विचारधारा में मील का पत्थर है।
- फेयोल ने संगठनात्मक गतिविधियों को छह भागों में विभाजित किया—तकनीकी, व्यावसायिक, वित्तीय, सुरक्षा, लेखांकन और प्रबंधकीय गतिविधियाँ। प्रबंधकीय गतिविधियों के अंतर्गत उन्होंने Planning, Organising, Command, Coordination और Control (POCCC) मॉडल प्रस्तुत किया।
(क) प्रशासन के 14 सिद्धांत
- फेयोल के 14 सिद्धांत—कार्य विभाजन, आदेश की एकता, अनुशासन, केंद्रीकरण, न्याय, स्थायित्व आदि—शास्त्रीय संगठन सिद्धांत को सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
(ख) प्रशासक के गुण
- फेयोल ने एक अच्छे प्रशासक के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, शैक्षणिक, तकनीकी गुणों और अनुभव पर बल दिया। यह दृष्टिकोण संगठन में मानव तत्व को आंशिक रूप से स्वीकार करता है।
- मैक्स वेबर का नौकरशाही (Bureaucracy) सिद्धांत
- मैक्स वेबर (1864–1920) ने नौकरशाही को आधुनिक संगठन का सर्वाधिक तर्कसंगत रूप माना। उन्होंने Ideal Type की पद्धति के माध्यम से नौकरशाही का विश्लेषण किया।
(क) सत्ता और वैधता
- वेबर ने शक्ति और प्राधिकार में अंतर करते हुए तीन प्रकार की सत्ता बताई—परंपरागत, करिश्माई और वैधानिक‑तर्कसंगत। नौकरशाही वैधानिक‑तर्कसंगत सत्ता पर आधारित होती है।
(ख) नौकरशाही की विशेषताएँ
- स्पष्ट श्रम विभाजन, पदसोपान, नियमों की व्यवस्था, तकनीकी योग्यता पर आधारित नियुक्ति, वेतन‑पेंशन प्रणाली और निष्पक्षता ये सभी नौकरशाही को अधिकतम कार्यकुशल बनाते हैं।
(ग) आलोचना
- लास्की और कार्ल फ्रेडरिक ने नौकरशाही को लोकतंत्र के लिए खतरा माना। स्वयं वेबर ने भी माना कि नौकरशाही में मानवीय संवेदनशीलता का अभाव है।
- वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत : एफ. डब्ल्यू. टेलर
- एफ. डब्ल्यू. टेलर (1856–1915) को वैज्ञानिक प्रबंधन का पिता कहा जाता है। उनकी पुस्तक “Principles of Scientific Management” (1911) ने संगठन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
- टेलर ने समय अध्ययन, गति अध्ययन और थकान अध्ययन के माध्यम से अधिकतम उत्पादन पर बल दिया। Mental Revolution, मानकीकरण, वैज्ञानिक चयन एवं प्रशिक्षण, प्रोत्साहन आधारित वेतन प्रणाली ये उनके सिद्धांतों के प्रमुख तत्व हैं।
- वैज्ञानिक प्रबंधन का उद्देश्य केवल उत्पादन वृद्धि नहीं, बल्कि श्रमिकों और समाज की समृद्धि भी है।
- एल्टन मायो और मानव संबंध सिद्धांत
- एल्टन मायो ने शास्त्रीय और वैज्ञानिक प्रबंधन की यांत्रिक दृष्टि की आलोचना करते हुए संगठन में मानव व्यवहार को केंद्र में रखा। हार्थोन प्रयोगों (1924–1932) ने सिद्ध किया कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारक उत्पादन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
- मायो ने बताया कि अनौपचारिक संगठन, समूह भावना, नेतृत्व शैली और संप्रेषण श्रमिक संतोष और उत्पादकता को बढ़ाते हैं।
- मानव संबंध सिद्धांत ने संगठन को एक सामाजिक प्रणाली के रूप में देखा। डगलस मैकग्रेगर, क्रिस आर्गिरिस और लिकर्ट जैसे विद्वानों ने इसी आधार पर आधुनिक मानवतावादी प्रबंधन को विकसित किया।
- आलोचकों ने मायो को यूनियन‑विरोधी और आर्थिक पहलुओं की उपेक्षा करने वाला कहा, फिर भी संगठनात्मक व्यवहार के अध्ययन में उनका योगदान ऐतिहासिक है।
निष्कर्ष
संगठन के सिद्धांतों का विकास प्रशासन और प्रबंधन को अधिक प्रभावी, दक्ष तथा उद्देश्यपरक बनाने के प्रयासों का परिणाम है। वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत, अधिकारी तंत्र (नौकरशाही) सिद्धांत और मानव संबंध सिद्धांत ये तीनों संगठन को समझने की अलग-अलग, किंतु परस्पर पूरक दृष्टियाँ प्रस्तुत करते हैं।
वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत (एफ. डब्ल्यू. टेलर) ने संगठन को एक उत्पादन तंत्र के रूप में देखा और कार्यकुशलता, मानकीकरण, समय-गति अध्ययन तथा वैज्ञानिक चयन-प्रशिक्षण पर बल दिया। इससे उत्पादन और दक्षता में वृद्धि हुई, परंतु मनुष्य को “मशीन के पुर्जे” की तरह देखने के कारण मानवीय भावनाओं और सामाजिक आवश्यकताओं की उपेक्षा हुई।
अधिकारी तंत्र सिद्धांत (मैक्स वेबर) ने संगठन को वैधानिक-तर्कसंगत व्यवस्था के रूप में स्थापित किया। स्पष्ट नियम, पदसोपान, अधिकार-उत्तरदायित्व की निश्चितता और निष्पक्षता ने प्रशासन को स्थिरता, पूर्वानुमेयता और निरंतरता प्रदान की। किंतु अत्यधिक औपचारिकता और कठोरता के कारण यह व्यवस्था कई बार अमानवीय और अलोकतांत्रिक प्रतीत होती है।
मानव संबंध सिद्धांत (एल्टन मायो) ने इन दोनों यांत्रिक दृष्टिकोणों की सीमाओं को उजागर करते हुए संगठन को सामाजिक प्रणाली के रूप में समझाया। हार्थोन प्रयोगों ने सिद्ध किया कि अनौपचारिक संगठन, समूह भावना, नेतृत्व शैली और संप्रेषण का श्रमिक संतोष व उत्पादकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हालांकि, इस दृष्टिकोण की आलोचना यह कहकर की गई कि यह आर्थिक और शक्ति-संघर्ष जैसे पहलुओं की उपेक्षा करता है।
समग्र रूप में, आधुनिक संगठनात्मक प्रशासन इन तीनों सिद्धांतों का समन्वय है। प्रभावी संगठन के लिए वैज्ञानिक दक्षता, वैधानिक संरचना और मानवीय संवेदनशीलता तीनों का संतुलन आवश्यक है। इसलिए संगठन के सिद्धांतों का वास्तविक महत्व किसी एक दृष्टिकोण में नहीं, बल्कि उनके समन्वित और व्यावहारिक प्रयोग में निहित है, जो प्रशासन को अधिक लोकतांत्रिक, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बनाता है।
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