प्रस्तावना
अरावली पर्वतमाला केवल पत्थर और मिट्टी का ढेर नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की एक जीवित भौगोलिक विरासत है। विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली, हिमालय से भी करोड़ों वर्ष पुरानी है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण के वैश्विक खतरों से जूझ रहे हैं, तब अरावली की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। दुर्भाग्यवश, पिछले कुछ दशकों में अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप, अवैध खनन और शहरीकरण की तीव्र लालसा ने इस प्रहरी को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है। अरावली का वर्तमान विवाद केवल पर्यावरण बनाम विकास का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

भौगोलिक अवस्थिति और भू-वैज्ञानिक उत्पत्ति
अरावली का विस्तार उत्तर-पश्चिम भारत में एक तिरछी रेखा की तरह है। यह दक्षिण-पश्चिम में गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर, राजस्थान के हृदय से गुजरती हुई, हरियाणा के दक्षिणी हिस्सों को छूती है और अंततः दिल्ली के मध्य में स्थित रायसीना हिल्स पर समाप्त होती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 692 किलोमीटर है।
भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अरावली की उत्पत्ति ‘प्रि-कैम्ब्रियन’ युग (लगभग 2.5 बिलियन वर्ष पूर्व) में ‘अरावली-दिल्ली ओरोजेनी’ (Aravalli-Delhi Orogeny) के दौरान हुई थी। यह मूल रूप से एक वलित पर्वत (Fold Mountain) था, जो अपनी जवानी में आज के हिमालय से भी ऊँचा रहा होगा। लाखों वर्षों के अपरदन (Erosion) और अपक्षय ने इसे एक ‘अवशिष्ट पर्वत’ (Residual Mountain) के रूप में बदल दिया है। यहाँ की चट्टानों में मुख्य रूप से क्वार्टजाइट, शिस्ट, नीस और संगमरमर पाए जाते हैं, जो इसे खनिज की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाते हैं।

अरावली का पर्यावरणीय और पारिस्थितिक महत्व
अरावली उत्तर भारत के लिए एक ‘पारिस्थितिक सुरक्षा कवच’ का कार्य करती है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण: थार मरुस्थल की पूर्व की ओर बढ़ती हुई रेत के लिए अरावली एक प्राकृतिक अवरोधक है। यदि अरावली की पहाड़ियां गायब होती हैं, तो हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदान मरुस्थल में बदल जाएंगे।
जलवायु नियामक: यह पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा को दिशा देने में मदद करती है, जिससे राजस्थान के पूर्वी हिस्सों में वर्षा होती है। इसके अलावा, यह दिल्ली-एनसीआर के बढ़ते तापमान को कम करने में ‘हीट सिंक’ की भूमिका निभाती है।
जल पुनर्भरण (Groundwater Recharge): अरावली की पहाड़ियाँ और उनके बीच की घाटियाँ वर्षा जल के लिए प्राकृतिक अवशोषक का कार्य करती हैं। यह क्षेत्र दिल्ली और दक्षिणी हरियाणा के गिरते भू-जल स्तर को थामे रखने का एकमात्र जरिया है। बड़खल झील, सूरजकुंड और दमदमा जैसी झीलें इसी तंत्र का हिस्सा हैं।
जैव विविधता का भंडार: यहाँ शुष्क कटीले वनों से लेकर उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यह तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, सियार, नीलगाय और पक्षियों की लगभग 200 से अधिक प्रजातियों का घर है। यह ‘सरिस्का टाइगर रिजर्व’ और ‘असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य’ जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों को जोड़ती है।

खनन की समस्या और वर्तमान विवाद का केंद्र
अरावली की वर्तमान चर्चा का मुख्य कारण इसका तीव्र क्षरण है। राजस्थान और हरियाणा के सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध और वैध दोनों प्रकार के खनन ने पहाड़ियों को मैदान में बदल दिया है। ‘सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी’ (CEC) ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि अरावली की 128 पहाड़ियों में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।
विवाद का एक बड़ा हिस्सा ‘वन भूमि’ की परिभाषा को लेकर है। हरियाणा सरकार ने ‘पंजाब अनुसूचित भूमि संरक्षण अधिनियम’ (PLPA) में संशोधन के माध्यम से अरावली के बड़े हिस्से को वन की श्रेणी से बाहर करने का प्रयास किया, ताकि वहां रियल एस्टेट और निर्माण कार्यों को अनुमति दी जा सके। इसी तरह, राजस्थान में संगमरमर और ग्रेनाइट खनन के लिए दिए गए पट्टों ने पारिस्थितिक संवेदनशीलता को ताक पर रख दिया है। अरावली में ‘माइनिंग माफिया’ और स्थानीय प्रशासन के बीच का गठजोड़ इस संकट को और गहरा बनाता है।

न्यायिक हस्तक्षेप और ऐतिहासिक निर्णय
जब कार्यपालिका अरावली को बचाने में विफल रही, तब न्यायपालिका ने इसकी कमान संभाली। अरावली के संरक्षण के इतिहास में कुछ महत्वपूर्ण मोड़ निम्नलिखित हैं:
- अरावली अधिसूचना 1992: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अरावली के संवेदनशील क्षेत्रों में खनन और निर्माण पर रोक लगाने के लिए यह अधिसूचना जारी की थी।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (2004): सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरियाणा के फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में सभी प्रकार के खनन पर रोक लगा दी। न्यायालय ने ‘सावधानी का सिद्धांत’ (Precautionary Principle) लागू किया।
- कांट एंक्लेव मामला (2018): सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली की पहाड़ियों पर बने ‘कांट एंक्लेव’ को अवैध घोषित कर उसे गिराने का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली में किया गया कोई भी निर्माण “पारिस्थितिक विनाश” है।
- हालिया रुख (2024): न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि अरावली की सुरक्षा राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वन भूमि के उपयोग को लेकर कोई भी ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
समितियाँ और उनकी प्रमुख अनुशंसाएँ
समय-समय पर विशेषज्ञों ने अरावली को बचाने के लिए सुझाव दिए हैं:
एम.जी.के. मेनन समिति: इस समिति ने पहली बार अरावली के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Eco-Sensitive Zones) का मानचित्रण करने का सुझाव दिया था।
भूरूचा समिति: इसने खनन के कारण होने वाले भारी धातु प्रदूषण और धूल के कणों (PM 2.5/10) के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया और खनन क्षेत्रों को बफर जोन से दूर रखने की सिफारिश की।
CEC (Central Empowered Committee): इसने सर्वोच्च न्यायालय को सुझाव दिया कि अरावली की हर पहाड़ी का एक विशिष्ट ‘आईडी नंबर’ होना चाहिए और उपग्रह इमेजरी के माध्यम से हर तीन महीने में इसकी निगरानी होनी चाहिए।

विपक्ष और पक्ष के तर्क
विपक्ष (उद्योग और विकास के पैरोकार): इनका तर्क है कि अरावली के पत्थर और खनिज निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक हैं। खनन बंद होने से हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी और राजस्व का नुकसान होता है। साथ ही, दिल्ली-एनसीआर के बढ़ते दबाव को देखते हुए नए रिहाइशी इलाकों के लिए जमीन की आवश्यकता है।
पक्ष (पर्यावरणविद और संरक्षणवादी): इनका तर्क वैज्ञानिक है। यदि अरावली नष्ट हुई, तो पारिस्थितिक तंत्र की क्षति की भरपाई अरबों रुपये खर्च करके भी नहीं की जा सकती। धूल भरी आंधियां और जल संकट उत्तर भारत में पलायन की स्थिति पैदा कर देंगे। आर्थिक विकास ‘सतत’ होना चाहिए, न कि विनाशकारी।
वर्तमान आवश्यकताएं: क्या किया जाना चाहिए?
ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ इंडिया: अफ्रीका की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ की तर्ज पर भारत सरकार ने गुजरात से दिल्ली तक अरावली के साथ-साथ एक विशाल वृक्षारोपण गलियारा बनाने की योजना बनाई है। इसे कागजों से निकालकर धरातल पर तीव्रता से लागू करना होगा।
समान वन कानून: राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली को अरावली के लिए एक साझा ‘अरावली संरक्षण नीति’ बनानी चाहिए ताकि राज्यों के बीच कानूनी विसंगतियों का लाभ खनन माफिया न उठा सकें।
पारिस्थितिक बहाली (Ecological Restoration): केवल खनन रोकना पर्याप्त नहीं है। जिन पहाड़ियों को खोदा जा चुका है, वहां स्थानीय प्रजातियों के पौधों का रोपण कर उन्हें पुनर्जीवित (Native Species Restoration) करना होगा।
जन भागीदारी: जब तक स्थानीय समुदाय अरावली को अपनी आजीविका और अस्तित्व से जोड़कर नहीं देखेगा, तब तक संरक्षण अधूरा रहेगा।
निष्कर्ष
अरावली केवल राजस्थान या हरियाणा की संपत्ति नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत की जलवायु का आधार स्तंभ है। इसके विनाश का अर्थ है—दिल्ली-एनसीआर का रेगिस्तान में बदलना, भू-जल का सूखना और जैव विविधता का अंत। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। अरावली का हर एक पत्थर उत्तर भारत के अस्तित्व की रक्षा कर रहा है। यदि यह दीवार ढह गई, तो हम प्रकृति के कोप से स्वयं को बचा नहीं पाएंगे।
प्रमाणिक स्रोत और संदर्भ (References)
- Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEFCC): The Aravalli Notification, 1992 and Forest Conservation Act Guidelines.
- Supreme Court of India: Judgments in M.C. Mehta vs. Union of India (2004, 2018, 2022).
- Geological Survey of India (GSI): Monograph on the Pre-Cambrian Geology of the Aravalli Range.
- Central Empowered Committee (CEC) Reports: Submitted to the Supreme Court on Illegal Mining in Rajasthan and Haryana.
- WII (Wildlife Institute of India): Ecological Assessment of the Aravalli Landscape.
- NITI Aayog: Report on Sustainable Development Goals (SDG 15 – Life on Land).
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