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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष:सिंहावलोकन

भारतीय राजनीति के फलक पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की उपस्थिति महज एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में रही है। आज जब यह आंदोलन अपने सौ वर्ष पूरे कर रहा है, तो इसकी यात्रा का विश्लेषण करना अनिवार्य हो जाता है। इस पार्टी की स्थापना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में हुई थी जब देश न केवल विदेशी दासता से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था, बल्कि समाज के भीतर व्याप्त आर्थिक और सामाजिक विषमताओं से भी लड़ रहा था। इन सौ वर्षों में कम्युनिस्टों ने भारत के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है, जिसके अपने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष रहे हैं।

स्थापना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की जड़ें यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलनों में निहित हैं, जहां फ्रांसीसी क्रांति ने राजतंत्र और पूंजीवाद के विरुद्ध बायें-दायें द्वंद्व को जन्म दिया। कार्ल मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था की अंतर्विरोधों से उसके पतन और समाजवाद की स्थापना की भविष्यवाणी की, लेकिन यह क्रांति सबसे पहले 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति में हुई, जिसने उपनिवेशित देशों को नई प्रेरणा दी। भारत में यह विचारधारा एम.एन. रॉय जैसे क्रांतिकारियों के माध्यम से पहुंची, जिन्होंने ताशकंद में प्रारंभिक कम्युनिस्ट समूह बनाया।

1920 के दशक में भारत में तीन धाराएं कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूत करने वाली रहीं। पहली, प्रवासी क्रांतिकारियों जैसे एम.एन. रॉय और वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय की, जो कोमिंटर्न से जुड़े। दूसरी, स्वदेशी वामपंथी समूह जैसे लाहौर के गुलाम हुसैन, बंबई के एस.ए. दांगे, कलकत्ता के मुफ्फर अहमद और मद्रास के सिंगारावेलु चेट्टियर के नेतृत्व में। तीसरी, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस जैसे मजदूर-किसान संगठन। कानपुर सम्मेलन इन सभी धाराओं का संगम था, जहां पार्टी ने मजदूर-किसान गणराज्य की स्थापना और उत्पादन साधनों के सामाजीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया। हालांकि, कुछ धड़े ताशकंद को सीपीआई स्थापना दिवस मानते हैं, जबकि कानपुर को भारतीय कम्युनिज्म का प्रतीक माना जाता है।

स्वतंत्रता पूर्व विस्तार

स्वतंत्रता पूर्व काल में सीपीआई का विस्तार गुप्त और संघर्षपूर्ण रहा। 1920-30 के दशक में पार्टी ने कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामले और मेरठ षड्यंत्र मामले का सामना किया, जिसमें प्रमुख नेताओं को लंबी कैद हुई। ब्रिटिश सरकार ने पार्टी पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन यह मजदूर हड़तालों और किसान आंदोलनों के माध्यम से फैली। वर्कर्स एंड पेजेंट्स पार्टी के जरिए कांग्रेस के साथ संवाद की कोशिश की गई, लेकिन कोमिंटर्न की नीतियों ने इसे अलगाव की ओर धकेला।

1930 के दशक में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से संयुक्त मोर्चा बना, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पार्टी ने फासीवाद विरोध को प्राथमिकता दी और क्विट इंडिया आंदोलन का विरोध किया, जिससे विवाद बढ़ा। तेभागा आंदोलन और तेलंगाना संघर्ष जैसे किसान विद्रोहों ने पार्टी को मजबूत आधार दिया। 1946 के चुनावों में विधानसभा सीटें जीतीं और संविधान सभा में प्रतिनिधि चुने गए। इस प्रकार, सीपीआई ने औद्योगिक केंद्रों जैसे कानपुर, बंबई और कलकत्ता में मजबूत जड़ें जमाईं।

स्वतंत्रता के बाद विस्तार

स्वतंत्रता के बाद सीपीआई का विस्तार दुविधा पूर्ण रहा।1947 में स्वतंत्रता के बाद, कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। 1952 के पहले आम चुनाव में यह मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। 1957 में केरल में ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में विश्व की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनाकर पार्टी ने इतिहास रचा। हालांकि, 1960 के दशक की शुरुआत में विचारधारा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति (चीन-सोवियत विवाद) को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद गहरे हो गए। इसके परिणामस्वरूप 1964 में पार्टी विभाजित हो गई और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा का जन्म हुआ। बाद के वर्षों में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल इनके मजबूत गढ़ बने, जहाँ दशकों तक वामपंथी सरकारों ने शासन किया। इन राज्यों में भूमि सुधार और साक्षरता जैसे क्षेत्रों में किए गए कार्यों ने पार्टी के आधार को व्यापक बनाया।

1970-77 में कांग्रेस से गठबंधन किया, लेकिन बाद में विभिन्न मोर्चों में भागीदारी की। वर्तमान में केरल के एलडीएफ, तमिलनाडु के एसपीए में भागीदार है, जहां कैबिनेट मंत्री हैं। लोकसभा और राज्यसभा में सांसद हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खो दिया। संगठनात्मक रूप से एआईटीयूसी, एआईकेएस जैसे जन संगठनों के माध्यम से उत्तर भारत से दक्षिण तक फैली।

 

योगदान के सकारात्मक पक्ष

भारतीय समाज और राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी का योगदान बहुआयामी रहा है। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात, इस दल ने निरंतर हाशिए के समूहों—दलितों, आदिवासियों और श्रमिकों—के अधिकारों की पैरवी की। भारतीय संविधान के निर्माण में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता जैसे मूल्यों को शामिल करवाने में कम्युनिस्ट विचारधारा का बड़ा प्रभाव रहा। भूमि सुधार कानूनों को लागू करवाना इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, जिससे सामंती व्यवस्था की कमर टूटी और गरीब किसानों को अपनी जमीन का मालिकाना हक मिला। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का संरक्षण, न्यूनतम मजदूरी कानून, और सूचना का अधिकार जैसे प्रगतिशील कानूनों के पीछे वामपंथी दबाव और आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सांस्कृतिक मोर्चे पर ‘इप्टा’ (IPTA) जैसे संगठनों के माध्यम से इन्होंने कला और साहित्य को आम जनमानस से जोड़ने का काम किया।

नकारात्मक पक्ष

जहाँ एक ओर पार्टी ने शोषितों की आवाज उठाई, वहीं कुछ ऐतिहासिक निर्णयों और वैचारिक जड़ता के कारण इसे तीखी आलोचना का भी सामना करना पड़ा। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान सोवियत संघ के युद्ध में शामिल होने के कारण पार्टी द्वारा ब्रिटिशों का समर्थन करना एक ऐसा निर्णय था जिसने इसे मुख्यधारा के स्वतंत्रता आंदोलन से कुछ समय के लिए अलग-थलग कर दिया। स्वतंत्रता के बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय कुछ नेताओं के रुख ने इनकी राष्ट्रभक्ति पर सवाल खड़े किए। वैचारिक स्तर पर, संसदीय लोकतंत्र और सशस्त्र क्रांति के बीच के द्वंद्व ने भी पार्टी को कमजोर किया, जिसके कारण नक्सलवाद जैसी हिंसक धाराओं का जन्म हुआ। इसके अलावा, जिन राज्यों में वामपंथियों का लंबे समय तक शासन रहा, वहां औद्योगिक विकास की गति धीमी होने और राजनीतिक हिंसा के आरोपों ने भी इनकी छवि को प्रभावित किया।

उपसंहार और आगे की राह

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष संघर्षों, उपलब्धियों और आत्ममंथन की एक लंबी कहानी है। आज के समय में जब वैश्विक स्तर पर उदारवाद और दक्षिणपंथ का प्रभाव बढ़ रहा है, वामपंथ के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। पार्टी को अपनी वैचारिक जड़ता को छोड़कर ‘डिजिटल इकोनॉमी’ और ‘गिग वर्कफोर्स’ जैसे समकालीन मुद्दों के साथ जुड़ना होगा। भारत जैसे विविध समाज में वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जाति और लिंग के संघर्षों को भी उतनी ही प्रमुखता देनी होगी। यदि यह आंदोलन अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए खुद को आधुनिक भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप ढालने में सफल रहता है, तो आने वाली शताब्दी में भी यह भारतीय लोकतंत्र में एक संतुलित और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए एक सशक्त प्रहरी बना रह सकता है।

 

स्रोत: 

इंडियन एक्सप्रेस आर्टिकल:

https://www.google.com/amp/s/indianexpress.com/article/explained/explained-history/100-years-of-cpi-how-indias-communist-movement-came-to-be-10439181/lite/

 

द हिन्दू आर्टिकल:

https://www.google.com/amp/s/www.thehindu.com/news/national/carrying-the-red-flag-into-the-next-century/article70437256.ece/amp/


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