बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में फ्रांसिस फुकुयामा ने ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा करते हुए यह तर्क दिया था कि उदारवादी लोकतंत्र और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था मानवीय शासन का अंतिम स्वरूप है। लेकिन आज, 2025 के दहलीज पर खड़े होकर जब हम विश्व व्यवस्था को देखते हैं, तो वह दावा न केवल अधूरा बल्कि भ्रामक प्रतीत होता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि इतिहास थमा नहीं है, बल्कि उसने एक ऐसी करवट ली है जिसने हमारे पुराने वैचारिक दिशा-सूचकों (Compasses) को अप्रासंगिक बना दिया है। भारत जैसे उभरते हुए राष्ट्र के लिए, जो एक साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आधुनिक महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन साध रहा है, यह समय किसी पुराने नक्शे पर चलने का नहीं, बल्कि एक नया दिशा-सूचक यंत्र विकसित करने का है।
पुराने प्रतिमानों का बिखराव और अस्थिरता का उदय
पिछले तीन दशकों से वैश्विक राजनीति जिस धुरी पर घूम रही थी, वह अब तेजी से खिसक रही है। शीत युद्ध के बाद का वह ‘एकध्रुवीय क्षण’ जहाँ अमेरिका सर्वशक्तिमान था, अब बहुध्रुवीयता के कोलाहल में खो गया है। वैश्वीकरण, जिसे कभी शांति और समृद्धि का अचूक मंत्र माना जाता था, अब भू-राजनीतिक हथियारीकरण (Weaponization) का साधन बन गया है। देशों के बीच व्यापारिक निर्भरता, जिसे संघर्ष रोकने का कवच समझा जाता था, अब ‘सप्लाई चेन’ की कमजोरियों और आर्थिक ब्लैकमेलिंग का कारण बन गई है। यह बदलाव केवल सत्ता के केंद्रों में नहीं आया है, बल्कि उन मूल्यों में भी आया है जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को संचालित करते थे। अब मानवाधिकारों या लोकतांत्रिक मूल्यों की तुलना में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘आर्थिक संप्रभुता’ अधिक प्रभावी तर्क बन गए हैं।
शक्ति संतुलन का नया स्वरूप: अमेरिका, चीन और बीच में भारत
आज की सबसे बड़ी वास्तविकता अमेरिका और चीन के बीच का वह महान शक्ति संघर्ष है, जो केवल व्यापार या सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की तकनीक, डेटा और विचारधारा पर कब्जे की जंग है। भारत इस संघर्ष के ठीक बीच में खड़ा है। पुराने समय में भारत की रणनीति ‘गुटनिरपेक्षता’ थी, जो दो गुटों के बीच तटस्थ रहने का प्रयास था। लेकिन आज की दुनिया में तटस्थता का अर्थ अप्रासंगिकता हो सकता है। भारत को अब ‘बहु-संरेखण’ (Multi-alignment) की आवश्यकता है, जहाँ वह अपनी शर्तों पर अलग-अलग शक्तियों के साथ जुड़ सके। मेहता का तर्क है कि भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका के साथ उसकी साझेदारी और चीन के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता, दोनों ही किसी तयशुदा ढर्रे पर नहीं चल सकतीं। यह एक गतिशील संतुलन है जिसमें हर कदम पर नए सिरे से विचार करना होगा।
तकनीकी संप्रभुता और आर्थिक राष्ट्रवाद
आधुनिक युग में शक्ति का नया पैमाना परमाणु हथियार नहीं, बल्कि ‘सेमीकंडक्टर’, ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ और ‘क्वांटम कंप्यूटिंग’ हैं। जिस तरह पुराने समय में समुद्रों पर नियंत्रण रखने वाला राष्ट्र दुनिया पर राज करता था, आज डेटा और एल्गोरिदम पर नियंत्रण रखने वाला राष्ट्र ही भविष्य तय करेगा। भारत के लिए नया दिशा-सूचक यंत्र इस बात पर निर्भर करेगा कि वह तकनीक के मामले में कितना आत्मनिर्भर बन पाता है। आर्थिक राष्ट्रवाद अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि मजबूरी है। जब दुनिया की बड़ी शक्तियां अपने उद्योगों को बचाने के लिए संरक्षणवाद का सहारा ले रही हैं, तब भारत ‘मुक्त व्यापार’ के पुराने सिद्धांतों पर टिके रहकर अपना नुकसान नहीं कर सकता। भारत को अपनी ‘पूंजी’ और ‘बाजार’ का उपयोग एक भू-राजनीतिक लाभ (Leverage) के रूप में करना होगा।

लोकतांत्रिक पहचान और वैश्विक छवि का द्वंद्व
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकतांत्रिक साख रही है। लेकिन वर्तमान समय में, जब दुनिया भर में लोकतंत्र के मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं और ‘मजबूत नेता’ की अवधारणा लोकप्रिय हो रही है, भारत को अपनी आंतरिक और बाहरी छवि के बीच के तालमेल पर विचार करना होगा। क्या भारत केवल एक ‘शक्तिशाली’ राष्ट्र बनना चाहता है या एक ‘अनुकरणीय’ राष्ट्र? मेहता के विश्लेषण में यह संकेत मिलता है कि भारत का प्रभाव केवल उसकी सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगा कि वह अपने भीतर विविधता और असहमति को कितनी जगह देता है। यदि भारत का आंतरिक सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव वैश्विक मंच पर भी कम होगा। एक नया दिशा-सूचक यंत्र तभी काम करेगा जब वह नैतिक मूल्यों और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बिठा पाए।
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक उत्तरदायित्व
2025 की दुनिया में किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति जलवायु परिवर्तन के संकट से अछूती नहीं रह सकती। यह वह मोर्चा है जहाँ ‘पुराना दिशा-सूचक’ पूरी तरह विफल रहा है। विकसित देशों ने दशकों तक पर्यावरण की कीमत पर विकास किया और अब विकासशील देशों पर पाबंदियां लगा रहे हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी विशाल आबादी को गरीबी से बाहर निकालने के लिए ऊर्जा की मांग को कैसे पूरा करे, जबकि उसे वैश्विक कार्बन लक्ष्यों का भी सम्मान करना है। यहाँ भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की आवाज बनना होगा। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि जलवायु न्याय केवल कागजों पर न रहे, बल्कि तकनीक और वित्त का हस्तांतरण वास्तविक रूप में हो।
निष्कर्ष: अनिश्चितता के दौर में स्वायत्तता की तलाश
अंततः, यह समझना होगा कि दुनिया अब उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ पुराने नियम काम नहीं करेंगे। ‘इतिहास का अंत’ नहीं हुआ है, बल्कि इतिहास ने अपनी गति तेज कर दी है। भारत के लिए नया दिशा-सूचक यंत्र कोई तैयार दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है। इसमें लचीलापन, रणनीतिक स्वायत्तता और अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व—इन तीनों का समावेश होना चाहिए। भारत को एक ऐसी विश्व व्यवस्था का निर्माण करने की दिशा में काम करना होगा जो किसी एक महाशक्ति के अधीन न हो, बल्कि नियम-आधारित और न्यायपूर्ण हो। भविष्य उन राष्ट्रों का है जो अनिश्चितता के इस कोहरे में अपनी दिशा स्वयं तय कर सकते हैं, न कि उनका जो दूसरों के पुराने नक्शों पर चलते हैं।
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