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वेनेजुएला-अमेरिका संकट: 21वीं सदी का नया भू-राजनीतिक संघर्ष

दक्षिण अमेरिका के सबसे समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों वाले देश, वेनेजुएला और दुनिया की महाशक्ति अमेरिका के बीच संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन 3 जनवरी 2026 की सुबह ने इस संघर्ष को एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निर्देशित ‘ऑपरेशन सदर्न स्पियर’ (Operation Southern Spear) के तहत काराकास पर किए गए हवाई हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की कथित गिरफ्तारी ने न केवल लैटिन अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है।

वर्तमान घटनाक्रम: एक ऐतिहासिक सैन्य हस्तक्षेप

3 जनवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय समाचारों में उस समय हड़कंप मच गया जब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने पुष्टि की कि अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला की राजधानी काराकास में लक्षित हवाई हमले किए हैं। इस सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनके करीबी सहयोगियों को नार्को-टेररिज्म (नशीली दवाओं के आतंकवाद) के आरोपों में हिरासत में लेना था।

  • ऑपरेशन का स्वरूप: अमेरिकी विमानों ने फोर्ट टिउना (Fuerte Tiuna) और ला कारलोटा (La Carlota) जैसे प्रमुख सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।
  • पकड़ और प्रत्यर्पण: अमेरिकी राष्ट्रपति ने आधिकारिक बयान में दावा किया कि मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोर्स को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया है, जहाँ वे आपराधिक मुकदमों का सामना करेंगे।
  • वेनेजुएला की प्रतिक्रिया: वेनेजुएला के रक्षा मंत्री व्लादिमीर पाद्रिनो लोपेज ने इसे “इतिहास का सबसे बुरा आक्रमण” करार देते हुए देश भर में सेना की तैनाती कर दी है और जनता से प्रतिरोध का आह्वान किया है।

ऐतिहासिक संबंध और संघर्ष की पृष्ठभूमि

वेनेजुएला और अमेरिका के ऐतिहासिक संबंधों का सफर आपसी सहयोग से शुरू होकर गहरे अविश्वास और शत्रुता तक पहुँचा है।

(a) 20वीं सदी: तेल पर आधारित प्रगाढ़ मित्रता

20वीं शताब्दी के अधिकांश समय में वेनेजुएला और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध बेहद घनिष्ठ और रणनीतिक थे। 1920 के दशक में जब वेनेजुएला के ‘मराकाइबो बेसिन’ में तेल के विशाल भंडारों की खोज हुई, तब अमेरिकी तेल कंपनियों (जैसे स्टैंडर्ड ऑयल) ने वहां बड़े पैमाने पर निवेश किया। वेनेजुएला जल्द ही दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक और अमेरिका का सबसे भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार बन गया। द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के दौरान, वेनेजुएला ने अमेरिका को तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की, जबकि अमेरिका ने बदले में वेनेजुएला के सैन्य और राजनीतिक कुलीन वर्ग को समर्थन दिया। 1958 में वेनेजुएला में लोकतंत्र की स्थापना के बाद, वह लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हितों का एक मजबूत स्तंभ बना रहा।

(b) 1990 का दशक: आर्थिक संकट और असंतोष का उदय

1980 और 90 के दशक में वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट के कारण वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। तत्कालीन सरकार द्वारा लागू किए गए नव-उदारवादी सुधारों (जैसे कि ‘कारकाज़ो’ दंगों के समय) ने जनता में भारी असंतोष पैदा किया। अमेरिका समर्थित इन आर्थिक नीतियों को आम जनता ने अपनी गरीबी का मुख्य कारण माना। इसी माहौल ने एक करिश्माई सैन्य अधिकारी ह्यूगो शावेज के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। 1998 में शावेज की चुनावी जीत ने दशकों पुराने उस समीकरण को तोड़ दिया जिसमें वेनेजुएला का तेल और कूटनीति वाशिंगटन के इशारों पर चलती थी।

(c) शावेज और ‘बोलिवेरियन क्रांति’ का टकराव

1999 में कार्यभार संभालने के बाद, शावेज ने अपनी ‘बोलिवेरियन क्रांति’ के माध्यम से संसाधनों के पुनर्वितरण और ’21वीं सदी के समाजवाद’ का नारा दिया। संबंधों में निर्णायक मोड़ 2002 में आया, जब शावेज के खिलाफ एक अल्पकालिक सैन्य तख्तापलट हुआ। शावेज ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि इस तख्तापलट की साजिश अमेरिका के ‘सीआईए’ (CIA) द्वारा रची गई थी। इसके बाद, शावेज ने न केवल अमेरिका को “शैतान” कहना शुरू किया, बल्कि तेल को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए क्यूबा, रूस और चीन के साथ एक नया ब्लॉक बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने ‘पेट्रोकैरिब’ जैसी योजनाएं शुरू कीं ताकि लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को कम किया जा सके।

(d) ओबामा से मादुरो तक: प्रतिबंधों का युग

2013 में शावेज की मृत्यु के बाद निकोलस मादुरो ने सत्ता संभाली, लेकिन तब तक संबंध सुधार की गुंजाइश खत्म हो चुकी थी। 2015 में ओबामा प्रशासन ने वेनेजुएला को “अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक असाधारण खतरा” घोषित किया और वहां के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए। मादुरो ने अपने शासन को बचाने के लिए और भी अधिक तानाशाही रुख अपनाया, जिसका जवाब अमेरिका ने आर्थिक घेराबंदी से दिया। ट्रंप प्रशासन के दौरान ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की नीति अपनाई गई, जिसने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पंगु बना दिया और आज की इस सैन्य टकराव की स्थिति का आधार तैयार किया।

द्विपक्षीय संघर्ष के प्रमुख कारण

वेनेजुएला और अमेरिका के बीच चल रहे इस लंबे संघर्ष के पीछे कई गहरे कारण हैं:

  1. विचारधारा का टकराव: अमेरिका वेनेजुएला में लोकतंत्र और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का समर्थक रहा है, जबकि मादुरो शासन ‘समाजवाद’ और केंद्रीकृत नियंत्रण की विचारधारा पर कायम है।
  2. मानवाधिकार और नार्को-टेररिज्म: अमेरिका ने लंबे समय से मादुरो प्रशासन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन और ड्रग तस्करी में शामिल होने का आरोप लगाया है। 2020 में अमेरिकी न्याय विभाग ने मादुरो पर 15 मिलियन डॉलर का इनाम भी रखा था।
  3. ऊर्जा संसाधन और प्रतिबंध: दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार (Proven Oil Reserves) वेनेजुएला के पास है। अमेरिका ने 2019 से वेनेजुएला के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।
  4. क्षेत्रीय प्रभाव और चीन-रूस की भूमिका: अमेरिका लैटिन अमेरिका को अपना ‘पिछवाड़ा’ (Backyard) मानता है। वेनेजुएला में चीन का निवेश और रूस की सैन्य उपस्थिति को अमेरिका अपने ‘मुनरो सिद्धांत’ (Monroe Doctrine) के खिलाफ एक बड़ी चुनौती मानता है।

वर्तमान घटना के क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव

यह सैन्य हस्तक्षेप केवल दो देशों तक सीमित नहीं है; इसके परिणाम विश्वव्यापी होंगे:

क्षेत्रीय प्रभाव (लैटिन अमेरिका)

अस्थिरता और शरणार्थी संकट: पहले से ही 70 लाख से अधिक वेनेजुएलाई नागरिक देश छोड़ चुके हैं। इस सैन्य कार्रवाई से पड़ोसी देशों (कोलंबिया, ब्राजील) में शरणार्थियों की नई लहर आ सकती है।

दो खेमों में बंटा महाद्वीप: क्यूबा, निकारागुआ और बोलीविया जैसे देश अमेरिका की निंदा कर रहे हैं, जबकि अन्य देश लोकतांत्रिक बहाली की उम्मीद में चुप हैं।

वैश्विक भू-राजनीतिक प्रभाव

रूस और चीन की प्रतिक्रिया: रूस और चीन ने इस कार्रवाई को संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। चीन, जिसने वेनेजुएला को अरबों डॉलर का कर्ज दिया है, अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

ऊर्जा सुरक्षा: वैश्विक तेल आपूर्ति में व्यवधान आ सकता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ेगी।

भारत पर प्रभाव: आर्थिक और कूटनीतिक चुनौतियां

भारत के लिए वेनेजुएला संकट एक दोधारी तलवार की तरह है।

  1. ऊर्जा सुरक्षा: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। वेनेजुएला भारत के लिए कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। तेल की कीमतों में उछाल से भारत का ‘चालू खाता घाटा’ (Current Account Deficit) बढ़ सकता है और पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
  2. रणनीतिक संतुलन: भारत के अमेरिका और रूस दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं। इस मुद्दे पर भारत को बहुत सावधानी से कूटनीतिक संतुलन बनाना होगा, जैसा कि उसने यूक्रेन युद्ध के समय किया था।
  3. भारतीय निवेश: रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी (ONGC) जैसे भारतीय उपक्रमों का वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में निवेश है। युद्ध जैसी स्थिति में इन परिसंपत्तियों की सुरक्षा और लंबित बकाये की प्राप्ति अनिश्चित हो जाएगी।
  4. शेयर बाजार में हलचल: वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट देखी जा सकती है, जिससे निवेशकों का भरोसा कम होगा।

आगे की राह: क्या समाधान संभव है?

वर्तमान स्थिति अत्यंत विस्फोटक है। शांतिपूर्ण समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  • अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता: संयुक्त राष्ट्र (UN) या वेटिकन जैसे तटस्थ निकायों को मध्यस्थता करनी चाहिए ताकि वेनेजुएला में रक्तपात को रोका जा सके।
  • पारदर्शी संक्रमण: यदि मादुरो सत्ता से बाहर होते हैं, तो एक निष्पक्ष अंतरिम सरकार का गठन होना चाहिए जो स्वतंत्र चुनाव कराए।
  • प्रतिबंधों में ढील: मानवीय आधार पर अमेरिका को कुछ प्रतिबंधों में ढील देनी चाहिए ताकि वेनेजुएला के आम नागरिकों को भोजन और दवाओं की आपूर्ति हो सके।
  • क्षेत्रीय सहयोग: लैटिन अमेरिकी देशों के संगठन (OAS) को इस संकट के समाधान में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

निष्कर्ष

वेनेजुएला-अमेरिका संकट केवल दो नेताओं या दो देशों के बीच का झगड़ा नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के नियंत्रण, वैचारिक वर्चस्व और वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का प्रतिबिंब है। 3 जनवरी 2026 की सैन्य कार्रवाई ने एक नए युग की शुरुआत कर दी है, जहाँ ‘शासन परिवर्तन’ (Regime Change) के लिए प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप फिर से एक वास्तविकता बन गया है।

दुनिया एक बड़े आर्थिक और मानवीय संकट के मुहाने पर खड़ी है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह समय अपनी ऊर्जा सुरक्षा को विविधता देने और कूटनीतिक रूप से सतर्क रहने का है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने संयम और सूझबूझ से काम नहीं लिया, तो यह संकट 21वीं सदी के सबसे बड़े संघर्षों में से एक बन सकता है।


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