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Utilitarianism (उपयोगितावाद)

उपयोगितावाद आधुनिक राजनीतिक एवं नैतिक दर्शन की एक अत्यंत प्रभावशाली विचारधारा है, जिसने राज्य, कानून, प्रशासन और सार्वजनिक नीति के स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है। यह सिद्धांत मुख्यतः इस धारणा पर आधारित है कि किसी भी कार्य, नियम या नीति की नैतिकता का मूल्यांकन उसके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। उपयोगितावाद का केंद्रीय सूत्र है— “अधिकतम संख्या के लिए अधिकतम सुख”। यह सिद्धांत 18वीं–19वीं शताब्दी के औद्योगिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ।

उपयोगितावाद का अर्थ एवं परिभाषा

उपयोगितावाद के अनुसार, वही कार्य या नीति नैतिक रूप से उचित है जो समाज में सुख की मात्रा को अधिकतम और दुःख की मात्रा को न्यूनतम करे। यहाँ उपयोगिता (Utility) का आशय सुख, आनंद, संतोष अथवा कष्ट के अभाव से है। इस प्रकार उपयोगितावाद एक परिणामवादी (Consequentialist) नैतिक सिद्धांत है, जिसमें उद्देश्य या नीयत से अधिक महत्व परिणाम को दिया जाता है।

जेरेमी बेंथम के शब्दों में,

“प्रकृति ने मानव को दो सर्वोच्च स्वामियों—सुख और दुःख—के अधीन रखा है।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

उपयोगितावाद का उद्भव 18वीं शताब्दी के इंग्लैंड में हुआ, जब वहाँ औद्योगिक क्रांति, पूँजीवाद और लोकतांत्रिक चेतना का विकास हो रहा था। सामंती विशेषाधिकारों, कठोर दंड व्यवस्था और अलोकतांत्रिक कानूनों के विरुद्ध एक ऐसे नैतिक सिद्धांत की आवश्यकता महसूस की गई, जो तर्कसंगत, वैज्ञानिक और मानव-केंद्रित हो। इसी पृष्ठभूमि में उपयोगितावाद ने जन्म लिया।

उपयोगितावाद के प्रमुख विचारक

1. जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham)

बेंथम को उपयोगितावाद का संस्थापक माना जाता है। उनका मानना था कि सुख और दुःख को तर्कसंगत ढंग से मापा जा सकता है और इसी आधार पर कानून एवं नीतियाँ बनाई जानी चाहिए।

(क) सुख का मात्रात्मक दृष्टिकोण

बेंथम के अनुसार सभी सुख समान होते हैं, उनमें गुणात्मक भेद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा—

“Pushpin का खेल भी उतना ही मूल्यवान है जितनी कविता, यदि वह समान सुख देता है।”

(ख) हेडोनिक कैलक्युलस

बेंथम ने सुख को मापने के लिए हेडोनिक कैलक्युलस प्रस्तुत किया, जिसके सात मानदंड हैं—

  1. तीव्रता
  2. अवधि
  3. निश्चितता
  4. समीपता
  5. उत्पादकता
  6. शुद्धता
  7. विस्तार

इसका उद्देश्य यह निर्धारित करना था कि कौन-सा कार्य अधिकतम सुख उत्पन्न करेगा।

(ग) विधि एवं प्रशासन में योगदान

बेंथम ने दंड व्यवस्था, जेल सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता और विधिक सुधारों में उपयोगितावाद को लागू करने का प्रयास किया।

2. जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill)

मिल ने बेंथम के उपयोगितावाद को अधिक नैतिक, मानवीय और परिष्कृत रूप प्रदान किया।

(क) सुखों का गुणात्मक अंतर

मिल के अनुसार सभी सुख समान नहीं होते। उन्होंने उच्च कोटि के बौद्धिक एवं नैतिक सुखों को निम्न कोटि के शारीरिक सुखों से श्रेष्ठ माना।

उनका प्रसिद्ध कथन है—

“संतुष्ट मूर्ख होने से असंतुष्ट सुकरात होना बेहतर है।”

(ख) नियम उपयोगितावाद

मिल ने कार्य उपयोगितावाद के स्थान पर नियम उपयोगितावाद पर बल दिया। उनके अनुसार वे नियम नैतिक हैं, जिनका सामान्य पालन समाज में अधिकतम सुख लाता है।

(ग) स्वतंत्रता और अधिकार

मिल ने उपयोगितावाद को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ा। उनकी पुस्तक On Liberty में व्यक्तिवादी अधिकारों की रक्षा का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

उपयोगितावाद के प्रकार

  1. कार्य उपयोगितावाद (Act Utilitarianism)
    प्रत्येक कार्य को उसके तात्कालिक परिणामों के आधार पर परखा जाता है।
  2. नियम उपयोगितावाद (Rule Utilitarianism)
    ऐसे नियम नैतिक माने जाते हैं, जिनका पालन करने से दीर्घकाल में अधिकतम सुख प्राप्त होता है।

उपयोगितावाद के प्रमुख सिद्धांत

  1. अधिकतम सुख का सिद्धांत
  2. परिणामवाद
  3. निष्पक्षता – प्रत्येक व्यक्ति का सुख समान रूप से महत्वपूर्ण
  4. सुखवाद – सुख ही अंतिम नैतिक मूल्य

उपयोगितावाद का राजनीतिक महत्व

  1. कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
    शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा जैसी नीतियाँ उपयोगितावादी सोच पर आधारित हैं।
  2. लोकनीति निर्माण
    लागत–लाभ विश्लेषण (Cost–Benefit Analysis) उपयोगितावाद का आधुनिक रूप है।
  3. कानून और न्याय
    कानूनों का उद्देश्य अधिकतम सामाजिक कल्याण माना गया।
  4. लोकतांत्रिक शासन
    बहुसंख्यक हितों पर बल उपयोगितावादी दर्शन से जुड़ा है।

उपयोगितावाद की आलोचना

1. अल्पसंख्यक अधिकारों की उपेक्षा

अधिकतम सुख की खोज में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन हो सकता है।

2. न्याय की अनदेखी

यदि अन्याय से बहुसंख्यक सुखी हों, तो क्या वह नैतिक होगा—यह गंभीर प्रश्न है।

3. सुख का मापन कठिन

सुख एक व्यक्तिपरक अनुभव है, जिसे वस्तुनिष्ठ रूप से मापना कठिन है।

4. कांट की आलोचना

कांट के अनुसार नैतिकता कर्तव्य पर आधारित होती है, परिणाम पर नहीं।

5. मार्क्सवादी आलोचना

मार्क्सवाद के अनुसार उपयोगितावाद पूँजीवादी व्यवस्था को नैतिक वैधता प्रदान करता है।

समकालीन प्रासंगिकता

आज उपयोगितावाद—

  • सार्वजनिक नीति
  • विकास अर्थशास्त्र
  • पर्यावरण नीति
  • स्वास्थ्य नीति
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नैतिक निर्णय

जैसे क्षेत्रों में व्यापक रूप से प्रयुक्त हो रहा है।

निष्कर्ष

उपयोगितावाद ने नैतिकता को धार्मिक और पारंपरिक आधारों से मुक्त कर तर्क, अनुभव और मानव-कल्याण पर आधारित किया। यद्यपि इसमें कई सीमाएँ हैं, फिर भी आधुनिक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य की आधारशिला रखने में इसकी भूमिका निर्विवाद है। जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा प्रस्तुत संशोधित उपयोगितावाद अधिकारों, स्वतंत्रता और सुख के बीच संतुलन स्थापित करने का सफल प्रयास करता है। इस प्रकार उपयोगितावाद आज भी राजनीतिक दर्शन में एक जीवंत, प्रासंगिक और विमर्श योग्य सिद्धांत बना हुआ है।


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