Alison Jaggar एक प्रसिद्ध नारीवादी दार्शनिक हैं। उनके विचार नारीवाद, नैतिक दर्शन (ethics), राजनीति और समाजशास्त्र से जुड़े हुए हैं। जैगर का मुख्य तर्क यह है कि स्त्री और पुरुष के बीच जो अंतर दिखाई देता है, वह केवल जैविक नहीं बल्कि सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से निर्मित होता है।
जैगर इस धारणा की आलोचना करती हैं कि ‘लिंग (gender) को केवल शरीर, हार्मोन या प्राकृतिक बनावट से समझा जा सकता है।’ उनके अनुसार मानव जीवन में जीव-विज्ञान, समाज, संस्कृति, तकनीक और श्रमये सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और मिलकर मानव शरीर व पहचान को गढ़ते हैं।
जैविक निर्धारणवाद की आलोचना
एलिसन जैगर कहती हैं कि पहले यह माना जाता था कि पुरुष और स्त्री का अंतर पूरी तरह प्रकृति ने तय किया है। लेकिन यह सोच अधूरी है। समाज, संस्कृति और सामाजिक नियम शरीर को लगातार प्रभावित करते हैं। इसलिए स्त्री-पुरुष का फर्क केवल “प्राकृतिक” नहीं बल्कि सामाजिक रूप से बनाया गया है।
श्रम और समाज का द्वंद्वात्मक संबंध
जैगर के अनुसार मनुष्य जब श्रम करता है, तो वह अपने बाहरी वातावरण को बदलता है। उदाहरण के लिए, काम करने के तरीके, जीवन-शैली और तकनीक वातावरण को प्रभावित करती है। लेकिन वही बदला हुआ वातावरण मानव शरीर, उसकी आदतों और मानसिक स्थिति को भी बदल देता है। इस प्रकार समाज और शरीर के बीच द्वंद्वात्मक (dialectical) संबंध बनता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
समय के दो स्तरों पर प्रभाव
पहला, दीर्घकालीन प्रभाव। हजारों वर्षों में भोजन, श्रम के प्रकार और भौगोलिक परिस्थितियों ने मानव शरीर के विकास को प्रभावित किया है। अलग-अलग समाजों में शारीरिक संरचनाओं में अंतर इसी कारण दिखता है।
दूसरा, अल्पकालीन प्रभाव। एक व्यक्ति के जीवनकाल में तनाव, चिंता, सामाजिक दबाव और काम की प्रकृति उसके शरीर और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। जैगर बताती हैं कि बेचैनी और तनाव केवल मानसिक नहीं होते, बल्कि शरीर के रासायनिक संतुलन से भी जुड़े होते हैं। कई बार दवाओं से इलाज संभव होता है, लेकिन कई स्थितियों में सामाजिक परिस्थितियों को बदलना अधिक ज़रूरी होता है।
स्त्री शरीर और संस्कृति
जैगर विशेष रूप से स्त्री शरीर पर समाज के नियंत्रण को रेखांकित करती हैं। उनके अनुसार स्त्री का शरीर सामाजिक नियमों, सौंदर्य मानकों और सांस्कृतिक अपेक्षाओं के अनुसार ढाला जाता है। इसलिए स्त्री शरीर “प्राकृतिक” से अधिक “सांस्कृतिक” निर्माण है। महिलाओं की खेल प्रतियोगिताओं में हाल के वर्षों में आया सुधार यह दिखाता है कि जब सामाजिक अवसर बढ़ते हैं, तो शारीरिक क्षमताएँ भी विकसित होती हैं।
नारीवादी मानव-विज्ञान का दृष्टिकोण
कुछ समाजों में स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक अंतर बहुत कम पाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जैविक अंतर सार्वभौमिक नहीं होते, बल्कि सामाजिक संरचनाएँ उन्हें बढ़ा या घटा सकती हैं।
निष्कर्ष
अंततः एलिसन जैगर यह निष्कर्ष निकलती हैं कि समाज में दो प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं एक ओर समाज लैंगिक असमानताएँ पैदा करता है और दूसरी ओर वही समाज शरीर, पहचान और व्यवहार को आकार देता है। इसलिए लिंग को केवल प्रकृति का परिणाम नहीं माना जा सकता। लिंग प्रकृति और संस्कृति के निरंतर संवाद का परिणाम है।
एलिसन जैगर की प्रमुख पुस्तकें
1. Feminist Politics and Human Nature
नारीवाद, राजनीति और मानव स्वभाव का विश्लेषण
2. Gender and Knowledge
ज्ञान, लिंग और सत्ता का संबंध
3. Living with Contradictions
नारीवादी सामाजिक सिद्धांत
4. Just Methods
नारीवादी शोध पद्धतियाँ
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