अरस्तू का प्रमुख उद्देश्य ऐसा संविधान खोजने का था जो राजनीतिक अस्थिरता को रोके, क्रांति की संभावनाओं को समाप्त करे तथा नागरिकों को एक अच्छा, सम्मानजनक और नैतिक जीवन जीने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ प्रदान करे। उसने विभिन्न शासन प्रणालियों 156 के गुण-दोषों का गहन अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति मिश्रित संविधान (Mixed Constitution) के माध्यम से ही संभव है।
अरस्तू और प्लेटो का विचार
अरस्तू से पूर्व प्लेटो ने अपनी अंतिम कृति ‘द लॉज़’ में मिश्रित संविधान की अवधारणा प्रस्तुत की थी। प्लेटो का मत था कि राज्यों का पतन अतिवाद के कारण होता है। उसने उदाहरण देकर बताया कि स्पार्टा का पतन अत्यधिक सैन्यवाद के कारण, फ़ारस का पतन निरंकुश शासन के कारण और एथेंस का पतन असीम स्वतंत्रता के कारण हुआ। प्लेटो के अनुसार यदि ये राज्य शक्ति के साथ बुद्धि और स्वतंत्रता के साथ व्यवस्था का संतुलन बनाए रखते, तो वे स्थायी और समृद्ध हो सकते थे। इसी आधार पर प्लेटो ने राजतंत्र और लोकतंत्र के मिश्रण को स्थिर राज्य का आधार माना। अरस्तू ने अपने निष्कर्ष स्वतंत्र रूप से निकाले, फिर भी प्लेटो के ‘उप-आदर्श राज्य’ और अरस्तू के ‘आदर्श राज्य’ में पर्याप्त समानता दिखाई देती है।
शासन के प्रकार

अरस्तू क़ानून की सर्वोच्चता का प्रबल समर्थक था। उसका मानना था कि क़ानून युगों के अनुभवों का परिणाम होता है और जो व्यवस्था समय की कसौटी पर खरी उतरी हो, उसे सहसा त्यागना विवेकपूर्ण नहीं है। सैद्धांतिक रूप से वह यह स्वीकार करता है कि सर्वोत्तम शासन वही होगा जिसमें संपूर्ण सत्ता एक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के हाथों में हो, किंतु व्यवहार में ऐसा कोई सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति नहीं मिलता। पूर्ण सत्ता मिलने पर व्यक्ति क़ानून से ऊपर समझने लगता है और धीरे-धीरे अत्याचारी बन जाता है। इसलिए अरस्तू के अनुसार राजतंत्र सबसे निकृष्ट शासन प्रणाली बन जाती है, क्योंकि शक्ति और सद्गुण एक साथ नहीं रह सकते।
अभिजाततंत्र और राजतंत्र
व्यवहारिक स्तर पर अरस्तू अभिजाततंत्र को राजतंत्र से बेहतर मानता है, क्योंकि इसमें शासन कुछ योग्य व्यक्तियों के हाथों में होता है। परंतु वह यह भी स्वीकार करता है कि यदि इन सीमित व्यक्तियों को पूर्ण सत्ता मिल जाए, तो वे भी भ्रष्ट हो सकते हैं। इसीलिए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मनुष्यों के शासन की अपेक्षा क़ानून का शासन अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि क़ानून निष्पक्ष होता है और निरंकुशता पर अंकुश लगाता है।
लोकतंत्र
अभिजाततंत्र के विकल्प के रूप में अरस्तू लोकतंत्र पर विचार करता है। लोकतंत्र की आलोचना करते हुए वह कहता है कि इसमें महत्त्वपूर्ण निर्णय मतों की संख्या के आधार पर लिए जाते हैं, जबकि सामान्य नागरिक जटिल विषयों को समझने में सक्षम नहीं होते। जैसे चिकित्सा में चिकित्सक, गणित में गणितज्ञ और नौकायन में नाविक ही सही निर्णय दे सकता है, वैसे ही राज्य के जटिल मामलों में निर्णय विशेषज्ञों द्वारा लिया जाना चाहिए। इसी कारण वह दंडाधीशों के चयन को भी अज्ञान जनता के हाथ में देने के पक्ष में नहीं है।
फिर भी अरस्तू लोकतंत्र के एक महत्त्वपूर्ण गुण को स्वीकार करता है। उसका कहना है कि लोग व्यक्तिगत रूप से विशेषज्ञों जितने सक्षम नहीं होते, परंतु सामूहिक रूप से उनका निर्णय कई बार अधिक श्रेष्ठ होता है। वह उदाहरण देता है कि किसी भवन के गुण-दोष को उसमें रहने वाला व्यक्ति निर्माता से बेहतर समझ सकता है और किसी दावत का मूल्यांकन अतिथि रसोइए से बेहतर कर सकता है। इसके अतिरिक्त, थोड़े लोग बहुत जल्दी भ्रष्ट हो जाते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग इतनी शीघ्रता से भ्रष्ट नहीं होते।
इसके बावजूद अरस्तू लोकतंत्र को भी पूर्ण रूप से आदर्श शासन प्रणाली नहीं मानता, क्योंकि यह मिथ्या समानता के सिद्धांत पर आधारित है और इसमें छल-बल से बहुमत प्राप्त कर लिया जाता है, जो हमेशा जनकल्याणकारी नहीं होता। इसलिए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है किअभिजाततंत्र और लोकतंत्र का मिश्रण ही सर्वोत्तम शासन प्रणाली है।
मिश्रित संविधान
अरस्तू के मिश्रित संविधान में मतदान का अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त होगा, जिससे यह लोकतांत्रिक होगा किंतु शासन करने का अधिकार केवल उन नागरिकों को मिलेगा जिन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता सिद्ध की हो, जिससे यह अभिजाततंत्रीय होगा। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलेगा कि वह अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर उच्च पद प्राप्त कर सके, परंतु केवल योग्यता सिद्ध करने के बाद।
अरस्तू के आदर्श राज्य में सार्वजनिक नीतियों का निर्धारण समुदाय द्वारा किया जाएगा, जबकि उनके क्रियान्वयन का दायित्व विशेषज्ञों को सौंपा जाएगा। इस प्रकार यह राज्य जनभागीदारी और दक्षता—दोनों का संतुलन स्थापित करता है।
इस संविधान को सफल बनाने में अरस्तू मध्यवर्ग को सबसे अधिक महत्त्व देता है। मध्यवर्ग न तो अत्यधिक धनी होता है और न अत्यधिक निर्धन। अपनी संख्या के बल पर वह अमीर और गरीब वर्ग के बीच संतुलन बनाए रखता है। उसके निर्णय सामूहिक और विवेकपूर्ण होते हैं, इसलिए वे अधिक स्थिरता प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष
अरस्तू का मिश्रित संविधान उसके ‘स्वर्णिम मध्यमान के सिद्धांत’ पर आधारित है, जिसे उसने नीतिशास्त्र में विकसित किया था। इसके अनुसार हर स्थिति में अतिवाद विनाशकारी होता है और मध्यम मार्ग ही कल्याणकारी होता है। इसी कारण अरस्तू मिश्रित संविधान को सर्वोत्तम संविधान मानता है और मध्यवर्ग को उसका सबसे उपयुक्त आधार।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


