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राजनीति–सिद्धांत के ह्रास का विवाद

1950 के दशक में राजनीति-विज्ञान के क्षेत्र में यह प्रश्न गंभीर रूप से उठने लगा कि क्या आधुनिक युग में राजनीति–सिद्धांत की कोई उपयोगिता बची है या नहीं। अनेक राजनीतिक वैज्ञानिकों का मानना था कि पारंपरिक राजनीति–सिद्धांत अब समकालीन समाज की समस्याओं को समझाने में सक्षम नहीं रह गया है। इसी बहस को राजनीति–सिद्धांत के ह्रास का विवाद” कहा जाता है।

डेविड ईस्टन का विचार

इस बहस में अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक डेविड ईस्टन का योगदान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ईस्टन ने 1953 में अपनी प्रसिद्ध कृति The Political System में यह तर्क प्रस्तुत किया कि परंपरागत राजनीति–सिद्धांत केवल दार्शनिक कल्पनाओं और अटकलों पर आधारित रहा है। उसमें वास्तविक राजनीतिक जीवन और व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया।
ईस्टन के अनुसार परंपरागत राजनीति–सिद्धांत का ध्यान मुख्यतःमूल्यों (Values), जैसे क्या अच्छा है, क्या बुरा है? पर रहा है। लेकिन आधुनिक राजनीति-विज्ञान का उद्देश्य होना चाहिए तथ्यों और व्यवहार का निष्पक्ष अध्ययन। इसलिए राजनीति–सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार पर पुनः स्थापित करना आवश्यक है।
ईस्टन ने यह भी कहा कि परंपरागत राजनीति–सिद्धांत अपने-अपने ऐतिहासिक काल की उपज था। उदाहरण के लिए, प्लेटो का विचार प्राचीन यूनान की परिस्थितियों से जुड़ा था, मध्यकालीन विचार अपने समय की सामाजिक संरचना से, और पुनर्जागरण काल का चिंतन उस युग की समस्याओं से जुड़ा था। इसलिए आधुनिक औद्योगिक और लोकतांत्रिक समाज में उन विचारों की प्रासंगिकता बहुत कम रह गई है
ईस्टन के अनुसार, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान जैसे सामाजिक विज्ञानों ने वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर काफी प्रगति की है, जबकि राजनीति-विज्ञान इस मामले में पीछे रह गया। इसलिए उन्होंने राजनीति-वैज्ञानिकों को सलाह दी कि वे अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ मिलकर व्यवहारवादी राजनीति-विज्ञान (Behavioural Political Science) का विकास करें।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मार्क्स और जॉन स्टुअर्ट मिल के बाद कोई बड़ा राजनीतिक दार्शनिक सामने नहीं आया। अतः पुराने सिद्धांतों से लगातार जुड़े रहना राजनीति-विज्ञान के विकास में बाधा बन गया है।
व्यवहारवादी दृष्टिकोण में राजनीतिक संस्थाओं के बजाय लोगों के वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, जैसे—निर्णय-प्रक्रिया, मतदान व्यवहार और सत्ता से जुड़ी क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। ईस्टन का मानना था कि इसी दिशा में आगे बढ़कर राजनीति-विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक और उपयोगी बनाया जा सकता है।

अल्फ़्रेड कॉबन

1950 के दशक में राजनीति–सिद्धांत के ह्रास को लेकर कई विद्वानों ने अपने विचार रखे। इसी क्रम में 1953 में अल्फ़्रेड कॉबन ने Political Science Quarterly में प्रकाशित अपने लेख में यह तर्क दिया कि समकालीन समाज में राजनीति–सिद्धांत की कोई विशेष प्रासंगिकता नहीं रह गई है।
कॉबन के अनुसार, आधुनिक समय में न तो पूँजीवादी प्रणालियों में और न ही समाजवादी प्रणालियों में राजनीति–सिद्धांत कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज के युग में उदार लोकतंत्र (Liberal Democracy) तो मौजूद है, लेकिन राजनीति–सिद्धांत इस व्यवस्था को समझाने में असफल रहा है।
कॉबन का कहना था कि आधुनिक लोकतंत्र केवल जनता के शासन तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें नौकरशाही (Bureaucracy), विशाल सैन्य तंत्र (Military) और राजनीतिक दल संगठन (Party Organization) का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। इन संस्थाओं के कारण सत्ता वास्तव में जनता के हाथ में न होकर कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाती है, जिसे अल्पतंत्र (Oligarchy) कहा जाता है। लेकिन राजनीति–सिद्धांत इन वास्तविक स्थितियों को समझाने में असमर्थ रहा है।
कॉबन के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में राजनीति–सिद्धांत की समकालीन समाज में कोई स्पष्ट भूमिका या उपयोगिता दिखाई नहीं देती। इसी कारण उन्होंने कहा कि राजनीति सिद्धांत अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।
हेगेल का ध्यान क्षेत्रीय राज्य पर था। कार्ल मार्क्स का ध्यान सर्वहारा वर्ग पर था। दोनों अपने-अपने तरीके से यह समझना चाहते थे कि मनुष्य का भविष्य और भूमिका क्या है। लेकिन आज की राजनीति बहुत जटिल हो गई है। आज राजनीति में अनेक तरह के समूह और बहुत बड़ी आबादी शामिल है।इसलिए अब हेगेल या मार्क्स के पुराने विचारों से आज की राजनीति को पूरी तरह समझना या दिशा देना संभव नहीं है।
इसके अलावा तार्किक प्रत्यक्षवादी केवल तथ्यों पर ज़ोर देते हैं और मूल्योंको अपने विचार से बाहर कर देते हैं। इस कारण उन्होंने भी राजनीतिक सिद्धांत के कमजोर होने में योगदान दिया। फिर भी अल्फ्रेड कॉबन कहते हैं कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। उनका मानना है कि राजनीति विज्ञान को ऐसे सवालों के जवाब देने चाहिए जिनका जवाब दूसरे सामाजिक विज्ञान नहीं दे पाते। असल में राजनीति विज्ञान को समझदारी से निर्णय लेने के नियम और मानदंड विकसित करने चाहिए। इन्हीं के आधार पर राजनीति विज्ञान का अस्तित्व सार्थक बन सकता है।

मार्टिन लिप्सेट

मार्टिन लिप्सेट ने 1959 में अपनी प्रसिद्ध किताब पॉलिटिकल मैन में कहा कि आज के आधुनिक समाज के लिए जो मूल्य होने चाहिए, वे पहले ही तय हो चुके हैं। उनके अनुसार अमेरिका में एक अच्छे समाज (Good Society) की जो खोज बहुत समय से चल रही थी, वह अब खत्म हो चुकी है, क्योंकि अमेरिका ने उस अच्छे समाज को पा लिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज का लोकतंत्र ही अच्छे समाज का सबसे अच्छा और सबसे नज़दीकी रूप है। इसलिए अब इस विषय पर और बहस करने की ज़रूरत नहीं है। इस तरह लिप्सेट ने राजनीति-सिद्धांत की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए।
लियो स्टॉस ने 1962 में राजनीति-दर्शन के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि राजनीति का जोनया विज्ञानसामने आया है, वही असल में राजनीति के पतन का संकेत है। उनके अनुसार इस नए विज्ञान ने प्रत्यक्षवा सोच को बढ़ावा दिया, जिससे राजनीति के मूल प्रश्न और मूल्य पीछे छूट गए।
पश्चिमी दुनिया में राजनीति के अध्ययन में एक बड़ी समस्या यह रही कि मानकीय प्रश्नों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि वहाँ सामान्य राजनीतिक संकट पैदा हुआ।

लियो स्ट्रॉस

लियो स्ट्रॉस का कहना था कि आधुनिक अनुभवमूलक राजनीति-सिद्धांत (Empirical Theory) यह सिखाता है कि सभी मूल्य बराबर होते हैं।इस सोच के अनुसार कोई विचार अपने आप में ऊँचा या नीचा नहीं होता,सभ्य इंसान और जंगली जानवर के बीच भी कोई बुनियादी अंतर नहीं माना जाता। स्टॉस के अनुसार यह सोच बहुत ख़तरनाक है, क्योंकि इसमें अच्छे और बुरे में फर्क ही खत्म हो जाता है।

डांटे जर्मीनो

इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए डांटे जर्मीनो ने 1967 में अपनी पुस्तकBeyond Ideology: The Revival of Political Theory में कहा कि 19वीं सदी और 20वीं सदी के शुरुआती समय में राजनीति-सिद्धांत के कमजोर होने के दो मुख्य कारण थे प्रत्यक्षवाद (Positivism) जिसमें विज्ञान को सब कुछ मान लिया गया और नैतिक मूल्यों को बाहर कर दिया गया।
राजनीतिक विचारधाराओं का प्रभुत्व खासकर मार्क्सवाद, जो एक पूरी तरह विकसित विचारधारा बनकर सामने आया। लेकिन जर्मीनो के अनुसार अब हालात बदल चुके थे। कई नए और गंभीर विचारकों ने राजनीति-चिंतन को नई दिशा दी, जिससे राजनीति-सिद्धांत का पुनरुत्थान शुरू हुआ।
इन प्रमुख विचारकों में शामिल थे: माइकेल ओकशॉट, हन्ना आरेंट, बाँ द जूवनेल , लियो स्ट्रॉस एरिक बोएगलिन
इसके बाद आने वाले समय में जिन विद्वानों ने राजनीति-दर्शन को और समृद्ध किया, उनमें थे क्रिश्चियन बे, हर्बर्ट मार्क्यूजे, जॉन राल्स, सी. बी. मैकफ़र्सन, युर्गेन हेबरमास,एलेस्डेयर मैकिंटायर, माइकेल वाल्ज़र इन सभी विचारकों की रचनाओं ने यह साबित किया कि राजनीति केवल तथ्यों का अध्ययन नहीं है, बल्कि वह नैतिकता, मूल्य और न्याय से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

हर्बर्ट मार्क्यूज़े (1898–1979)

Herbert Marcuse ने राजनीति और समाज के अध्ययन के तरीकों पर गहराई से विचार किया। उन्होंने यह बताया कि जब सामाजिक विज्ञान में ज़रूरत से ज़्यादावैज्ञानिकतालाने की कोशिश की जाती है, तो यह अपने आप में एक खतरा बन जाती है।
मार्क्यूज़े ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक One-Dimensional Man (1964) में लिखा कि जब सामाजिक विज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान की तरह काम करने लगते हैं, तब वे समाज की वास्तविक समस्याओं पर सवाल उठाना बंद कर देते हैं। प्राकृतिक विज्ञान में चीज़ों को देखा, नापा और मापा जाता है। यही तरीका जब समाज और राजनीति के अध्ययन में अपनाया जाता है, तो अध्ययन बहुत सीमित हो जाता है।
उनके अनुसार, इस प्रवृत्ति में वैज्ञानिक शब्दों की परिभाषा केवल ऐसी क्रियाओं और व्यवहारों के आधार पर दी जाती है जिन्हें आसानी से देखा और मापा जा सके। इसका परिणाम यह होता है कि सामाजिक विज्ञान की भाषा से आलोचनात्मक सोच धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।  यह नहीं पूछा जाता कि कोई व्यवस्था सही है या गलत, बल्कि केवल यह देखा जाता है कि वह कैसे काम कर रही है।
मार्क्यूज़े इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। जब चुनावों के दौरान केवल यह देखा जाता है कि कितने लोगों ने वोट डाला, तो इसे जन-सहभागिता का पैमाना मान लिया जाता है। लेकिन इस तरीके से यह सवाल पूछने की गुंजाइश नहीं रहती कि चुनाव की मौजूदा प्रक्रिया वास्तव में लोकतंत्र की भावना को पूरा करती है या नहीं। यह भी नहीं सोचा जाता कि लोग सच में स्वतंत्र होकर मतदान कर रहे हैं या किसी दबाव, भ्रम या मजबूरी में।
मार्क्यूज़े का मानना था कि जब सामाजिक विज्ञान इस तरह केवल आंकड़ों और माप पर टिक जाता है, तब वह समाज को समझने और सुधारने का माध्यम नहीं रहता। इसके बजाय वह समाज को नियंत्रित करने का साधन बन जाता है। यानी सामाजिक विज्ञान, सामाजिक अन्वेषण (Social Inquiry) की जगह सामाजिक नियंत्रण (Social Control) का उपकरण बन जाता है।
इस प्रकार, हर्बर्ट मार्क्यूज़े यह कहना चाहते थे कि सामाजिक विज्ञान का असली उद्देश्य केवल तथ्यों को इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि समाज की मौजूदा व्यवस्थाओं पर आलोचनात्मक दृष्टि डालना भी है। यदि यह आलोचनात्मक दृष्टि खत्म हो जाए, तो समाज एकएक-आयामीसोच में फँस जाता है, जहाँ बदलाव और मुक्ति की संभावना बहुत कम रह जाती 

 

 


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