उत्तर–आधुनिकता (Postmodernism) क्या है?
उत्तर-आधुनिकता को अक्सर अस्पष्टताओं का पात्र (Bucket of Ambiguity) कहा जाता है, क्योंकि यह किसी निश्चित दिशा या सत्य पर विश्वास नहीं करती। इसकी यही बुनियादी प्रकृति इसे एक सर्वव्यापी परिभाषा देने में कठिन बनाती है। यह उन चीज़ों को समझने का प्रयास करती है जो सरल परिभाषाओं से परे (Beyond Definition) हैं और जो उन्हें अस्वीकार या बाधित (Resist or Disrupt) करती हैं।
उत्तर-आधुनिकता सत्य के एकल अर्थ (Single Meaning of Truth) की धारणा को अस्वीकार करती है।
यह समाज, संस्कृति और ज्ञान की प्रकृति से जुड़ी स्थापित धारणाओं को चुनौती देती है। उत्तर-आधुनिकता विविध आख्यानों (Multiplicity of Narratives) का समर्थन करती है और महाआख्यानों (Meta-narratives) की संभावना को नकारती है।
आधुनिकता से उत्तर–आधुनिकता
उत्तर–आधुनिकता (Postmodernism) को आमतौर पर आधुनिकता (Modernism) के प्रभुत्व के विरुद्ध एक तीखी प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है। आधुनिकता औद्योगिक युग की उपज थी, जब पारंपरिक व्याख्या और अभिव्यक्ति के तरीकों की जगह तर्क (Reason) और विज्ञान (Science) ने ले ली थी। तर्क और विज्ञान की मूल प्रवृत्ति बड़े आख्यानों (Grand Narratives) और सिद्धांतों को स्थापित करने की होती है।
इस बीच उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता का एक क्रांतिकारी विकल्प (Radical Alternative) बनकर उभरी।
यह मानती है कि आधुनिकता अत्यधिक केंद्रीकृत और एकरूप है, जिसके कारण यह छोटे समूहों, स्थानीय पहचानों और अल्पसंख्यक आवाज़ों को दबा देती है।
उत्तर–आधुनिकता का विकास
इस शब्द का पहली बार उपयोग 1914 में जे. एम. थॉम्पसन (J.M. Thompson) द्वारा “The Hibbert Journal” में प्रकाशित एक लेख में हुआ था।
उस लेख में उस समय के ईसाई समाज में दृष्टिकोण और विश्वासों में आए परिवर्तन को वर्णित किया गया था।
- बाद में, यह अवधारणा वास्तुकला (Architecture) और साहित्यिक आलोचना (Literary Criticism) में लोकप्रिय हुई, जहाँ इसे आधुनिक वास्तुकला से असंतोष को व्यक्त करने और साहित्यिक ग्रंथों में छिपे “शक्ति–ज्ञान (Power–Knowledge)” संबंधों को उजागर करने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया।
- 19वीं शताब्दी से यह विचारधारा वास्तुकला, साहित्य, कला, दर्शन, नैतिकता, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, नृविज्ञान, अर्थशास्त्र, दंडशास्त्र (Penology) आदि सभी विषयों में फैल गई।
उत्तर-आधुनिक विचारकों के बीच भी मतभेद है कि क्या उत्तर–आधुनिकता आधुनिकता की निरंतरता है या उससे एक पूर्ण विच्छेद (Radical Break)।
ल्योटार (Lyotard), देरिदा (Derrida) और फूको (Foucault) जैसे विचारकों की प्रतिक्रियाएँ यद्यपि प्रबोधन (Enlightenment) परियोजना के विरोध में हैं, फिर भी उनके सिद्धांत उसी ढाँचे के भीतर निर्मित हैं, जिससे उनके कार्यों में एक प्रकार की समानता उत्पन्न होती है।
टेरी ईगलटन (Terry Eagleton) जैसे आलोचकों ने इन समानताओं के आधार पर उत्तर-आधुनिकता को वर्गीकृत करने का प्रयास किया।
मुख्य उत्तर–आधुनिक विचारक (Main Postmodern Thinkers)
जीन फ्रांस्वा ल्योटार (Jean-François Lyotard)
फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक और सांस्कृतिक आलोचक जीन फ्रांस्वा ल्योटार उत्तर-आधुनिक दर्शन के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से एक हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “The Postmodern Condition: A Report on Knowledge” (उत्तर–आधुनिक दशा: ज्ञान पर एक रिपोर्ट) को उत्तर-आधुनिकता की “बाइबिल” कहा जाता है।
- इस ग्रंथ में ल्योटार ने विज्ञान और तकनीक की स्थिति, ज्ञान की बदलती प्रकृति और बड़े आख्यानों (Grand Narratives) के स्थान पर छोटे आख्यानों (Little Narratives) के आगमन पर बल दिया।
- ल्योटार डैनियल बेल और एलन टुरेन के विचारों से सहमत थे कि औद्योगिक समाज से उत्तर-औद्योगिक समाज की ओर एक मूलभूत परिवर्तन हुआ है, जहाँ ज्ञान (Knowledge) उत्पादन का प्रमुख साधन बन गया है। इसी आधार पर उन्होंने उत्तर-आधुनिकता को समझाने का प्रयास किया।
- ल्योटार का मत था कि उत्तर-आधुनिक युग में ज्ञान एक वस्तु (Commodity) बन चुका है।
इस प्रकार ज्ञान अब केवल “ज्ञान के लिए” (Knowledge for Knowledge’s sake) नहीं रहा,
बल्कि शक्ति (Power) और लाभ (Profit) से जुड़ा हुआ है। - ल्योटार के अनुसार, अब जो ज्ञान पर नियंत्रण रखेगा, वही राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करेगा।
उनका अनुमान था कि भविष्य के युद्ध सूचना और ज्ञान के नियंत्रण (Access to Information) के लिए लड़े जाएंगे न कि क्षेत्र (Territory) या विचारधारा (Ideology) के लिए।
जाक देरिदा (Jacques Derrida)
जाक देरिदा फ्रांसीसी दार्शनिक थे, जिन्होंने “Deconstruction” (विघटन) नामक विश्लेषण पद्धति विकसित की।
उन्होंने इस विचार को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Of Grammatology” (1967) में प्रस्तुत किया।
उनका काम मुख्यतः उत्तर–संरचनावाद (Post-Structuralism) और उत्तर–आधुनिक दर्शन से जुड़ा है।
- देरिदा ने पश्चिमी दर्शन की पारंपरिक मान्यताओं — जैसे स्थायी केंद्र (Stable Centre), वस्तुनिष्ठ सत्य (Objective Truth) और पूर्ण अर्थ (Absolute Meaning) पर सवाल उठाया।
उनके अनुसार, पश्चिमी दार्शनिक परंपरा Logocentrism पर आधारित रही है —
अर्थात यह विश्वास कि ज्ञान का एक केंद्रीय और स्वसिद्ध स्रोत होता है। - उन्होंने इस परंपरा को चुनौती देते हुए कहा कि भाषा में अर्थ कभी स्थायी नहीं होता, बल्कि निरंतर बदलता रहता है। किसी भी पाठ (Text) में विरोधाभास, मौन और दरारें (Contradictions and Silences) छिपी होती हैं जो उस पाठ के वास्तविक अर्थ को अस्थिर बना देती हैं।
- देरिदा की “Deconstruction” कोई विधि नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया (A Movement of Reading) है,
जो पाठों के भीतर छिपे अर्थ-संघर्षों (Conflicts of Meaning) को उजागर करती है। - उनके अनुसार, हर द्वैत संरचना (Binary Opposition) जैसे अच्छा/बुरा, सत्य/असत्य, पुरुष/स्त्री, केंद्र/परिधि वास्तव में एक शक्ति संबंध (Power Relation) को प्रकट करती है, जहाँ एक पक्ष को श्रेष्ठ और दूसरे को गौण बना दिया जाता है।
- देरिदा ने यह भी कहा कि भाषण (Speech) की अपेक्षा लेखन (Writing) अधिक ईमानदार और खुला माध्यम है, क्योंकि यह अर्थ की बहुलता को स्वीकार करता है।
मिशेल फूको (Michel Foucault)
मिशेल फूको फ्रांसीसी दार्शनिक और इतिहासकार थे, जो उत्तर-आधुनिक चिंतन के प्रमुख प्रतिनिधि माने जाते हैं।
उनका कार्य राजनीतिक विज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, इतिहास आदि कई क्षेत्रों में फैला है, विशेष रूप से मनोविज्ञान, चिकित्सा, भाषा, अपराध-न्याय व्यवस्था, जेल प्रणाली और यौन आचरण जैसे विषयों पर।
फूको ने अपने कार्यों में दो प्रमुख विश्लेषण विधियाँ अपनाईं-
- ज्ञान की पुरातत्व (Archaeology of Knowledge)– जो उनके आरंभिक कार्यों में दिखाई देती है, और
- शक्ति की वंशावली (Genealogy of Power)– जो उनके बाद के कार्यों में विकसित हुई।
फूको का “वाक्य–विन्यास (Discourse)” सिद्धांत
- वाक्य–विन्यास न केवल “सत्य” का निर्माण करता है, बल्कि यह यह भी तय करता है कि कौन व्यक्ति “सत्य” बोलने का अधिकार रखता है। अपने प्रारंभिक ग्रंथों — जैसे “Madness and Civilization” और “The Order of Things” में फूको ने दिखाया कि “विचार” समय और समाज के साथ कैसे बदलते हैं।
शक्ति (Power) और ज्ञान (Knowledge) का संबंध
- फूको के बाद के लेखन में शक्ति और ज्ञान का गहरा संबंध दिखाई देता है।
उनका प्रसिद्ध कथन है: “शक्ति हर जगह है, क्योंकि यह हर जगह से उत्पन्न होती है।” - उन्होंने कहा कि शक्ति किसी एक वर्ग या व्यक्ति के पास केंद्रित नहीं होती, बल्कि यह पूरे समाज में सूक्ष्म रूप से फैली (Diffuse) होती है – जैसे रिश्तों, संस्थाओं, भाषा और ज्ञान के माध्यम से।
- फूको ने पारंपरिक शक्ति अवधारणाओं (जैसे राजा या राज्य की सर्वोच्चता) को अस्वीकार करते हुए कहा कि “राजनीतिक सिद्धांत को ‘राजा के सिर’ को काट देना चाहिए, अर्थात सत्ता की कल्पना को केवल शासक तक सीमित नहीं रखना चाहिए।”
- फूको ने इसे “Governmentality” (शासन–व्यवहार) कहा- जहाँ सत्ता अब दमन द्वारा नहीं, बल्कि
“स्वतंत्रता का भ्रम” पैदा करके जनता को स्वयं अनुशासित (Self-disciplined) करती है। - उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “Discipline and Punish” में उन्होंने “निगरानी (Surveillance)” को आधुनिक समाज की सबसे प्रभावी शक्ति बताया। जैसे सीसीटीवी या संस्थागत अनुशासन हमें यह महसूस कराता है कि
हम पर निगरानी रखी जा रही है और इस प्रकार हम स्वयं अपने व्यवहार को नियंत्रित करने लगते हैं। - फूको ने इस प्रक्रिया को “Carceral Society” कहा — एक ऐसा समाज जहाँ लोग खुद ही अपनी निगरानी करते हैं।
अर्नेस्टो लैक्लाउ और शांताल मूफ (Ernesto Laclau and Chantal Mouffe)
अर्नेस्टो लैक्लाउ और शांताल मूफ के विचार उत्तर-मार्क्सवादी (Post-Marxist) और उत्तर-आधुनिक चिंतन की दिशा में अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं।
इन दोनों ने पारंपरिक मार्क्सवाद के “वर्ग (Class)” आधारित विश्लेषण की आलोचना की और कहा कि
आधुनिक समाज में अब “एकीकृत वर्गीय चेतना” नहीं रही।
लैक्लाउ और मूफ के अनुसार “वास्तविकता किसी भौतिक हित पर नहीं, बल्कि
सामाजिक रूप से निर्मित विचारों (Discursive Constructions) पर आधारित होती है।”
उन्होंने कहा कि अब केवल “श्रमिक वर्ग” के संघर्ष की बात पर्याप्त नहीं, बल्कि अनेक समानांतर संघर्ष हैं जैसे महिलाएँ, प्रवासी, उपभोक्ता, पर्यावरणवादी, मानवाधिकार आंदोलनों आदि।
इसी आधार पर उन्होंने “Radical Democracy” (मौलिक लोकतंत्र) की अवधारणा दी।
यह लोकतंत्र केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर भी समानता और भागीदारी को महत्व देता है।
लैक्लाउ और मूफ के उत्तर–आधुनिक विचारों की प्रमुख विशेषताएँ
- उन्होंने आवश्यकतावाद (Essentialism) और आधारवाद (Foundationalism) को अस्वीकार किया।
उनके अनुसार, मनुष्य न तो एक शाश्वत तत्व है और न ही कोई सार्वभौमिक सत्य।
वह हमेशा ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में निर्मित होता है। - उन्होंने ज्ञान, सत्य और विज्ञान को सामाजिक निर्माण (Social Construction) का परिणाम बताया,
जो हमेशा शक्ति–संबंधों (Power Relations) से जुड़ा होता है। - उन्होंने बड़े आख्यानों (Meta-narratives) को नकारा और छोटे आख्यानों (Little Narratives) की स्वीकृति पर बल दिया।
- उन्होंने विविधता (Plurality), सापेक्षता (Relativism) और भिन्नताओं का उत्सव (Celebration of Differences) को उत्तर-आधुनिकता का केंद्र माना।
- उनके अनुसार, उत्तर-आधुनिकता न तो ज्ञान–विरोधी (Anti-knowledge) है,
न ही तर्क–विरोधी (Anti-reason) बल्कि यह तर्क की सीमाओं को पहचानती है और उसकी आलोचना के माध्यम से नए विचार-क्षेत्र खोलती है।
उत्तर–आधुनिकता और उत्तर–संरचनावाद (Postmodernism and Post-Structuralism)
उत्तर-आधुनिकता (Postmodernism) और उत्तर-संरचनावाद (Post-Structuralism) में कई समानताएँ पाई जाती हैं। हालाँकि दोनों की दृष्टि का क्षेत्र अलग-अलग है-
- उत्तर–आधुनिकता (Lyotard, Foucault आदि) मुख्यतः समाज, संस्कृति और इतिहास की व्याख्या करती है,
जबकि - उत्तर–संरचनावाद (मुख्यतः Derrida) ज्ञान और भाषा के सिद्धांत पर केंद्रित है।
दोनों ही परंपराएँ स्थायी केंद्र (Fixed Centre), सर्वव्यापी सत्य (Universal Truth) और तर्क की सर्वोच्चता (Supremacy of Reason) की आधुनिक धारणा पर संदेह करती हैं।
उत्तर–संरचनावाद आधुनिकता के तर्कवादी आधारों को अस्वीकार करता है और यह दिखाता है कि
भाषा और पाठ में अर्थ स्थायी नहीं, बल्कि निर्मित (Constructed) होते हैं।
दूसरी ओर, उत्तर–आधुनिकता समाज में मौजूद इन निर्मित संरचनाओं (Constructed Structures) के प्रभाव को समझती है।
दोनों दृष्टिकोण —
- “एकमात्र सत्य” की धारणा को अस्वीकार करते हैं,
- “सामाजिक विज्ञान की सार्वभौमिक परियोजना” पर अविश्वास जताते हैं, और
- ज्ञान तथा शक्ति के संबंध को उजागर करते हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि उत्तर–संरचनावाद वास्तव में उत्तर–आधुनिकता का एक उप–आंदोलन (Movement within Postmodernism) है,
जो सांस्कृतिक और भाषिक पक्षों पर अधिक ध्यान देता है।
आलोचना (Criticism)
उत्तर-आधुनिकता की आलोचना अनेक विद्वानों ने की है। आलोचकों का कहना है कि उत्तर–आधुनिकता स्वयं एक “महाआख्यान” (Grand Narrative) बन चुकी है जिसे वह स्वयं अस्वीकार करने का दावा करती है।
नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky) का मत है कि उत्तर-आधुनिकता “निरर्थक” (Meaningless) है,
क्योंकि यह किसी भी प्रकार का ठोस, अनुभवजन्य या विश्लेषणात्मक ज्ञान प्रदान नहीं करती।
पॉलिन रोसेनाऊ (Pauline Rosenau) ने यह भी कहा कि उत्तर-आधुनिकता जहाँ “अतार्किकता” (Irrationality) पर बल देती है, वहीं अपनी बात सिद्ध करने के लिए “तर्क” (Reason) के औज़ारों का उपयोग करती है —
जो स्वयं एक विरोधाभास है।
उनका कहना है कि “उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता की असंगतियों की आलोचना करती है,
परंतु स्वयं किसी स्थायी सुसंगतता (Consistency) का पालन नहीं करती।”
इसके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का मानना है कि उत्तर-आधुनिकता दमन और हाशिए पर पड़े समुदायों की जड़ों तक नहीं पहुँच पाती अर्थात यह उन कारणों की व्याख्या नहीं कर पाती जिनसे शोषण (Oppression) और असमानता (Marginalization) पैदा होती है।
निष्कर्ष
उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिक्रिया के रूप में उभरी, जिसने तर्क, विज्ञान और सार्वभौमिक सत्य की धारणाओं को चुनौती दी। इस विचारधारा का मानना है कि समाज और संस्कृति में कोई एकल सत्य या स्थायी वास्तविकता नहीं होती; बल्कि हर चीज़ सापेक्ष, परिवर्तनीय और बहुस्तरीय होती है।
यह दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है कि हर व्यक्ति और हर समुदाय की अपनी अलग व्याख्या और वास्तविकता होती है, जिसे समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए।
जीन फ्रांस्वा ल्योटार ने कहा कि आधुनिकता के “महाआख्यान” अब अप्रासंगिक हो गए हैं और आज ज्ञान एक वस्तु बन चुका है जो शक्ति और लाभ का साधन है।
जाक देरिदा ने “विघटन” (Deconstruction) की प्रक्रिया के माध्यम से यह दिखाया कि हर विचार और हर पाठ के भीतर विरोधाभास और अस्थिर अर्थ छिपे होते हैं।
मिशेल फूको ने यह स्पष्ट किया कि सत्ता किसी एक स्थान पर केंद्रित नहीं होती बल्कि पूरे समाज में ज्ञान, संस्थाओं और व्यवहारों के माध्यम से फैली रहती है।
अर्नेस्टो लैक्लाउ और शांताल मूफे ने लोकतंत्र की एक नई अवधारणा दी जिसे “मौलिक लोकतंत्र” (Radical Democracy) कहा गया, जहाँ विविध पहचानों और संघर्षों को एक साथ लाने पर बल दिया गया।
इन विचारों से यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्तर-आधुनिकता हमें यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि ज्ञान, सत्य और सत्ता के संबंध हमेशा निर्मित और गतिशील होते हैं। यह दृष्टिकोण किसी स्थायी या अंतिम सत्य को स्वीकार नहीं करता, बल्कि भिन्नताओं, सापेक्षताओं और विविधताओं के अस्तित्व को महत्व देता है।
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