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प्रैक्सिस का दर्शन (ग्राम्शी)

ग्राम्शी ने अपनी प्रिजन नोटबुक्स में लिखा है कि उनके अनुसार प्रैक्सिस का सिद्धांत इतिहास और व्यवहार की एक विकसित समझ है। ग्राम्शी लिए प्रैक्सिस का अर्थ है मानव द्वारा किया गया व्यावहारिक और सामाजिक कार्य।

मार्क्स के लेखन में प्रैक्सिस का विचार: राजनीतिक और सामाजिक क्रिया है, जिसके माध्यम से लोग अपनी स्थिति को समझते हैं और उसे बदलते हैं। ऐसी क्रिया मनुष्य से जुड़ी होती है और उसके विचारों तथा व्यवहार से बनती है। इसका अर्थ यह है कि सिद्धांत और व्यवहार अलग-अलग नहीं होते। सिद्धांत व्यवहार को दिशा देता है और व्यवहार सिद्धांत को समझने में मदद करता है।

प्रैक्सिस में व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति को समझता है और उसी समझ के आधार पर कार्य करता है। जब व्यक्ति अपने अनुभवों और विचारों के आधार पर काम करता है, तब उसे अपनी स्थिति और शक्ति का ज्ञान होता है।

प्रैक्सिस का अर्थ है सोचकर किया गया कार्य, जिससे मनुष्य अपनी स्थिति को समझता है और समाज में बदलाव लाने की कोशिश करता है।जब कोई व्यक्ति अपनी स्थिति को समझ लेता है, तो उसके लिए उसे बदलने के लिए सक्रिय होना ज़रूरी हो जाता है। बिना काम किए स्थिति नहीं बदलती। बदलाव के लिए सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है। काम करने वाला व्यक्ति ही दर्शन और राजनीति दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है।

ग्राम्शी के अनुसार, काम करने वाला व्यक्ति केवल सोचने वाला नहीं, बल्कि समाज को बदलने वाला व्यक्ति होता है। प्राकृतिक संसार का एक भाग होने के रूप में व्यक्ति को अपने राजनीतिक समाज से जुड़ना चाहिए।अगर वह ऐसा नहीं करता, तो वह केवल प्राकृतिक संसार का हिस्सा रह जाता है, समाज का नहीं। जब व्यक्ति अपने कार्य और गतिविधियों के द्वारा समाज में बदलाव करता है, तब वह सच में समाज से जुड़ता है।सिर्फ जमीन पर खड़े होने से हमारा रिश्ता जमीन से नहीं जुड़ता। हमारा जमीन से रिश्ता तब जुड़ता है, जब हम उस जमीन पर हल चलाते हैं, बीज डालते हैं या फसल काटते हैं। यह संबंध राजनीतिक चेतना और ऐतिहासिक परिस्थितियों से जुड़ा होता है। इस तरह व्यक्ति खुद को पहचानता है और यह समझता है कि वह कौन है और किन परिस्थितियों में जी रहा है।


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