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ईरान में दूसरी क्रांति का आगाज?

इतिहास की वीथिका में अक्सर ऐसी घटनाएं घटती हैं जहाँ अंत ही नई शुरुआत का प्रस्थान बिंदु बन जाता है। वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति ने जब ईरान की धरती पर कदम रखा था, तब इसे पश्चिम के ‘कठपुतली शासन’ से मुक्ति और एक पवित्र सामाजिक अनुबंध के रूप में प्रस्तुत किया गया था। अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में जिस ‘वेलायत-ए-फकीह’ (धर्मशास्त्री का शासन) की नींव रखी गई, उसने न केवल ईरान बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक धुरी को बदल दिया। किंतु, आज 2026 की दहलीज पर खड़ा ईरान एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ वही तंत्र जिसे कभी ‘मुक्तिदाता’ कहा गया था, अब अपनी ही जनता के लिए दमन का पर्याय बन चुका है। तेहरान की सड़कों से उठती ‘आजादी’ की गूँज केवल एक आर्थिक असंतोष का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस विचार की मृत्यु का उद्घोष है जिसने लगभग पाँच दशकों तक मध्य पूर्व को अपनी वैचारिक गिरफ्त में रखा था। यह विद्रोह नहीं, बल्कि ईरान की ‘दूसरी क्रांति’ है जो सभ्यतागत जड़ों की ओर वापसी की छटपटाहट को दर्शाती है।

वैचारिक क्षरण: 1979 का ‘विश्वास’ बनाम 2026 का ‘विद्रोह’

ब्रह्मा चेलानी के यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी शासन की स्थिरता उसकी ‘रणनीतिक प्रासंगिकता’ और ‘आंतरिक वैधता’ पर टिकी होती है। 1979 की क्रांति ‘पॉपुलिस्ट’ थी, जिसमें वामपंथी, उदारवादी और धार्मिक कट्टरपंथी सभी शाह के शासन के खिलाफ एकजुट थे। उस समय इस्लाम को एक ‘मुक्तिदायी विचारधारा’ के रूप में पेश किया गया था जिसने साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष को नैतिक बल प्रदान किया। इसके विपरीत, 2026 का विद्रोह पूरी तरह से ‘धर्मनिरपेक्ष और नागरिक’ प्रकृति का है। आज की युवा पीढ़ी, जिसे ‘जेन-जी’ कहा जाता है, उस मध्यकालीन सामाजिक संहिता को पूरी तरह नकार चुकी है जिसे ‘नैतिकता पुलिस’ के माध्यम से लागू किया जाता है।

अयातुल्ला शासन की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उसने ‘पवित्रता’ को शासन का आधार बनाया, लेकिन न्याय और समृद्धि देने में विफल रहा। चेलानी अक्सर तर्क देते हैं कि सत्ता जब अपनी वैधता खो देती है, तो वह केवल बल प्रयोग पर टिकी होती है। ईरान में आज वही स्थिति है। 1979 में लोग मस्जिदों से सड़कों पर आए थे, लेकिन 2026 में लोग मस्जिदों के राजनीतिकरण के खिलाफ सड़कों पर हैं। यह ‘धर्मतांत्रिक थकान’ (Theocratic Fatigue) का चरमोत्कर्ष है, जहाँ समाज अब धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय बनाना चाहता है, न कि राजकीय नियंत्रण का उपकरण।

रणनीतिक अति-विस्तार का आर्थिक मूल्य

सी. राजमोहन के ‘ग्रेट गेम’ विश्लेषण के अनुसार, ईरान ने पिछले दो दशकों में अपनी राष्ट्रीय आय का एक बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय वर्चस्व की महत्वाकांक्षाओं में झोंक दिया। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूतियों, सीरिया में असद शासन और इराक में शिया मिलिशिया को वित्तपोषित करने के चक्कर में तेहरान ने अपने घरेलू बुनियादी ढांचे की उपेक्षा की। इसे राजनीति विज्ञान में ‘रणनीतिक अति-विस्तार’ कहा जाता है। जब एक देश अपनी सीमाओं के बाहर साम्राज्य बनाने की कोशिश करता है और अंदरूनी तौर पर अपनी जनता को बुनियादी सुविधाएं देने में विफल रहता है, तो पतन अनिवार्य हो जाता है।

जनवरी 2026 में ईरानी रियाल की अभूतपूर्व गिरावट—जहाँ एक डॉलर की कीमत लगभग 1.5 लाख तोमान तक पहुँच गई है—ने उस सामाजिक अनुबंध को पूरी तरह तोड़ दिया है। जब मुद्रास्फीति 100% के पार चली जाती है, तो मध्यम वर्ग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया जाता है। प्रदर्शनकारी अब केवल हिजाब के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘प्रॉक्सी वॉर’ के खिलाफ भी चिल्ला रहे हैं जिसने ईरान के खजाने को खाली कर दिया। यह विद्रोह दर्शाता है कि भू-राजनीतिक विस्तारवाद कभी भी घरेलू अस्थिरता का विकल्प नहीं हो सकता।

वैश्विक समीकरणों का पुनर्गठन: चीन-रूस धुरी और पश्चिम की भूमिका

ईरान की यह अशांति वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली है। यूरेशियाई राजनीति में ईरान एक महत्वपूर्ण कड़ी है। चीन के लिए ईरान न केवल एक ऊर्जा स्रोत है, बल्कि ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के माध्यम से पश्चिम एशिया में उसके प्रवेश का द्वार भी है। रूस के लिए, ईरान एक महत्वपूर्ण सैन्य सहयोगी रहा है, विशेषकर यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन और मिसाइल तकनीक की आपूर्ति के संदर्भ में। यदि ईरान में शासन परिवर्तन होता है, तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और रूस वैश्विक मंच पर अपना एक सबसे विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार खो देगा।

दूसरी ओर, अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए यह ‘परिवर्तन’ एक अवसर और चुनौती दोनों है। ट्रंप प्रशासन की ‘अधिकतम दबाव’ नीति और 2025 के कड़े व्यापारिक प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। पश्चिम अब ‘शासन परिवर्तन’ (Regime Change) को एक वास्तविक संभावना के रूप में देख रहा है। हालांकि, सी. राजमोहन जैसे विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि ईरान में अचानक होने वाला सत्ता का पतन एक ‘पावर वैक्यूम’ पैदा कर सकता है, जिससे पूरा क्षेत्र लिबिया या सीरिया जैसी अराजकता की चपेट में आ सकता है।

क्षेत्रीय प्रभाव: शिया क्रीसेंट का ढहना

मध्य पूर्व की क्षेत्रीय राजनीति में ईरान का प्रभाव ‘शिया क्रीसेंट’ (Shia Crescent) के माध्यम से फैला हुआ है। यदि तेहरान में सत्ता का स्वरूप बदलता है, तो इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में चल रहे शक्ति संघर्षों की दिशा बदल जाएगी। इजरायल के लिए, ईरान का आंतरिक संकट उसकी सुरक्षा चिंताओं को कम करने वाला होगा। ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ के बाद, अरब देशों और इजरायल का गठबंधन ईरान के खिलाफ और मजबूत होगा। ईरान के कमजोर होने का मतलब है कि हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को मिलने वाली ऑक्सीजन कट जाएगी। यह क्षेत्र में एक नए सुरक्षा ढांचे की शुरुआत हो सकती है, जहाँ ईरान अब एक ‘धमकी’ के बजाय एक ‘साझेदार’ बनने की ओर अग्रसर हो सकता है।

भारत के लिए रणनीतिक दुविधा और अवसर

भारत के लिए ईरान हमेशा से एक ‘रणनीतिक सेतु’ (Strategic Bridge) रहा है। भारत की सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय पहुंच को लेकर है। भारत ने चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है ताकि वह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच सके। ईरान में अस्थिरता इन परियोजनाओं को अधर में लटका सकती है।

हालांकि, सी. राजमोहन के तर्क को देखें तो भारत के लिए यहाँ एक दीर्घकालिक अवसर भी है। एक आधुनिक और प्रतिबंध-मुक्त ईरान भारत के लिए कहीं अधिक लाभकारी होगा। वर्तमान में, प्रतिबंधों के कारण भारत ईरान से तेल आयात नहीं कर पा रहा है और चाबहार का काम भी धीमी गति से चल रहा है। यदि ईरान वैश्विक मुख्यधारा में वापस आता है, तो भारत को न केवल सस्ता कच्चा तेल मिलेगा, बल्कि ‘उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (INSTC) के माध्यम से यूरोप तक पहुँचने का रास्ता भी सुगम हो जाएगा। भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को बनाए रखते हुए, ईरान के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और अपने राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन साधना होगा।

निष्कर्ष: इतिहास की नई करवट

अंततः, ईरान में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं बल्कि दशकों से संचित जन-आक्रोश का लावा है। 1979 की क्रांति ने जिस अंधकारमय रूढ़िवादिता का बीजारोपण किया था, 2026 की यह क्रांति उसे समूल नष्ट करने का सामर्थ्य रखती है। यह लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक है। यह ईरान की उस प्राचीन फारसी पहचान की वापसी है जो सदियों से विज्ञान, कला और दर्शन का केंद्र रही है।

यदि यह ‘दूसरी क्रांति’ सफल होती है, तो यह 21वीं सदी में ‘राजनीतिक इस्लाम’ की प्रासंगिकता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न होगा। दुनिया एक ऐसे ईरान के उदय की प्रतीक्षा कर रही है जो अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को कट्टरपंथ की बेड़ियों से मुक्त कर पुनः वैश्विक मुख्यधारा में शामिल हो सके। यह केवल एक देश की सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता के पुनर्जन्म का संघर्ष है। नियति का चक्र अब पूरा हो रहा है—क्रांति का वह रूप जो 1979 में शुरू हुआ था, अब अपने ही विरोधाभासों के बोझ तले दबकर एक नए युग को जन्म दे रहा है।


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