21वीं सदी की बदलती भू-राजनीति में भारत और जर्मनी के संबंध अब केवल व्यापारिक लेन-देन तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे एक गहरी ‘सामरिक अनिवार्यता’ में बदल चुके हैं। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से रूस-यूक्रेन संघर्ष और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच, बर्लिन और नई दिल्ली ने अपनी साझेदारी को एक नए और अधिक सक्रिय चरण में प्रवेश कराया है। जर्मनी, जो पारंपरिक रूप से अपनी अर्थव्यवस्था और निर्यात पर केंद्रित रहा है, अब सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है, जबकि भारत अपनी ‘आत्मनिर्भर’ नीति के तहत जर्मनी को एक विश्वसनीय तकनीक और रक्षा भागीदार के रूप में देख रहा है। यह लेख इस ऐतिहासिक बदलाव के विभिन्न आयामों, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करता है।
1. संबंधों का ऐतिहासिक आधार और वर्तमान बदलाव
भारत और जर्मनी के बीच राजनयिक संबंधों की नींव 1951 में रखी गई थी। जर्मनी उन पहले देशों में से था जिसने स्वतंत्र भारत के साथ संबंध स्थापित किए। शीत युद्ध के दौरान और उसके बाद भी, जर्मनी भारत का एक महत्वपूर्ण आर्थिक भागीदार बना रहा। हालांकि, दशकों तक यह संबंध ‘आर्थिक प्रधान’ ही रहा, जहाँ जर्मनी ने भारत के औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे में निवेश किया।
लेकिन 2022 के बाद से ‘जेइटनवांडे’ (Zeitenwende – यानी ऐतिहासिक मोड़) की नीति के तहत जर्मनी ने अपनी विदेश नीति में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। अब जर्मनी अपनी सुरक्षा के प्रति अधिक जागरूक है और एशिया में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह बदलाव एक अवसर की तरह है, क्योंकि दोनों देश ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ के समर्थक हैं।
2. रक्षा सहयोग: ‘खरीदार-विक्रेता’ से ‘सह-उत्पादक’ की ओर
- भारत-जर्मनी संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण नया आयाम ‘रक्षा’ है। ऐतिहासिक रूप से भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस और फ्रांस पर अधिक निर्भर रहा है, लेकिन अब जर्मनी इस क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभर रहा है।
- पनडुब्बी सौदा: भारतीय नौसेना के प्रोजेक्ट-75I के तहत जर्मनी की कंपनी ‘थिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स’ (TKMS) के साथ छह उन्नत पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण पर चर्चा रणनीतिक गहराई का प्रमाण है।
- सह-उत्पादन और ‘मेक इन इंडिया’: जर्मनी अब केवल हथियार बेचने के बजाय भारत में तकनीक हस्तांतरण और स्थानीय निर्माण (Co-development) में रुचि दिखा रहा है। यह भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के साथ पूरी तरह मेल खाता है।
- सैन्य अभ्यास: हाल ही में जर्मन वायु सेना और नौसेना की हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता और भारतीय सेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास यह संदेश देते हैं कि दोनों देश समुद्री सुरक्षा और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध हैं।
3. हरित और सतत विकास साझेदारी
- जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) भारत और जर्मनी के बीच सहयोग का एक और प्रमुख स्तंभ है। 2022 में दोनों देशों ने ‘हरित और सतत विकास साझेदारी’ (GSDP) पर हस्ताक्षर किए।
- निवेश: जर्मनी ने भारत में हरित परियोजनाओं के लिए 2030 तक 10 बिलियन यूरो की वित्तीय सहायता देने का वादा किया है।
- ग्रीन हाइड्रोजन: भारत का लक्ष्य ग्रीन हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनना है, और जर्मनी की उन्नत तकनीक इसमें उत्प्रेरक का काम कर सकती है। दोनों देश मिलकर एक ऐसी ‘ग्रीन वैल्यू चेन’ विकसित कर रहे हैं जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगी।
4. हिंद-प्रशांत क्षेत्र और साझा सुरक्षा चिंताएं
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र अब वैश्विक राजनीति और व्यापार का केंद्र बन गया है। चीन की बढ़ती आक्रामकता ने जर्मनी को अपनी पुरानी ‘व्यापार पहले’ (Trade-first) नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।
- नेविगेशन की स्वतंत्रता: जर्मनी ने अपनी ‘इंडो-पैसिफिक गाइडलाइंस’ के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि वह इस क्षेत्र में किसी भी एकतरफा आधिपत्य के खिलाफ है। भारत, जो इस क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता है, जर्मनी के लिए सबसे स्वाभाविक सहयोगी है।
- आर्थिक सुरक्षा: दोनों देश अपनी आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को चीन से दूर विविधतापूर्ण बनाना चाहते हैं। जर्मनी के लिए ‘चीन+1’ रणनीति में भारत एक विश्वसनीय गंतव्य के रूप में उभरा है।
5. कौशल विकास और प्रवासन समझौता
- भारत की विशाल युवा जनसंख्या और जर्मनी की श्रम कमी (Skill Shortage) दोनों देशों के लिए एक पूरक अवसर प्रदान करती है।
- मोबिलिटी पार्टनरशिप: ‘प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी समझौते’ (MMPA) के तहत भारतीय पेशेवरों, छात्रों और कुशल श्रमिकों के लिए जर्मनी में काम करने के रास्ते आसान हुए हैं।
- शिक्षण और अनुसंधान: जर्मन विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों के लिए पसंदीदा केंद्र बन रहे हैं, जिससे न केवल आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक संबंध भी मजबूत हो रहे हैं।
6. वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद
- भारत और जर्मनी दोनों ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के प्रबल समर्थक हैं। ‘जी-4’ (G4) समूह के सदस्यों के रूप में दोनों देश वैश्विक संस्थाओं में समकालीन वास्तविकताओं के अनुसार बदलाव की मांग कर रहे हैं।
- जी-20 और वैश्विक दक्षिण: भारत ने अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को बुलंद किया, जिसे जर्मनी ने सकारात्मक समर्थन दिया। दोनों देश आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एक जैसे विचार रखते हैं।
7. चुनौतियां और बाधाएं
इतनी निकटता के बावजूद, कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं:
- यूक्रेन पर रुख: रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के तटस्थ रुख और रूस से तेल खरीद को लेकर जर्मनी और पश्चिमी देशों में शुरुआती असहजता थी। हालांकि, अब बर्लिन भारत की स्थिति और मजबूरियों को बेहतर ढंग से समझने लगा है।
- लालफीताशाही और व्यापारिक बाधाएं: भारत में व्यापार करने की जटिलताएं और जर्मनी के सख्त विनियामक मानक (Regulatory Standards) कभी-कभी निवेश की गति को धीमा कर देते हैं। भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में देरी भी एक बड़ा कारण है।
8. तकनीक और नवाचार का भविष्य
भविष्य की साझेदारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग पर टिकी होगी। जर्मनी की ‘इंजीनियरिंग शक्ति’ और भारत की ‘आईटी और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता’ का मिलन चौथी औद्योगिक क्रांति (Industry 4.0) का नेतृत्व कर सकता है। नवाचार के क्षेत्र में सहयोग न केवल आर्थिक लाभ देगा, बल्कि दोनों देशों को तकनीकी संप्रभुता (Technological Sovereignty) भी प्रदान करेगा।
9. निष्कर्ष: एक विश्वसनीय धुरी का निर्माण
भारत और जर्मनी के बीच की सामरिक साझेदारी अब केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक स्थिर और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। जर्मनी के लिए भारत एशिया में सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक साझेदार है, और भारत के लिए जर्मनी यूरोप का सबसे मजबूत आर्थिक और तकनीकी इंजन है।
जैसे-जैसे दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) हो रही है, भारत और जर्मनी का यह ‘नया चरण’ क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक मजबूत धुरी प्रदान करेगा। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों देश अपने नौकरशाही अवरोधों को दूर करें और रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में किए गए समझौतों को धरातल पर उतारें। “सभ्यतागत मूल्यों” और “आधुनिक सामरिक हितों” का यह संगम आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में सक्षम है।
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