किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता होती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ को मौलिक और पवित्र अधिकार माना गया है। लेकिन इसी संविधान में एक ऐसा प्रावधान भी मौजूद है जो बिना किसी मुकदमे या अपराध के व्यक्ति को हिरासत में लेने की अनुमति देता है—इसे ‘निवारक निरोध’ (Preventive Detention) कहा जाता है। हाल के वर्षों में, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों और विभिन्न राज्य कानूनों के तहत बढ़ते इसके प्रयोग ने एक नई कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दिया है। क्या एक परिपक्व लोकतंत्र में ‘शंका’ के आधार पर जेल भेजना उचित है?
निवारक निरोध क्या है?
निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को इस आशंका के आधार पर हिरासत में लेना कि वह भविष्य में कोई अपराध कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के लिए खतरा पैदा कर सकता है। यह ‘दंडात्मक निरोध’ (Punitive Detention) से भिन्न है, जहाँ व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए अपराध की सजा के रूप में जेल भेजा जाता है।
निवारक निरोध का मुख्य उद्देश्य सजा देना नहीं, बल्कि अपराध को रोकना है। जैसा कि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है, यह “अनुमानात्मक आधार” पर आधारित होता है। राज्य इसका उपयोग तब करता है जब उसे लगता है कि कोई व्यक्ति राज्य की सुरक्षा, विदेशी संबंधों, या आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति में बाधा डाल सकता है।
संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 22 की दोहरी भूमिका
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 उन व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। लेकिन इसके दो भाग हैं। अनुच्छेद 22(1) और (2) गिरफ्तार व्यक्ति को वकील से परामर्श करने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने का अधिकार देते हैं। वहीं, अनुच्छेद 22(3) इन अधिकारों को उन लोगों से छीन लेता है जिन्हें ‘निवारक निरोध’ के तहत पकड़ा गया है।
- समय सीमा: अनुच्छेद 22(4) के अनुसार, किसी व्यक्ति को 3 महीने से अधिक समय तक बिना किसी ‘सलाहकार बोर्ड’ (Advisory Board) की अनुमति के हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
- आधार का प्रकटीकरण: हिरासत में लेने वाले अधिकारी को निरुद्ध व्यक्ति को आधार बताना चाहिए, हालांकि ‘लोक हित’ में इसे छिपाया भी जा सकता है।
कानूनी विकास और औपनिवेशिक विरासत
निवारक निरोध की जड़ें औपनिवेशिक काल के ‘बंगाल राज्य कैदी विनियमन, 1818’ और ‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ में मिलती हैं। स्वतंत्र भारत में, पहला ‘निवारक निरोध अधिनियम’ 1950 में लाया गया था। इसके बाद समय-समय पर विभिन्न कड़े कानून आए, जैसे:
- मीसा (MISA): आपातकाल के दौरान इसका व्यापक दुरुपयोग हुआ।
- रासुका (NSA), 1980: राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, जो आज भी प्रभावी है।
- यूएपीए (UAPA): जिसका उपयोग आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए किया जाता है।
- राज्य स्तरीय कानून: जैसे महाराष्ट्र का मकोका (MCOCA) या तेलंगाना का ‘प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज एक्ट’।
निजता का अधिकार और पुट्टास्वामी फैसला: एक नया मोड़
2017 का ‘के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ’ फैसला निवारक निरोध की चर्चा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। हालांकि यह मामला मुख्य रूप से निजता पर था, लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कोई भी हनन ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के माध्यम से होना चाहिए, जो उचित, न्यायपूर्ण और निष्पक्ष हो।
अब, निवारक निरोध को केवल एक प्रशासनिक आदेश के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 के ‘स्वर्ण त्रिभुज’ (Golden Triangle) की कसौटी पर खरा उतरना होगा। यदि हिरासत का आदेश मनमाना है, तो वह अवैध माना जाएगा।
न्यायिक सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय के कड़े प्रहार
हाल के महीनों में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निवारक निरोध के “लापरवाह” उपयोग के खिलाफ कई बार चेतावनी दी है। न्यायालय ने बार-बार कहा है कि:
- अंतिम उपाय: निवारक निरोध का उपयोग केवल तभी होना चाहिए जब सामान्य कानून (IPC/CrPC) स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहें।
- सार्वजनिक व्यवस्था बनाम कानून व्यवस्था: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हर ‘कानून-व्यवस्था’ (Law and Order) की समस्या ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (Public Order) नहीं होती। केवल वही घटनाएं जो समाज के सामान्य प्रवाह को अस्त-व्यस्त करती हैं, निवारक निरोध का आधार बन सकती हैं।
- प्रक्रियात्मक सुरक्षा: चूंकि इसमें ट्रायल नहीं होता, इसलिए निरुद्ध व्यक्ति को अपनी बात रखने (Representation) का जल्द से जल्द मौका दिया जाना अनिवार्य है।
निवारक निरोध के दुरुपयोग की चुनौतियां
आलोचकों का तर्क है कि निवारक निरोध अक्सर राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने या छोटे अपराधियों को बिना जमानत के लंबे समय तक जेल में रखने का साधन बन गया है।
- जमानत का अभाव: चूंकि यह गिरफ्तारी अपराध पर नहीं बल्कि शंका पर होती है, इसलिए इसमें ‘जमानत नहीं, जेल’ का नियम स्वतः लागू हो जाता है।
- मजिस्ट्रेट की अनुपस्थिति: इसमें पुलिस या जिला मजिस्ट्रेट के पास अत्यधिक शक्तियां होती हैं, और न्यायिक समीक्षा केवल ‘सलाहकार बोर्ड’ या रिट याचिकाओं तक सीमित होती है।
- मानवाधिकार उल्लंघन: बिना मुकदमे के महीनों जेल में रखना मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणापत्र (UDHR) के खिलाफ है।
सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन
राज्य का तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और संवेदनशील देश में, आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा और संगठित अपराध से निपटने के लिए ऐसे असाधारण कानूनों की आवश्यकता है। खुफिया जानकारी अक्सर ऐसी होती है जिसे अदालत में सबूत के रूप में पेश नहीं किया जा सकता, लेकिन वह किसी बड़े हमले को रोकने के लिए काफी होती है।
चुनौती यह है कि सुरक्षा की इस जरूरत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बलि चढ़ाए बिना कैसे पूरा किया जाए? इसके लिए ‘चेक एंड बैलेंस’ की आवश्यकता है। सलाहकार बोर्डों में न्यायिक सदस्यों की सक्रिय भूमिका और हिरासत के आदेशों की कड़ी समीक्षा इस दिशा में सही कदम हो सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों (जैसे अमेरिका और ब्रिटेन) में शांति काल के दौरान निवारक निरोध का कोई स्थायी प्रावधान नहीं है। वहाँ केवल युद्ध या आपातकाल के दौरान ही ऐसे कदम उठाए जाते हैं। भारत संभवतः एकमात्र लोकतांत्रिक देश है जिसके संविधान में ही शांति काल के दौरान निवारक निरोध को स्थान दिया गया है। यह तथ्य ही इस कानून के “सावधानीपूर्वक उपयोग” की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।

भविष्य की राह: सुधार और जवाबदेही
निवारक निरोध को ‘आवश्यक बुराई’ (Necessary Evil) कहा गया है। इसे पूरी तरह समाप्त करना शायद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन इसमें सुधार की भारी गुंजाइश है:
- विधिक सहायता: हिरासत में लिए गए व्यक्ति को तुरंत विधिक सहायता (Legal Aid) मिलनी चाहिए।
- जवाबदेही: यदि कोई हिरासत आदेश दुर्भावनापूर्ण पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई होनी चाहिए।
- डिजिटल रिकॉर्ड: हिरासत के आधारों और सलाहकार बोर्ड की कार्यवाहियों का पारदर्शी रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
निवारक निरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच का संघर्ष वास्तव में राज्य की सत्ता और नागरिक के अधिकारों के बीच का संघर्ष है। यदि निवारक निरोध एक नियम बन जाता है और स्वतंत्रता अपवाद, तो लोकतंत्र का मूल ढांचा खतरे में पड़ जाता है। 2026 के आधुनिक भारत में, जहाँ हम डिजिटल अधिकारों और निजता की बात कर रहे हैं, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘सुरक्षा’ के नाम पर किसी भी नागरिक की ‘स्वतंत्रता’ को मनमर्जी से न छीना जाए। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, “निवारक निरोध के कानून का उपयोग बेहद सावधानी के साथ और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।” अंततः, एक राष्ट्र की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितने लोगों को जेल में रख सकता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नागरिकों को कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा एक साथ प्रदान करता है।
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