आधुनिक प्रतिनिधि लोकतंत्र की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है, निर्वाचित प्रतिनिधियों का अपनी राजनीतिक पार्टी बदलना, जिसे सामान्यतः दल–बदल कहा जाता है। यह प्रश्न केवल राजनीतिक रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनादेश, प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और संवैधानिक नैतिकता जैसे मूलभूत लोकतांत्रिक सिद्धांतों को छूता है।
जब कोई सांसद या विधायक उस पार्टी को छोड़ देता है, जिसके चुनाव-चिह्न और विचारधारा के आधार पर जनता ने उसे चुना था, तो यह स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा करता है कि वास्तविक जनादेश किसका था – व्यक्ति का या पार्टी का?
प्रतिनिधि लोकतंत्र का सिद्धांत: व्यक्ति बनाम पार्टी
- राजनीतिक सिद्धांत में प्रतिनिधित्व को लेकर दो प्रमुख दृष्टिकोण रहे हैं।
पहला, बर्कियन (Burkean) दृष्टिकोण, जो कहता है कि सांसद जनता का “प्रतिनिधि” है, “दूत” नहीं। एडमंड बर्क के अनुसार, सांसद को अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार है, भले ही वह क्षणिक जनमत के विरुद्ध ही क्यों न हो।
दूसरा, पार्टी–आधारित जनादेश का सिद्धांत, जिसके अनुसार आधुनिक लोकतंत्र में मतदाता मुख्यतः पार्टी, उसके नेता और घोषणापत्र को वोट देता है, न कि केवल व्यक्ति को। आज के राजनीतिक यथार्थ में दूसरा दृष्टिकोण अधिक प्रभावी दिखाई देता है। चुनावी अभियानों में पार्टी का प्रतीक, राष्ट्रीय नेतृत्व और वैचारिक पहचान निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
आधुनिक यथार्थ
इसके विपरीत, आधुनिक लोकतंत्र में: चुनाव पार्टी घोषणापत्र, पार्टी नेतृत्व, और वैचारिक पहचान के इर्द-गिर्द लड़े जाते हैं।
- चुनावी अभियानों में नीतियाँ, राष्ट्रीय मुद्दे, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चेहरा, और पार्टी की वैचारिक दिशा केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
- ऐसे में अधिकांश मतदाता यह अपेक्षा करता है कि उसका प्रतिनिधि उसी राजनीतिक दृष्टिकोण और नीति-ढाँचे के अनुसार काम करेगा, जिसके लिए उसने वोट दिया है। जब कोई निर्वाचित प्रतिनिधि बाद में अपनी पार्टी छोड़ देता है, तो यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि मतदाता के उस सामूहिक निर्णय को कमजोर कर देता है, जो उसने पार्टी के नाम और विचारधारा पर भरोसा करके लिया था।
- ऐसे में यह कहना कि मतदाता ने केवल व्यक्ति को चुना था, व्यवहारिक सच्चाई से मेल नहीं खाता। इसीलिए दल-बदल को कई लोग जनादेश के साथ विश्वासघात मानते हैं।
ब्रिटेन में दल–बदल और उप–चुनाव की परंपरा
- ब्रिटिश संसदीय परंपरा में यह माना जाता रहा है कि सीट व्यक्ति की होती है, पार्टी की नहीं। यही कारण है कि अधिकांश सांसद पार्टी बदलने पर इस्तीफ़ा नहीं देते। 1979 के बाद से केवल कुछ ही सांसद ऐसे रहे हैं जिन्होंने दल-बदल के बाद स्वेच्छा से उप-चुनाव लड़ा।
- हालाँकि, हालिया वर्षों में यह परंपरा तीखी आलोचना के घेरे में है। 2022–2024 के बीच कई सांसदों के कंजरवेटिव पार्टी छोड़ने, लेबर या रिफ़ॉर्म यूके में शामिल होने से यह बहस तेज़ हुई कि क्या बिना उप-चुनाव के पार्टी बदलना लोकतांत्रिक नैतिकता के विरुद्ध है।
इसी संदर्भ में रिकॉल ऑफ़ MPs एक्ट, 2015 और उससे जुड़ी याचिकाओं पर फिर से चर्चा शुरू हुई है।
दल–बदल: नैतिक समस्या या राजनीतिक स्वतंत्रता?
दल-बदल को लेकर लोकतांत्रिक विमर्श में दो स्पष्ट और परस्पर विरोधी नैतिक दृष्टिकोण उभरते हैं। एक ओर इसे प्रतिनिधि की वैचारिक और नैतिक स्वतंत्रता के रूप में देखा जाता है, तो दूसरी ओर इसे जनादेश के उल्लंघन और लोकतांत्रिक विश्वासघात के रूप में समझा जाता है। इन दोनों दृष्टियों को समझना दल-बदल की जटिलता को सही ढंग से आंकने के लिए आवश्यक है।
दल–बदल के पक्ष में तर्क यह मानते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक निर्वाचित प्रतिनिधि केवल पार्टी का अनुयायी नहीं होता, बल्कि वह अपने विवेक और अंतरात्मा के आधार पर निर्णय लेने वाला व्यक्ति भी होता है।
- यदि किसी नीति, निर्णय या दिशा से वह नैतिक रूप से असहमत हो, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कार्य करने का अधिकार होना चाहिए, भले ही उसकी पार्टी उससे असहमति रखे।
- इसके अतिरिक्त, जब पार्टी नेतृत्व तानाशाही, अलोकतांत्रिक या केवल सत्ता-लाभ पर केंद्रित हो जाए, तब प्रतिनिधि के लिए उस पार्टी से अलग होना एक नैतिक प्रतिरोध के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसे मामलों में दल-बदल को राजनीतिक पतन नहीं, बल्कि सिद्धांतों की रक्षा के प्रयास के रूप में समझा जाता है।
- साथ ही, यह भी तर्क दिया जाता है कि राजनीति कोई स्थिर प्रक्रिया नहीं है; विचारधाराएँ समय के साथ विकसित होती हैं और बदलती हैं। कभी-कभी दल-बदल नए राजनीतिक संरेखण और सामाजिक परिवर्तनों का संकेत देता है, जो लोकतंत्र को गतिशील बनाए रख सकता है।
इसके विपरीत, दल–बदल के विरोध में तर्क इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर नैतिक समस्या मानते हैं। आधुनिक चुनावों में मतदाता प्रायः किसी व्यक्ति के बजाय पार्टी, उसके घोषणापत्र और विचारधारा को वोट देता है।
- ऐसे में जब कोई प्रतिनिधि उसी जनादेश के आधार पर चुने जाने के बाद पार्टी बदल लेता है, तो यह मतदाता के विश्वास और निर्णय का सीधा उल्लंघन माना जाता है। इसके अलावा, व्यावहारिक राजनीति में यह भी देखा गया है कि कई दल-बदल वैचारिक मतभेदों के कारण नहीं, बल्कि सत्ता, पद, मंत्री पद या अन्य व्यक्तिगत लाभों के लिए किए जाते हैं।
- इस प्रकार का अवसरवाद राजनीति को नैतिक रूप से कमजोर करता है। बार-बार होने वाला दल-बदल जनता के मन में यह धारणा पैदा करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया केवल सत्ता-हस्तांतरण का खेल बनकर रह गई है, जिससे नागरिकों का चुनावी व्यवस्था और प्रतिनिधियों पर विश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है।
इस प्रकार दल-बदल न तो पूरी तरह नैतिक स्वतंत्रता का प्रतीक है और न ही केवल राजनीतिक अनैतिकता का पर्याय। यह एक ऐसा मुद्दा है जो प्रतिनिधि की अंतरात्मा, पार्टी की भूमिका और मतदाता के जनादेश तीनों के बीच संतुलन की माँग करता है।
उप–चुनाव: समाधान या औपचारिकता?
एक लोकप्रिय सुझाव यह है कि जो भी प्रतिनिधि पार्टी बदले, उसे अनिवार्य रूप से उप–चुनाव लड़ना चाहिए।
- यह जनता को दोबारा निर्णय लेने का अवसर देता है।
- इससे दल-बदल पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बनता है।
- यह पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाता है।
रिकॉल (Recall) की अवधारणा: एक मध्य मार्ग
रिकॉल पिटिशन का विचार यह है कि यदि मतदाता असंतुष्ट हैं, तो वे स्वयं सांसद को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकें। ब्रिटेन में वर्तमान क़ानून के अनुसार, केवल कुछ सीमित परिस्थितियों जैसे गंभीर आपराधिक सज़ा में ही रिकॉल संभव है। दल-बदल अपने आप में इसका आधार नहीं है।
समर्थकों का तर्क है कि यदि पार्टी बदलना रिकॉल का आधार बने, तो:
- मतदाताओं को सीधा निर्णय लेने का अधिकार मिलेगा
- उप-चुनाव की भारी लागत हर बार नहीं उठानी पड़ेगी
- सांसदों पर नैतिक दबाव बनेगा
विरोधियों का कहना है कि इससे सांसद पार्टी नेतृत्व के बंधक बन सकते हैं और स्वतंत्र विवेक समाप्त हो सकता है।
व्यावहारिक चुनौतियाँ
- इसका दुरुपयोग राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए हो सकता है।
- निरंतर अस्थिरता पैदा होने का खतरा रहता है।
- शासन की निरंतरता बाधित हो सकती है।
दलबदल–विरोधी कानून: भारतीय संदर्भ
भारत में दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) दल-बदल को नियंत्रित करने का प्रयास करती है।
भारतीय संसद ने 52वें संविधान संशोधन के माध्यमसे दलबदल रोधी कानून बनाया और इसे दसवीं अनुसूची के अंतर्गत रखा है।
- यह कानून उन संसद सदस्यों या विधायकों को अयोग्य घोषित करता है जो स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र(इस्तीफा) दे देते हैं या महत्वपूर्ण मतों (जैसे- विश्वास प्रस्ताव या बजट अनुमोदन)के मुद्दे पर ‘पार्टी व्हिप’ की अवहेलना करते हैं।
- भारतीय राजनीति के संदर्भ में सामान्य अर्थों में दलबदल से तात्पर्य संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदस्य द्वारा अपने राजनीतिक दल को छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल होने की प्रक्रिया से है।
- इससे प्राय:सरकारों की स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे सत्ता की गतिशीलता में बदलाव,बहुमत या समर्थन की स्थिति में बदलाव और सत्तारूढ़ गठबंधन के संभावित पतन या सरकार गिरने की संभावना हो सकती है।
भारत सरकार को दलबदल रोधी कानून को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न समितियों द्वारा विभिन्न सुझावों दिए गए हैं जिन पर विचार किया जा सकता है।इनसमितियों में शामिल हैं-
- दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट (1990)
- हाशिम अब्दुल हलीम समिति की रिपोर्ट (1994)
- भारतीय विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999)
- भारतीय संविधान के कामकाज की समीक्षा करने वाले राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट (2002)
- हाशिम अब्दुल हलीम समिति की रिपोर्ट (2003)
- भारतीय विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (2015)
निष्कर्ष
दल-बदल को न तो पूरी तरह स्वतंत्रता के नाम पर सही ठहराया जा सकता है, और न ही पूर्ण प्रतिबंध से लोकतंत्र को स्वस्थ बनाया जा सकता है। वास्तविक चुनौती यह है कि व्यक्ति की अंतरात्मा, पार्टी की भूमिका और जनता के जनादेश के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाये।
लोकतंत्र तभी जीवंत रह सकता है जब प्रतिनिधि न केवल कानूनी रूप से, बल्कि नैतिक रूप से भी जनता के प्रति जवाबदेह हों। दल-बदल का प्रश्न अंततः हमें यही सोचने पर मजबूर करता है कि हम औपचारिक लोकतंत्र चाहते है या सार्थक लोकतंत्र चाहते हैं।
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