भारत में मृत्युदंड से संबंधित एक वार्षिक सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार (जो स्क्वेयर सर्कल क्लिनिक—नालसार विश्वविद्यालय की एक आपराधिक न्याय पहल—द्वारा प्रकाशित की गई है), पिछले तीन वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने एक भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?
- मृत्युदंड की प्रतीक्षा में कैदी: दिसंबर 2025 तक भारत में मृत्युदंड की प्रतीक्षा में कुल 574 कैदी थे—जिनमें 550 पुरुष और 24 महिलाएँ शामिल थीं। बरी किए जाने से पहले मृत्युदंड की प्रतीक्षा में बिताया गया औसत समय 5 वर्ष से अधिक रहा, जबकि कुछ कैदी लगभग एक दशक तक कारावास में रहे, उसके बाद उन्हें निर्दोष ठहराया गया।
- सर्वोच्च न्यायालय का संयम: सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों (2023–2025) में एक भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की। वर्ष 2025 में, न्यायालय ने 10 मृत्युदंड की प्रतीक्षा में बंद कैदियों को बरी किया—जो पिछले एक दशक में किसी एक वर्ष में ऐसे बरीकरणों की सबसे अधिक संख्या है—और इसके लिए “गलत दोषसिद्धि” तथा “प्रक्रियात्मक विफलताओं” का हवाला दिया।
- ट्रायल कोर्ट का उत्साह: इसके विपरीत, सत्र न्यायालयों ने केवल 2025 में ही 128 मृत्युदंड सुनाए। देशभर में अब मृत्युदंड की प्रतीक्षा में 574 कैदी हैं (जो 2016 के बाद सर्वाधिक संख्या है), जिनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में इनकी संख्या सबसे अधिक है। सत्र न्यायालयों ने 2016 से 2025 के बीच पूरे देश में कुल 1310 मृत्युदंड सुनाए हैं।
- पुष्टि का अंतर (confirmation gap): उच्च न्यायालय निचली अदालतों द्वारा सुनाए गए मृत्युदंडों में से केवल लगभग 8% की ही पुष्टि करते हैं; शेष मामलों में सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया जाता है या बरी कर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का रुख और भी अधिक संयमित रहा है, जहाँ पिछले तीन वर्षों में किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की गई।
- दंड निर्धारण चरण में प्रक्रियात्मक उल्लंघन: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मनोज बनाम पंजाब राज्य मामले में निर्धारित स्पष्ट दिशानिर्देशों—जिनमें मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, कारागार आचरण रिपोर्ट और शमन (mitigation) सुनवाई अनिवार्य की गई थी—के बावजूद, 2025 में सुनाए गए लगभग 95% मृत्युदंडों में इनका पालन नहीं किया गया।

मृत्युदंड पर न्यायिक दृष्टिकोण क्या है?
- जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1973): इस मामले में पहली बार मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया।
- एडिगा अन्नम्मा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1974): सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि हत्या के अपराध में आजीवन कारावास सामान्य नियम है और मृत्युदंड केवल कुछ अपवादात्मक मामलों में दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई न्यायालय मृत्युदंड देने का निर्णय लेता है तो उसके लिए विशेष कारण दर्ज किए जाने चाहिए।
- बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मृत्युदंड केवल ‘अत्यंत दुर्लभ’ (rarest of rare) मामलों में ही दिया जाना चाहिए। कोई मामला तब ‘अत्यंत दुर्लभ’ माना जाएगा जब हत्या करने में अपराधी की अत्यधिक दोषपूर्ण मानसिकता (extreme culpability) और अत्यंत गंभीर कारण (extreme cause) विद्यमान हों। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत्युदंड तभी दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह से अस्वीकार्य (unquestionably foreclosed) हो। इसके अतिरिक्त, दंड निर्धारण से पहले गंभीरता बढ़ाने वाले (aggravating) और नरमी प्रदान करने वाले (mitigating) कारकों का संतुलन करना आवश्यक है।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022): इस निर्णय में न्यायालय ने यह अनिवार्य किया कि मृत्युदंड देने से पहले ट्रायल कोर्ट को दोषी के संपूर्ण पृष्ठभूमि का गहन अध्ययन करना होगा, जिसमें मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तथा जेल में आचरण संबंधी रिपोर्ट भी शामिल हों।
मृत्युदंड के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क क्या हैं?
- निवारक प्रभाव बनाए रखना: मृत्युदंड के समर्थन में सबसे प्रमुख तर्क यह है कि इससे समाज में भयजनक निवारक प्रभाव (deterrence) बना रहता है। कई लोगों का मानना है कि यदि हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए मृत्युदंड का प्रावधान हो, तो व्यक्ति ऐसे अपराध करने से स्वयं को रोक सकता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ना, आतंकवाद जैसे कृत्य राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे की पवित्रता को नष्ट करते हैं। ऐसे कृत्य देश और उसके नागरिकों के अस्तित्व के लिए खतरा होते हैं। उदाहरण के लिए, 26/11 मुंबई आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए अजमल कसाब को मृत्युदंड दिया गया।
- सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरने वाले कृत्य: मृत्युदंड के समर्थकों का कहना है कि कुछ अपराध समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देते हैं और ऐसे अपराधों के लिए मृत्युदंड के अतिरिक्त कोई दंड उपयुक्त नहीं होता। उदाहरणस्वरूप, विनय शर्मा बनाम भारत संघ (2020) का मामला, जिसे निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के नाम से भी जाना जाता है, ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। इस मामले में एक आरोपी ने जेल में आत्महत्या कर ली, एक आरोपी नाबालिग था, इसलिए उसे मृत्युदंड नहीं दिया गया, जबकि शेष चार आरोपियों को मृत्युदंड दिया गया और वर्ष 2020 में उन्हें फांसी दी गई।
- नागरिकों की सुरक्षा: मृत्युदंड के समर्थकों का तर्क है कि कुछ अपराधी अत्यंत भयानक अपराध करते हैं और उनके सुधार की कोई संभावना नहीं होती (जैसे, कई बार बलात्कार के आरोपी)। ऐसे अपराधी न तो पश्चाताप दिखाते हैं और न ही सुधार की कोई प्रवृत्ति रखते हैं। इसलिए नागरिकों की सुरक्षा के लिए उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।
- पीड़ितों के परिवारों को संतोष और न्याय: कुछ पीड़ित परिवारों के लिए अपराधी का निष्पादन (execution) एक निर्णायक संतोष और पूर्णता का भाव प्रदान करता है, जो आजीवन कारावास से संभव नहीं हो पाता। यह लंबे और पीड़ादायक कानूनी संघर्ष के अंत तथा इस बात की अंतिम पुष्टि का प्रतीक हो सकता है कि न्याय व्यवस्था ने उनके लिए सर्वोच्च कदम उठाया है।
- निजी प्रतिशोध (विजिलेंटिज़्म) को रोकना: यदि कानून किसी जघन्य अपराध के लिए वह दंड प्रदान नहीं करता जिसे जनता ‘पर्याप्त’ मानती है, तो यह जोखिम उत्पन्न हो सकता है कि लोग स्वयं कानून हाथ में ले लें।
मृत्युदंड को समाप्त (abolition) करने के पक्ष में क्या तर्क हैं?
- उच्च स्तर की विषयात्मकता : मृत्युदंड देने में अत्यधिक विषयात्मकता पाई जाती है, क्योंकि न्यायाधीशों के लिए शमनकारी (mitigating) और प्रतिकूल (aggravating) परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना कठिन होता है।
- सामाजिक-आर्थिक पक्षपात :मृत्युदंड का प्रयोग अक्सर गरीबों, अल्पसंख्यकों तथा नस्लीय, जातीय, राजनीतिक और धार्मिक समुदायों के सदस्यों पर असमान रूप से अधिक किया जाता है। डेथ पेनल्टी इंडिया रिपोर्ट 2016 के अनुसार, भारत में मृत्युदंड पाए लगभग 75% दोषी सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित वर्गों—जैसे दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यक—से आते हैं।
- अपरिवर्तनीय त्रुटि का जोखिम : राज्य की त्रुटि के कारण गलत सजा पाए और लंबे समय तक जेल में रहे व्यक्तियों को अदालतें मुआवजा दे सकती हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से फांसी दे दी जाए, तो कोई भी मुआवजा उस त्रुटि की भरपाई नहीं कर सकता। विभिन्न अध्ययनों (जैसे डेथ पेनल्टी इंडिया रिपोर्ट) से पता चलता है कि निचली अदालतें अक्सर त्रुटिपूर्ण जांच या दबाव में दिलाई गई स्वीकारोक्तियों के आधार पर मृत्युदंड देती हैं, जिन्हें वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पलट दिया जाता है।
- अमानवीय :मानवाधिकार और मानवीय गरिमा मृत्युदंड के साथ संगत नहीं हैं। मृत्युदंड जीवन के अधिकार का उल्लंघन है, जो सभी मानवाधिकारों में सबसे मौलिक है।
- परिवर्तन की क्षमता : मृत्युदंड समाप्त करने के समर्थकों का तर्क है कि प्रत्येक मानव में सुधार की क्षमता होती है। किसी कैदी को फांसी देना उसके प्रायश्चित करने या समाज में सकारात्मक योगदान देने की किसी भी संभावना को समाप्त कर देता है। आधुनिक दंडशास्त्र प्रतिशोध (बदला) से सुधार/पुनर्वास (reformation/rehabilitation) की ओर अग्रसर हुआ है।
- मानसिक तनाव : कई मामलों में दोषियों को अंततः फांसी दिए जाने से पहले लंबे समय तक कारावास झेलना पड़ता है। प्रोजेक्ट 39ए की रिपोर्ट ‘डेथवर्थी’ के निष्कर्ष बताते हैं कि मृत्यु-पंक्ति (death row) पर लंबे समय तक अलगाव, उपेक्षा और कलंकित जीवन के अनुभव मानसिक रोगों को जन्म देते हैं।
- दुरुपयोग (misuse): मृत्युदंड का उपयोग राजनीतिक दमन के उपकरण के रूप में, असहमति को दबाने या कमजोर समूहों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है (विशेषकर अधिनायकवादी शासन में)।
- वैश्विक उदाहरण—कम अपराध दर से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं : नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में मृत्युदंड के बिना भी दुनिया की सबसे कम अपराध दरों में से एक है। ये देश कठोर दंड से भय पैदा करने के बजाय अपराधी के सुधार पर ध्यान देते हैं। वर्ष 2026 तक, 140 से अधिक देशों ने कानून या व्यवहार में मृत्युदंड समाप्त कर दिया है, जिससे भारत जैसे इसे बनाए रखने वाले देश एक सिमटती हुई अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं।

आगे की राह क्या होनी चाहिए?
- क्षमा के बिना आजीवन कारावास” को संस्थागत रूप देना: न्यायपालिका तेजी से “प्राकृतिक जीवन के शेष काल के लिए आजीवन कारावास” को मृत्युदंड के मानक विकल्प के रूप में देख रही है। इससे प्रतिशोध की आवश्यकता पूरी होती है (क्योंकि कैदी कभी जेल से बाहर नहीं आता), साथ ही मृत्युदंड से जुड़े नैतिक और कानूनी जोखिमों (अपरिवर्तनीयता) से भी बचा जा सकता है।
- स्वतः लागू होने वाला दंड-परिवर्तन :कानूनी विशेषज्ञ “समय-सीमाबद्ध” नियम का सुझाव देते हैं—यदि राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा दया याचिका पर किसी निश्चित अवधि (जैसे 2–3 वर्ष) के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता, तो दंड स्वतः आजीवन कारावास में परिवर्तित हो जाना चाहिए।
- गंभीर और उपशामक कारकों के बीच संतुलन:सुप्रीम कोर्ट को मामलों में गंभीर (aggravating) और उपशामक (mitigating) कारकों के संतुलन हेतु अद्यतन दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। इससे मृत्युदंड दिए जाने में व्यक्तिपरकता कम होगी और अनावश्यक रूप से मृत्युदंड दिए जाने की घटनाएँ घटेंगी।
- दंड की निश्चितता:दंड की मात्रा की बजाय दंड की निश्चितता सुनिश्चित करने पर जोर होना चाहिए, क्योंकि यही अपराधियों के लिए अधिक प्रभावी प्रतिरोधक सिद्ध होती है। विशेषज्ञों का तर्क है कि पकड़े जाने और दंडित होने की निश्चितता, दंड की कठोरता की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होती है।
- अंतिम कदम:दीर्घकालिक समाधान यह है कि संसद 262वीं विधि आयोग रिपोर्ट का अनुसरण करते हुए आतंकवाद को छोड़कर सभी अपराधों के लिए मृत्युदंड समाप्त करे। (262वीं विधि आयोग रिपोर्ट, 2015, ने आतंकवाद संबंधी अपराधों और राज्य के विरुद्ध युद्ध को छोड़कर सभी अपराधों के लिए मृत्युदंड समाप्त करने की सिफारिश की थी।)
निष्कर्ष:
विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट में प्रस्ताव किया कि आतंकवाद-संबंधी अपराधों और युद्ध को छोड़कर सभी अपराधों के लिए मृत्युदंड समाप्त किया जाना चाहिए। स्कैंडिनेवियाई देशों का अनुभव भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करता है।
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