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समकालीन वैश्विक राजनीति के संरचनात्मक द्वंद्व और उनके रणनीतिक प्रभाव

Signals for the future, an elephant that never leaves the room- विक्रम एस. मेहता

समकालीन अंतरराष्ट्रीय प्रणाली एक गहन संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहाँ वैश्विक शक्ति-संतुलन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अनिश्चितता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुकी हैं। विक्रम एस. मेहता का लेख “Signals for the future, an elephant that never leaves the room” इस संक्रमण को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक ढाँचा प्रदान करता है। यह अध्ययन लेख में निहित विचारों का रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह तर्क देता है कि इतिहास, तकनीक और भू-राजनीति के स्पष्ट संकेतों की अनदेखी भविष्य के गंभीर संकटों को जन्म दे सकती है।

भूमिका (Introduction)

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में यह स्थापित तथ्य है कि वैश्विक संकट अचानक उत्पन्न नहीं होते, बल्कि वे दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तनों और चेतावनी संकेतों का परिणाम होते हैं। फिर भी, नीति-निर्माताओं और संस्थानों द्वारा इन संकेतों की उपेक्षा एक बार-बार दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति रही है। विक्रम एस. मेहता अपने लेख में इसी प्रवृत्ति को “Elephant in the room” के रूपक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं—एक ऐसी सच्चाई जो स्पष्ट होते हुए भी सार्वजनिक और रणनीतिक विमर्श से बाहर रखी जाती है (Mehta, Signals for the future).

‘Elephant in the Room’ की अवधारणा और रणनीतिक अर्थ

“Elephant in the room” का तात्पर्य उस संरचनात्मक वास्तविकता से है जिसे सभी पहचानते हैं, किंतु राजनीतिक सुविधा, आर्थिक हितों या वैचारिक जड़ता के कारण स्वीकार नहीं करते। समकालीन वैश्विक राजनीति में उभरती द्वंद्वात्मकताएँ केवल वैचारिक बहस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के वास्तविक संचालन को गहराई से प्रभावित कर रही हैं। विक्रम एस. मेहता के लेख में जिन तीन संरचनात्मक द्वंद्वों की ओर संकेत किया गया है, वे आज की विश्व-व्यवस्था के नीति-निर्माण, गठबंधन संरचना और सुरक्षा दृष्टिकोण को प्रत्यक्ष रूप से आकार दे रहे हैं।

वह तीन संरचनात्मक द्वंद्व

  • बदलता वैश्विक शक्ति-संतुलन
  • तकनीक-आधारित प्रतिस्पर्धा
  • आर्थिक और संस्थागत अस्थिरता

लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद:यह द्वंद्व वैश्विक राजनीति में मूल्यों के आधार पर नए ध्रुवीकरण को जन्म दे रहा है। लोकतांत्रिक देश अब सुरक्षा और तकनीकी सहयोग उन्हीं राज्यों तक सीमित कर रहे हैं जो समान राजनीतिक व्यवस्था साझा करते हैं, जिससे गठबंधन अधिक मूल्य-आधारित हो गए हैं।

सहयोग बनाम प्रतिस्पर्धा: राज्य एक साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों कर रहे हैं, जहाँ वैश्विक मुद्दों पर सीमित सहयोग बना रहता है, जबकि रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में तीव्र प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इससे स्थायी गठबंधनों के स्थान पर लचीले और मुद्दा-आधारित साझेदारी ढाँचे उभर रहे हैं।

वैश्वीकरण बनाम आर्थिक राष्ट्रवाद: वैश्वीकरण से उत्पन्न निर्भरता को अब रणनीतिक जोखिम के रूप में देखा जाने लगा है। इसके परिणामस्वरूप व्यापार नीतियों में संरक्षणवाद, घरेलू उत्पादन पर ज़ोर और आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की प्रवृत्ति तेज़ हुई है।

रणनीतिक दृष्टि से यह अवधारणा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि शक्ति अब केवल सैन्य क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि आर्थिक उत्पादकता, तकनीकी नवाचार और संस्थागत दक्षता का समन्वय है।

ऐतिहासिक चेतावनियाँ और रणनीतिक स्मृति

मेहता लेख में डॉट-कॉम बबल (1990 के दशक के अंत) और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट का उल्लेख करते हैं। वे लिखते हैं कि इन दोनों घटनाओं से पहले चेतावनी संकेत मौजूद थे, किंतु उन्हें अनदेखा कर दिया गया (Mehta).

यह तर्क रणनीतिक अध्ययनों की उस धारा से मेल खाता है जो कहती है कि:

  • संकट घटनाएँ नहीं, बल्कि प्रक्रियाएँ होते हैं
  • सामूहिक लालच और भीड़-मानसिकता जोखिम आकलन को कमजोर कर देती है
  • संस्थागत चेतावनियाँ राजनीतिक निर्णयों में स्थान नहीं पा पातीं

तकनीक, शक्ति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

लेख में तकनीक को भविष्य की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय तत्व माना गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा नेटवर्क और डिजिटल अवसंरचना शक्ति के नए स्रोत बन चुके हैं।

अकादमिक दृष्टि से यह परिवर्तन classical geopolitics से techno-geopolitics की ओर संक्रमण को दर्शाता है। इस संदर्भ में:

  • तकनीकी निर्भरता रणनीतिक निर्भरता में बदल सकती है
  • नवाचार क्षमता राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख सूचक बन रही है

वैश्विक राजनीति में उभरती द्वंद्वात्मकताएँ

मेहता का लेख निम्नलिखित संरचनात्मक द्वंद्वों को उजागर करता है:

  • लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद
  • सहयोग बनाम प्रतिस्पर्धा
  • वैश्वीकरण बनाम आर्थिक राष्ट्रवाद

ये द्वंद्व केवल वैचारिक नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक गठबंधनों, व्यापार नीतियों और सुरक्षा ढाँचों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

भारत के लिए निहितार्थ (Strategic Implications for India)

भारतीय संदर्भ में यह लेख विशेष महत्व रखता है। भारत:

  • उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था का सक्रिय भागीदार है
  • तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है
  • वैश्विक संस्थागत परिवर्तनों से सीधे प्रभावित होता है

ऐसे में, “कमरे में मौजूद हाथी” को पहचानना और उस पर समय रहते नीति-निर्माण करना भारत की दीर्घकालिक रणनीति के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष (Conclusion)

यह अध्ययन निष्कर्ष निकालता है कि विक्रम एस. मेहता का लेख केवल समकालीन वैश्विक स्थिति का वर्णन नहीं करता, बल्कि रणनीतिक चेतावनी प्रदान करता है। इतिहास यह दर्शाता है कि जब स्पष्ट संकेतों को राजनीतिक सुविधा के लिए अनदेखा किया जाता है, तब परिणाम प्रणालीगत संकट के रूप में सामने आते हैं। इसलिए, भविष्य की रणनीतिक स्थिरता के लिए आवश्यक है कि राज्य और संस्थाएँ “Elephant in the room” को स्वीकार कर, उसके अनुरूप नीतिगत और संस्थागत सुधार करें।

 


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