ग्वांगझोउ (चीन) में APEC के वरिष्ठ अधिकारियों की प्रथम बैठक का आयोजन 2026 APEC शिखर सम्मेलन आयोजन एक निर्णायक चरण माना जा रहा है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आर्थिक-कूटनीतिक सक्रियता को भी रेखांकित करता है। आज की वैश्विक व्यवस्था अभूतपूर्व अनिश्चितताओं से गुज़र रही है। भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक विखंडन, व्यापार संरक्षणवाद और बहुपक्षीय संस्थाओं की कमजोर पड़ती भूमिका ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे समय में एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) मंच की प्रासंगिकता और ज़िम्मेदारी दोनों बढ़ जाती हैं। APEC के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह मौजूदा ‘अस्थिरता (turbulence)’ को ‘गतिशील विकास (traction)’ में कैसे बदले।
एशिया–प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) क्या है?
- एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) एक प्रमुख क्षेत्रीय आर्थिक मंच है, जिसकी स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी।
- इसमें 21 सदस्य अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं और इसका मुख्य उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में संतुलित, समावेशी, सतत् तथा नवाचार-आधारित विकास को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही APEC क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य करता है।
APEC की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि यह ‘देशों’ के बजाय ‘अर्थव्यवस्थाओं (Economies)’ शब्द का प्रयोग करता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक संवेदनशीलताओं से बचते हुए आर्थिक सहयोग को केंद्र में रखना है।
APEC के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र
APEC का प्रमुख लक्ष्य क्षेत्र में वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और लोगों की आवाजाही को सरल और सुगम बनाना है। इसके लिए यह मंच:
- सीमा शुल्क और व्यापार प्रक्रियाओं को सरल बनाता है।
- व्यापार करने में आने वाली बाधाओं को कम करता है।
- क्षेत्रीय मानकों और नीतियों में सामंजस्य स्थापित करता है।
- निवेश और उद्यमिता के लिए अनुकूल वातावरण को प्रोत्साहित करता है।
इन प्रयासों के माध्यम से APEC क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार को मजबूती प्रदान करता है।
APEC की सदस्य अर्थव्यवस्थाएँ
APEC में निम्नलिखित 21 अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं:
ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई दारुस्सलाम, कनाडा, चिली, चीन, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूज़ीलैंड, पापुआ न्यू गिनी, पेरू, फिलीपींस, रूस, सिंगापुर, चीनी ताइपे, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका और वियतनाम।
इन 21 अर्थव्यवस्थाओं की कुल जनसंख्या लगभग 2.95 अरब है, जो विश्व की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। ये अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक GDP का लगभग 62% और विश्व व्यापार का करीब 48% (2021 के आँकड़ों के अनुसार) प्रतिनिधित्व करती हैं।
APEC और ‘चीन वर्ष’ का महत्व
- चीन के ग्वांगझोउ शहर में आयोजित एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) के वरिष्ठ अधिकारियों की पहली बैठक और उससे जुड़े कार्यक्रम, 2026 के APEC शिखर सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत माने जा रहे हैं।
- यह बैठक केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि APEC के भविष्य की दिशा तय करने वाला क्षण भी है।
केंद्रीय विषय के साथ आयोजित इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को सक्रिय करना है, ताकि नवंबर में होने वाले APEC आर्थिक नेताओं के सम्मेलन के लिए ठोस आधार तैयार हो सके।
वैश्विक उथल–पुथल और APEC की भूमिका
- आज की दुनिया में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक विखंडन तेज़ी से बढ़ रहा है। एकतरफ़ा नीतियाँ और व्यापार संरक्षणवाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद को कमजोर कर रहे हैं।
- APEC ऐसे समय में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पिछले दशकों में जिस ‘हाइपर–ग्लोबलाइज़ेशन’ ने तेज़ विकास को जन्म दिया था, आज वही प्रक्रिया ठहराव का शिकार है। पहले जहाँ व्यापार उदारीकरण और खुले बाज़ारों पर आम सहमति थी, वहीं अब राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और भू-राजनीतिक हित आर्थिक नीतियों पर हावी होते जा रहे हैं।
- ‘डी-ग्लोबलाइज़ेशन’ या ‘फ्रेंड-शोरिंग’ जैसी अवधारणाएँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्गठित कर रही हैं। इससे विकासशील देशों के लिए नए अवसर भी हैं, लेकिन जोखिम कहीं अधिक हैं।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ सुधार की माँग से जूझ रही हैं। निर्णय-प्रक्रिया धीमी है और विकसित-विकासशील देशों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है।
व्यापार, सुरक्षा और सहयोग का द्वंद्व
- आज व्यापार और राजनीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और रणनीतिक उद्योगों की सुरक्षा ये सभी मुद्दे APEC क्षेत्र को सीधे प्रभावित करते हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका की टैरिफ नीति ने न केवल व्यापार प्रवाह को बाधित किया है, बल्कि निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की दक्षता को भी नुकसान पहुँचाया है।
- वहीं, विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उनके पास आर्थिक झटकों से निपटने के सीमित संसाधन होते हैं।
APEC: संवाद का मंच
APEC की सबसे बड़ी ताक़त उसका संवाद–आधारित ढाँचा है। यह संगठन बाध्यकारी संधियों पर नहीं, बल्कि सहमति, सहयोग और विश्वास-निर्माण पर आधारित है।
यही कारण है कि APEC को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने, खुले और परस्पर जुड़े आर्थिक ढाँचे को मजबूत करने और व्यापार विवादों के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में अहम भूमिका निभानी चाहिए।
APEC को चाहिए कि वह:
- खुले और निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा दे
- डिजिटल सहयोग और नवाचार को प्राथमिकता दे
- विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने में मदद करे
बहुपक्षीय सहयोग और नए मंच
- आज की जटिल वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल एक मंच पर्याप्त नहीं है। APEC को BRICS, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और अन्य क्षेत्रीय तंत्रों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए। इससे विकासशील देशों की आवाज़ मज़बूत होगी और वैश्विक आर्थिक शासन अधिक संतुलित बन सकेगा।
- विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की भूमिका को मज़बूत किए बिना स्थायी और न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था संभव नहीं है। APEC इस दिशा में सेतु की भूमिका निभा सकता है।
चीन की भूमिका और ज़िम्मेदारी
- दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 2026 के APEC शिखर सम्मेलन के मेज़बान के रूप में, चीन की भूमिका निर्णायक है।
- चीन को न केवल संवाद और सहयोग को मज़बूत करना होगा, बल्कि अपने घरेलू सुधारों के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता भी लानी होगी।
- चीन के सामने संरचनात्मक चुनौतियाँ हैं जैसे स्थानीय सरकारों का कर्ज़, रियल एस्टेट संकट और धीमी आर्थिक वृद्धि। इसके बावजूद, यदि चीन बाज़ार-उदारीकरण, निवेश-अनुकूल नीतियों और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, तो यह पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत होगा।
‘चीन क्षण’ या ‘APEC क्षण’?
प्रश्न यह नहीं है कि यह ‘चीन का क्षण’ है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या APEC इस अवसर को सामूहिक प्रगति में बदल सकता है।
आपसी विश्वास, खुलेपन और समावेशिता के बिना कोई भी बहुपक्षीय मंच सफल नहीं हो सकता। APEC को यह दिखाना होगा कि सहयोग टकराव से बेहतर विकल्प है।
भारत और APEC
भारत वर्तमान में APEC का सदस्य नहीं है, लेकिन इसके अधिकांश सदस्य देशों के साथ भारत के मज़बूत राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
भारत APEC को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहित करने वाले एक प्रभावशाली मंच के रूप में देखता है।
यदि भारत को APEC की सदस्यता प्राप्त होती है, तो इससे:
- वैश्विक व्यापार मानकों के साथ बेहतर तालमेल।
- व्यापार प्रक्रियाओं का सरलीकरण।
- विदेशी निवेश में वृद्धि।
- ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी पहलों को बल।
मिल सकता है।
भारत की सदस्यता न मिलने के कारण
भारत की APEC सदस्यता की संभावना कई कारणों से सीमित रही है। इनमें प्रमुख हैं:
- APEC की सर्वसम्मति–आधारित सदस्यता प्रक्रिया
- नए सदस्यों को शामिल करने पर लंबे समय से लगा हुआ प्रवेश स्थगन (membership freeze)
- भारत की अपेक्षाकृत संरक्षणवादी व्यापार नीतियाँ
- जटिल विनियामक ढाँचे को लेकर कुछ सदस्य देशों की आशंकाएँ
इसके अतिरिक्त, भू–राजनीतिक कारणों, विशेषकर चीन के अप्रकट विरोध, ने भी भारत की सदस्यता में बाधा उत्पन्न की है। भारत द्वारा 1991 और 1997 में आवेदन किए जाने के बावजूद उसे APEC की पूर्ण सदस्यता नहीं मिल सकी। हालाँकि, भारत ने समय-समय पर अतिथि या पर्यवेक्षक के रूप में APEC बैठकों में भाग लिया है।
APEC का विकसित एजेंडा और भारत का हिंद–प्रशांत दृष्टिकोण
APEC का विकसित होता एजेंडा भारत की हिंद–प्रशांत रणनीति के साथ कई स्तरों पर मेल खाता है।
(1) साझा दृष्टिकोण: APEC और भारत दोनों ही एक स्वतंत्र, खुला, समावेशी और नियम-आधारित क्षेत्रीय ढाँचे का समर्थन करते हैं, जहाँ पारदर्शिता, आपसी विश्वास और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान हो।
(2) कनेक्टिविटी और आर्थिक एकीकरण: APEC का ज़ोर आपूर्ति-शृंखला सुदृढ़ीकरण, भौतिक एवं डिजिटल कनेक्टिविटी पर है, जो भारत की एक्ट ईस्ट नीति और हिंद-प्रशांत पहलों के अनुरूप है।
(3) डिजिटल और नवाचार सहयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार-आधारित विकास पर APEC का बढ़ता ध्यान, भारत के डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और इंडिया AI मिशन के साथ गहराई से जुड़ता है। इससे भारत को क्षेत्र में एक डिजिटल सेतु के रूप में उभरने का अवसर मिलता है।
निष्कर्ष
आज जब दुनिया विभाजन और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, APEC के पास यह अवसर है कि वह अस्थिरता को अवसर में बदले। यदि APEC खुले संवाद, समावेशी विकास और निष्पक्ष व्यापार को प्राथमिकता देता है, तो यह न केवल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी स्थिरता और भरोसे का स्रोत बन सकता है। उथल-पुथल से प्रगति तक का यह सफ़र आसान नहीं है, लेकिन यही APEC की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी भी है।
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