भारत और मलेशिया के बीच संबंध मात्र दो राष्ट्रों के बीच के राजनयिक संबंध नहीं हैं, बल्कि यह दो प्राचीन सभ्यताओं के मिलन की कहानी है। दक्षिण-पूर्व एशिया में मलेशिया, भारत के लिए न केवल एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का एक मजबूत स्तंभ भी है। समय के साथ इन संबंधों ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2024 और 2026 की उच्च-स्तरीय वार्ताओं के बाद, दोनों देशों ने अपनी साझेदारी को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ (Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर पर पहुँचा दिया है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें
- भारत और मलेशिया के संबंधों का इतिहास सदियों पुराना है, जिसकी शुरुआत चोल साम्राज्य के काल से मानी जाती है।
- 9वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान राजा राजा चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम जैसे महान शासकों के नेतृत्व में भारतीय समुद्री व्यापारिक मार्ग मलाया प्रायद्वीप तक फैले हुए थे। इस कालखंड ने मलेशिया की संस्कृति, भाषा और परंपराओं पर गहरा प्रभाव डाला।
- आज भी मलेशियाई संस्कृति में भारतीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
- आधुनिक युग में, भारत ने 1957 में मलेशिया (तब मलाया संघ) की स्वतंत्रता के साथ ही औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।
- तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और मलेशिया के पहले प्रधान मंत्री टुंकू अब्दुल रहमान के बीच की व्यक्तिगत मित्रता ने इन संबंधों की मजबूत नींव रखी थी।
आर्थिक सहयोग और व्यापारिक महत्व
- आर्थिक दृष्टिकोण से मलेशिया, आसियान देशों में भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।

- वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 20 बिलियन डॉलर के करीब पहुँच गया है।

- भारत के लिए मलेशिया पाम ऑयल, पेट्रोलियम उत्पादों और इलेक्ट्रॉनिक्स का एक प्रमुख स्रोत है। वहीं, भारत मलेशिया को मांस, एल्युमीनियम, मशीनरी और रसायनों का निर्यात करता है।
- आर्थिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए हाल ही में दोनों देशों ने अपनी स्थानीय मुद्राओं—भारतीय रुपया (INR) और मलेशियाई रिंगित (MYR)—में व्यापार करने पर सहमति व्यक्त की है। यह कदम अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और व्यापारिक लागत को घटाने की दिशा में एक क्रांतिकारी निर्णय है।
- साथ ही, ‘आसियान-भारत माल व्यापार समझौते’ (AITIGA) की समीक्षा दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करने में सहायक सिद्ध होगी।
रणनीतिक और रक्षा क्षेत्र में बढ़ती निकटता
- भारत और मलेशिया के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरा है। 1993 के रक्षा सहयोग समझौते के बाद से दोनों देशों की सेनाएं नियमित रूप से संयुक्त अभ्यास में भाग ले रही हैं। ‘हरिमौ शक्ति’ (थल सेना), ‘समुद्र लक्ष्मण’ (नौसेना) और ‘उदार शक्ति’ (वायु सेना) जैसे सैन्य अभ्यास दोनों देशों की सेनाओं के बीच परिचालन तालमेल को बढ़ाते हैं।
- भारत ने मलेशिया को अपने स्वदेशी रक्षा प्लेटफार्मों, जैसे ‘तेजस’ हल्के लड़ाकू विमान और ‘ब्रह्मोस’ मिसाइलों की पेशकश भी की है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, दक्षिण चीन सागर में एक नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए मलेशिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साथी है।
प्रवासी भारतीय और मानवीय संबंध
मलेशिया में भारतीय मूल के लोगों (PIO) की एक विशाल संख्या रहती है, जो लगभग 27 लाख से अधिक है। यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भारतीय प्रवासी समुदाय है। मलेशिया की कुल जनसंख्या का लगभग 6.8 प्रतिशत हिस्सा भारतीय मूल का है, जिनमें से अधिकांश तमिल भाषी हैं।

यह प्रवासी समुदाय मलेशिया के निर्माण में न केवल आर्थिक योगदान दे रहा है, बल्कि भारत और मलेशिया के बीच एक जीवित सेतु (Living Bridge) का कार्य भी कर रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने मलेशिया में एक नया महावाणिज्य दूतावास (Consulate General) खोलने और यूनिवर्सिटी मलाया में ‘तिरुवल्लुवर केंद्र’ स्थापित करने की घोषणा की है, जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंधों को नई ऊँचाई देगा।
संबंधों के बीच मौजूद प्रमुख चुनौतियाँ
तमाम सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, भारत और मलेशिया के संबंधों में कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी रही हैं जिन्होंने समय-समय पर तनाव पैदा किया है।
- इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा ‘डॉ. जाकिर नाइक’ का प्रत्यर्पण है। भारत ने बार-बार मलेशिया से इस विवादित उपदेशक के प्रत्यर्पण की मांग की है, लेकिन कानूनी और राजनीतिक कारणों से मलेशिया ने अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
- इसके अतिरिक्त, कश्मीर और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे भारत के आंतरिक मामलों पर मलेशिया के पूर्ववर्ती नेतृत्व की टिप्पणियों ने भी राजनयिक दरार पैदा की थी।
- 2019 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने कश्मीर मुद्दे पर भारत विरोधी रुख अपनाया, तो भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मलेशियाई पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे मलेशिया को भारी आर्थिक नुकसान हुआ था।
- व्यापार असंतुलन भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि भारत का मलेशिया के साथ व्यापार घाटा काफी अधिक है।
भविष्य की राह और उभरते क्षेत्र
- वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के नेतृत्व में दोनों देश इन पुराने विवादों को पीछे छोड़कर एक नई शुरुआत कर रहे हैं।
- भविष्य के सहयोग के लिए सेमीकंडक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों की पहचान की गई है।
- मलेशिया वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर निर्यात में छठा स्थान रखता है, और भारत की बढ़ती डिजिटल महत्वाकांक्षाओं के लिए यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- दोनों देशों ने फिनटेक क्षेत्र में भी ‘UPI-PayNet’ लिंकेज के माध्यम से सीमा पार भुगतान को सुगम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
निष्कर्ष
भारत और मलेशिया के बीच के संबंध यथार्थवादी कूटनीति और साझा सांस्कृतिक विरासत का मिश्रण हैं। जहाँ चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, वहीं दोनों देशों ने यह स्वीकार किया है कि उनके साझा हित मतभेदों से कहीं अधिक बड़े हैं। एक स्थिर और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत और मलेशिया का साथ आना अनिवार्य है। यदि दोनों देश अपनी रणनीतिक साझेदारी को इसी गति से आगे बढ़ाते रहे, तो यह न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी एक सकारात्मक संदेश होगा।
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