हाल ही में लोक सभा में एक गैर-सरकारी सदस्य द्वारा ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ विधेयक प्रस्तुत किया गया। राइट टू डिस्कनेक्ट एक कानूनी सुरक्षा है, जो कर्मचारियों को कार्य समय पूर्ण होने के बाद कार्य से असंबद्ध होने और नियोक्ता के संबंधित इलेक्ट्रॉनिक संचार की उपेक्षा करने की अनुमति देती है।
कार्य-जीवन संतुलन के बिगड़ते हालात और बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं को देखते हुए संसद में “राइट टू डिस्कनेक्ट” विधेयक को एक निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे पहले 2019 और 2025 में भी ऐसे प्रयास किए गए थे।
राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक, 2026 क्या है?
- मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 24 ‘प्रत्येक व्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है, जिसमें कार्य के घंटों की उचित सीमा और सवेतन आवधिक अवकाश शामिल हैं।’
- यह विधेयक कर्मचारियों को आधिकारिक कार्य समय के बाहर कार्य-संबंधित संचार (ईमेल, कॉल, संदेश आदि) से अलग रहने का कानूनी अधिकार प्रदान करने का प्रयास करता है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई का भय न रहे।
- कार्य समय के बाद लगातार संचार “टेलीप्रेशर” (काम के संदेशों का तुरंत उत्तर देने की मनोवैज्ञानिक बाध्यता) उत्पन्न करता है, जिससे तनाव, नींद की कमी और कार्य–जीवन संतुलन में गिरावट आती है।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, वर्ष 2024 में भारतीयों ने वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक औसत कार्य घंटे (प्रति सप्ताह 2 घंटे) काम किए।
- कंपनियों को कानूनन एक व्यापक नीति तैयार करनी होगी, जो ट्रेड यूनियनों या कर्मचारी प्रतिनिधियों के परामर्श से बनाई जाएगी।
इस नीति में निम्नलिखित को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाएगा:
- कार्य समय और कार्य समय के बाद अनुमत संचार की सीमा।
- आपातकालीन प्रोटोकॉल और शिकायत निवारण तंत्र।
- डिजिटल वेलनेस (डिजिटल स्वास्थ्य) से संबंधित उपाय।
राइट टू डिस्कनेक्ट का संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण का अधिकार और गरिमा का अधिकार।
- अनुच्छेद 39(e): यह राज्य को कर्मचारियों के स्वास्थ्य और शक्ति के दुरुपयोग को रोकने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 42: राज्य कार्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए उपबंध करेगा।
राइट टू डिस्कनेक्ट की आवश्यकता
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य: डिजिटल युग में हर समय उपलब्ध रहने की अपेक्षा से अनिद्रा, अत्यधिक तनाव, नींद की कमी और मानसिक थकावट जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- उत्पादकता में गिरावट: उदाहरण के लिए, विभिन्न अध्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रति सप्ताह 50 घंटे से अधिक कार्य करने पर उत्पादकता कम हो जाती है। इससे देश की समग्र आर्थिक संवृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- सामाजिक–मनोवैज्ञानिक प्रभाव: अत्यधिक कार्य करने से कार्य-जीवन संतुलन बिगड़ता है और सामाजिक संबंध प्रभावित होते हैं(जैसे – सामाजिक अलगाव)।
- उदाहरण के लिए, 2024 में पुणे में अत्यधिक कार्य के कारण अर्न्स्ट एंड यंग के एक कर्मचारी की मृत्यु हो गई।
- नियोक्ता–कर्मचारी संबंध: चौबीसों घंटे उपलब्ध न रहने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का खतरा शक्ति संतुलन को नियोक्ताओं के पक्ष में झुका देता है।
- लैंगिक समानता: एक हालिया रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि ऑडिटिंग, आईटी और मीडिया जैसी पेशेवर नौकरियों में कार्यरत भारतीय महिलाएं प्रति सप्ताह 55 घंटे से अधिक कार्य करती हैं।
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ पर वैश्विक स्थिति
यह विधेयक फ्रांस, बेल्जियम, पुर्तगाल, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के अनुभवों से प्रेरित है, जहाँ कर्मचारियों के व्यक्तिगत समय और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान किए गए हैं।
- फ्रांस – एल खोमरी कानून (2017): फ्रांस ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला देश बना। इस कानून के तहत कंपनियों को कर्मचारियों के साथ मिलकर कार्य समय के बाद डिजिटल संचार की सीमाएँ निर्धारित करनी होती हैं।
- ऑस्ट्रेलिया – फेयर वर्क कानून (2024 संशोधन): संशोधन के अनुसार कर्मचारी कार्य समय के बाद आने वाले कॉल, ईमेल या संदेशों को अनदेखा कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उनका इनकार अनुचित न हो (जैसे किसी आपात स्थिति में)।
- पुर्तगाल:यहाँ ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून लागू है, जिसके तहत आपात स्थिति को छोड़कर नियोक्ताओं के लिए कार्य समय के बाहर कर्मचारियों से संपर्क करना अवैध है।
- स्पेन: स्पेन में सरकारी कर्मचारियों और अन्य श्रमिकों को अपने डिजिटल उपकरणों को “स्विच ऑफ” करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है, जिससे उनके निजी समय की रक्षा सुनिश्चित की जाती है।
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ से संबंधित प्रमुख सावधानियाँ
- लॉजिस्टिक एवं अनुपालन संबंधी चुनौतियाँ: ऐसे कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नियोक्ताओं को स्पष्ट दिशानिर्देश, निगरानी तंत्र और अनुपालन प्रणाली विकसित करनी होगी। विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों या विभिन्न राज्यों/समय-क्षेत्रों में कार्यरत टीमों के संदर्भ में समन्वय और अनुपालन सुनिश्चित करना अधिक जटिल हो सकता है।
- आवश्यक सेवाओं हेतु अपवाद: स्वास्थ्य सेवा, पुलिस, अग्निशमन, विद्युत आपूर्ति, आईटी संचालन तथा अन्य आवश्यक सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों के लिए आपातकालीन परिस्थितियों में पूर्ण ‘डिस्कनेक्ट’ का अधिकार व्यावहारिक नहीं हो सकता। अतः इन क्षेत्रों के लिए स्पष्ट अपवाद और संतुलित प्रावधान आवश्यक होंगे।
- ऑन–कॉल दायित्वों की स्पष्टता: जिन कर्मचारियों की संविदात्मक रूप से ‘ऑन-कॉल’ ड्यूटी निर्धारित है, उन्हें आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध रहना पड़ सकता है। ऐसी जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए तथा उसके अनुरूप उचित पारिश्रमिक और कार्य-शर्तें सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- आपातकालीन संचार की अनुमति: सार्वजनिक सुरक्षा, संस्थागत स्थिरता या व्यावसायिक निरंतरता बनाए रखने के लिए आकस्मिक या आपात स्थितियों में सीमित और उचित अवधि के लिए कार्य समय के बाद संपर्क की अनुमति दी जा सकती है।
- कार्यान्वयन में लचीलापन: भारत की क्षेत्रीय, क्षेत्रकीय (सेक्टोरल) और परिचालन विविधताओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों के निर्माण और अनुप्रयोग में लचीलापन आवश्यक है, ताकि कानून व्यवहारिक और प्रभावी दोनों बना रहे।
इन सावधानियों के माध्यम से ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ को संतुलित, व्यवहारिक और सभी हितधारकों के लिए स्वीकार्य बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
वैश्विक स्तर पर ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ की अवधारणा तेजी से स्वीकार्यता प्राप्त कर रही है। यह केवल कार्य समय की सीमा निर्धारित करने का उपाय नहीं है, बल्कि कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और कार्य–जीवन संतुलन को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण कदम है। भारत में इस प्रकार का कानून डिजिटल युग में श्रम अधिकारों को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हो सकता है।
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