in , ,

न्याय: राजनीतिक सिद्धांत की आधारशिला

न्याय राजनीतिक दर्शन की सबसे प्राचीन और केंद्रीय अवधारणा है। इसका मूल अर्थ ‘प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित हक देना’ (Giving everyone their due) है। लैटिन शब्द ‘Jus’ से निकला यह शब्द समाज के विभिन्न अंगों के बीच एक नैतिक और विधिक संतुलन की मांग करता है। जहाँ प्राचीन विचारक न्याय को ‘व्यक्तिगत सद्गुण’ मानते थे, वहीं आधुनिक विचारक इसे ‘सामाजिक संस्थाओं’ की निष्पक्षता से जोड़ते हैं।

1. प्राचीन और मध्यकालीन न्याय सिद्धांत

(a) प्लेटो का न्याय सिद्धांत

  • प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘The Republic’ का उपशीर्षक ही ‘न्याय से संबंधित’ (Concerning Justice) है। प्लेटो के अनुसार, न्याय बाहरी वस्तु नहीं बल्कि आत्मा का आंतरिक गुण है।
  • उन्होंने मानव आत्मा के तीन गुणों—विवेक (Wisdom), साहस (Courage) और तृष्णा (Appetite)—के आधार पर समाज को तीन वर्गों में बाँटा।
  • जब समाज का प्रत्येक वर्ग अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है और दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता, तो समाज में न्याय की स्थापना होती है। इसे ‘कार्य-विशिष्टीकरण’ (Functional Specialization) का सिद्धांत भी कहा जाता है।

(b) अरस्तू का न्याय सिद्धांत

अरस्तू ने न्याय को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया:

  1. वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice): यह सम्मान और संसाधनों के आवंटन से जुड़ा है। अरस्तू का मानना था कि वितरण ‘आनुपातिक समानता’ पर आधारित होना चाहिए, यानी जो समाज में जितना योगदान देता है, उसे उतना ही मिलना चाहिए।
  2. सुधारात्मक या विनिमयात्मक न्याय (Rectificatory Justice): यह लेन-देन में होने वाले अन्यायों को ठीक करने और दंड विधान से संबंधित है।

2. वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice):

वितरणात्मक न्याय का मुख्य प्रश्न यह है कि “किसे क्या मिलना चाहिए और क्यों?”

जॉन रॉल्स: निष्पक्षता के रूप में न्याय

जॉन रॉल्स (1971) ने ‘उपयोगितावाद’ का खंडन करते हुए न्याय का प्रक्रियात्मक सिद्धांत दिया। उन्होंने दो प्रसिद्ध अवधारणाएं पेश कीं:

  1. अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance): एक ऐसी ‘मूल स्थिति’ जहाँ किसी को अपनी सामाजिक स्थिति का ज्ञान न हो, ताकि नियम निष्पक्ष बनें।
  2. भेदभाव का सिद्धांत (Difference Principle): रॉल्स के अनुसार, आर्थिक असमानता केवल तभी न्यायसंगत है जब वह समाज के ‘सबसे कम सुविधाप्राप्त’ (Least Advantaged) व्यक्ति के अधिकतम लाभ के लिए हो।

रॉबर्ट नोज़िक: हकदारी सिद्धांत

रॉल्स की आलोचना करते हुए नोज़िक ने तर्क दिया कि यदि संपत्ति का अर्जन और हस्तांतरण न्यायपूर्ण है, तो राज्य को पुनर्वितरण का कोई अधिकार नहीं है। उनके लिए न्याय का अर्थ व्यक्ति की संपत्ति और स्वतंत्रता की सुरक्षा है, न कि जबरन समानता लाना।

3. सामाजिक न्याय (Social Justice) और भारतीय परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय का लक्ष्य केवल आर्थिक वितरण नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे में व्याप्त ऊंच-नीच और भेदभाव को समाप्त करना है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सामाजिक न्याय

भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय का अर्थ ‘जातिगत उत्पीड़न से मुक्ति’ है। अंबेडकर के अनुसार, न्यायपूर्ण समाज वह है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का वास हो। उन्होंने तर्क दिया कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र (Social Democracy) की स्थापना न हो जाए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15, 16 और 17 इसी सामाजिक न्याय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

सकारात्मक कार्यवाही : सामाजिक न्याय को लागू करने के लिए राज्य ‘सकारात्मक भेदभाव’ या ‘आरक्षण’ का सहारा लेता है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को ‘समान धरातल’ (Level Playing Field) प्रदान करना है।

4. न्याय के समकालीन और वैकल्पिक दृष्टिकोण

(a) समुदायवादी दृष्टिकोण

माइकल सैंडल और माइकल वाल्ज़र जैसे विचारकों ने रॉल्स की आलोचना की। उनका तर्क है कि व्यक्ति समाज से कटा हुआ (Unencumbered Self) नहीं होता। न्याय के नियम समाज की संस्कृति और परंपराओं से निकलते हैं। वाल्ज़र ने ‘जटिल समानता’ (Complex Equality) का विचार दिया, जिसके अनुसार न्याय के नियम अलग-अलग क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, धन) के लिए अलग-अलग होने चाहिए।

(b) नारीवादी दृष्टिकोण 

सुसान मोलर ओकिन और कैरल गिलीगन ने तर्क दिया कि पारंपरिक न्याय सिद्धांत ‘निजी क्षेत्र’ (परिवार) की उपेक्षा करते हैं। ओकिन के अनुसार, “यदि परिवार के भीतर न्याय नहीं है, तो समाज में न्याय कभी नहीं हो सकता।” उन्होंने घरेलू श्रम के बँवारे और लैंगिक समानता को न्याय का अनिवार्य हिस्सा माना।

(c) मार्क्सवादी दृष्टिकोण

मार्क्सवादियों के लिए उदारवादी न्याय एक ‘बुर्जुआ’ अवधारणा है। वास्तविक न्याय केवल तभी संभव है जब निजी संपत्ति का उन्मूलन हो जाए। उनका प्रसिद्ध नारा है: “प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।”

5. निष्कर्ष और वैचारिक समन्वय

न्याय एक गतिशील अवधारणा है। आज के युग में न्याय का अर्थ केवल संसाधनों का वितरण नहीं, बल्कि ‘मान्यता’ (Recognition) और ‘प्रतिनिधित्व’ (Representation) भी है। नैन्सी फ्रेजर के अनुसार, न्याय के लिए आर्थिक सुधार और सांस्कृतिक सम्मान दोनों आवश्यक हैं। अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘The Idea of Justice’ में ‘नीति’ (प्रक्रिया) के बजाय ‘न्याय’ (वास्तविक परिणाम) पर जोर दिया है। उनके अनुसार, न्याय का अर्थ लोगों की ‘क्षमताओं’ (Capabilities) का विकास करना है।

 

UPSC CIVIL SERVICES MAINS EXAM PYQ 

  1. “रॉल्स के लिए, न्याय का विचार निष्पक्षता (Fairness) से जुड़ा है, जो अज्ञानता के पर्दे (Veil of Ignorance) के पीछे से प्राप्त होता है।” चर्चा कीजिए। (2023)
  2. “न्याय के प्रति समुदायवादी दृष्टिकोण (Communitarian Perspective) की विवेचना कीजिए।” (2022)
  3. “रॉल्स का भेदभाव का सिद्धांत (Difference Principle) सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को तभी उचित ठहराता है जब वे समाज के सबसे कम सुविधाप्राप्त वर्ग के लाभ के लिए हों।” टिप्पणी कीजिए। (2021)
  4. “नारीवादी विचारकों के अनुसार, ‘निजी क्षेत्र’ (Private Sphere) न्याय के सिद्धांतों से अछूता नहीं रह सकता।” सुसान मोलर ओकिन के संदर्भ में टिप्पणी कीजिए। (2019)

Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

स्वतंत्रता की अवधारणा और अर्थ

राजनीतिक समाजीकरण और राजनीतिक संस्कृति में अंतरसंबंध