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G20 शिखर सम्मेलन 2025: वैश्विक एकता, समानता और स्थिरता की नई राह

वर्ष 2025 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में संपन्न हुआ G20 शिखर सम्मेलन वैश्विक पटल पर एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित हुआ। यह पहली बार था जब किसी अफ्रीकी राष्ट्र को इस महत्वपूर्ण समूह की अध्यक्षता करने और शिखर सम्मेलन का आयोजन करने का गौरव प्राप्त हुआ। ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को बुलंद करने के संदर्भ में यह आयोजन विशेष मायने रखता है। दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता में आयोजित इस शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था के सम्मुख उपस्थित जटिल चुनौतियों का समाधान खोजना और समावेशी विकास की दिशा में सामूहिक प्रयास सुनिश्चित करना रहा।

आयोजन और मुख्य विषयवस्तु:

G20 शिखर सम्मेलन 2025 का भव्य आयोजन दक्षिण अफ्रीका के सबसे बड़े शहर जोहान्सबर्ग में हुआ। दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता में इस वर्ष का केंद्रीय विषय था “एकता, समानता और स्थिरता”। यह थीम न केवल अफ्रीका महाद्वीप की आकांक्षाओं को दर्शाती है, बल्कि विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) की उन मूलभूत आवश्यकताओं पर भी ज़ोर देती है, जो गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन के न्यायसंगत समाधान और विकासशील देशों को वैश्विक वित्तीय संस्थानों में समान प्रतिनिधित्व दिलाने से जुड़ी हैं। मेजबान देश ने आपदा लचीलापन (Disaster Resilience), वैश्विक ऋण स्थिरता, और स्वास्थ्य देखभाल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया।

संयुक्त घोषणापत्र और प्रमुख वैश्विक मुद्दे:

सम्मेलन के समापन पर जारी किया गया ‘जोहान्सबर्ग घोषणापत्र’ विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच सर्वसम्मति और सामूहिक संकल्प का प्रतीक बना। यह घोषणापत्र वैश्विक आतंकवाद, जलवायु वित्तपोषण, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर जी20 देशों की सहमति को दर्शाता है। घोषणापत्र ने क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के सम्मान के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत कार्रवाई करने पर बल दिया। इसके अतिरिक्त, इसने यूक्रेन और फ़िलिस्तीन जैसे संघर्षरत क्षेत्रों में शांति स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।

सबसे महत्वपूर्ण रूप से, घोषणापत्र ने अफ्रीकी देशों की दुर्दशा पर ध्यान केंद्रित किया, जिसमें लगभग 600 मिलियन लोगों तक बिजली की पहुंच न होना और स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की कमी से जुड़ी समस्याएँ शामिल थीं। घोषणापत्र में ‘G20 फाइनेंस ट्रैक अफ्रीका इंगेजमेंट फ्रेमवर्क 2025-2030’ को भी लॉन्च किया गया, जिसका उद्देश्य अफ्रीका को उसके आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने में सहायता करना है। भारत के एजेंडे को भी घोषणापत्र में प्रमुखता मिली, जिसमें स्वास्थ्य, ज्ञान और कौशल विकास से जुड़ी पहलें शामिल थीं।

अमेरिकी बहिष्कार और राजनयिक तनाव:

G20 सम्मेलन 2025 एक बड़ी राजनयिक चुनौती के बीच संपन्न हुआ, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस शिखर सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। यह बहिष्कार वैश्विक भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह राजनयिक दबाव के बावजूद, शेष G20 सदस्यों ने घोषणापत्र को सर्वसम्मति से अपनाया, जिसने एक तरह से समूह की परंपरा को तोड़ा और यह संदेश दिया कि G20 अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए प्रमुख मंच बना रहेगा, भले ही कुछ प्रमुख सदस्य अनुपस्थित हों। अमेरिकी बहिष्कार ने वैश्विक मंच पर समूह की एकजुटता और निर्णयन प्रक्रियाओं की स्वायत्तता पर गहन बहस छेड़ दी।

G20 की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक विकास:

G20 यानी ‘ग्रुप ऑफ ट्वेंटी’ विश्व की 20 प्रमुख औद्योगिक और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक समूह है। इसका उद्भव 1997-98 के एशियाई वित्तीय संकट की पृष्ठभूमि में हुआ था। इसकी स्थापना 1999 में हुई थी, जिसका प्रारंभिक उद्देश्य महत्वपूर्ण औद्योगिक और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नरों को एक मंच पर लाकर वैश्विक आर्थिक और वित्तीय मुद्दों पर चर्चा करना था। शुरुआती बैठकों का फोकस मुख्यतः वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर था।

G20 के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान आया। इस महामंदी ने यह सिद्ध कर दिया कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान केवल वित्त मंत्रियों के स्तर पर संभव नहीं है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के सुझाव पर, 2008 में इस समूह को राज्य/सरकार के प्रमुखों के स्तर तक उन्नत कर दिया गया। इसके बाद, G20 को “अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए प्रमुख मंच” नामित किया गया और इसके एजेंडे का विस्तार आर्थिक संकटों से जूझने के साथ-साथ अन्य वैश्विक संकटों जैसे जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और विकास को भी शामिल करने के लिए किया गया। इस उन्नयन के बाद से ही G20 लीडर्स हर साल नियमित रूप से शिखर सम्मेलनों में भाग लेते हैं।

ट्रोइका और अफ्रीकी संघ का समावेश:

G20 के पास कोई स्थायी सचिवालय नहीं है। इसका संचालन अध्यक्ष राष्ट्र द्वारा पिछले अध्यक्ष और अगले अध्यक्ष के सहयोग से संपन्न किया जाता है। इस तिकड़ी को ‘ट्रोइका’ कहा जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि समूह के भीतर एजेंडे की निरंतरता बनी रहे। 2023 में भारत की अध्यक्षता में, नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया, जब अफ्रीकी संघ को G20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जिससे यह समूह अब G21 के रूप में जाना जाने लगा। यह कदम ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने और वैश्विक शासन में अधिक संतुलन लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसकी महत्ता 2025 के जोहान्सबर्ग सम्मेलन में और भी अधिक दिखाई दी।

पिछले सम्मेलन (भारत 2023 और ब्राज़ील 2024) से संबंध:

G20 शिखर सम्मेलन 2025, ‘ट्रोइका’ के माध्यम से पिछले दो सम्मेलनों—भारत 2023 और ब्राजील 2024 की प्रगति को आगे बढ़ाता है।

भारत (2023) – ‘वसुधैव कुटुम्बकम’: भारत की अध्यक्षता का विषय “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” था। भारत ने ‘महिला-नेतृत्व विकास’ को बढ़ावा देने, ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA) की शुरुआत करने और अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाने जैसी बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। जोहान्सबर्ग (2025) सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने फिर से क्रिटिकल टेक्नोलॉजी, टैलेंट मोबिलिटी और स्वास्थ्य के क्षेत्र में साझेदारी का आह्वान किया, जो सीधे तौर पर भारत द्वारा दिल्ली घोषणापत्र में स्थापित एजेंडे की निरंतरता थी।

ब्राजील (2024) – ‘सामाजिक समावेशन’: ब्राजील ने रियो डी जेनेरियो में 19वें G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, जिसका प्राथमिक लक्ष्य 2030 तक भुखमरी और गरीबी को समाप्त करना था। ब्राजील के घोषणापत्र में सामाजिक समावेशन, जलवायु वित्त और ‘भूख और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन’ की शुरुआत पर ज़ोर दिया गया। दक्षिण अफ्रीका (2025) ने ब्राजील के इस एजेंडे को आगे बढ़ाया। जोहान्सबर्ग घोषणापत्र में अफ्रीकी देशों में भुखमरी और स्वच्छ ऊर्जा की कमी पर विशेष ध्यान केंद्रित करना ब्राजील की सामाजिक समावेशन की विरासत को मज़बूती प्रदान करता है।

आगामी सम्मेलन (अमेरिका 2026) से संबंध:

2026 में G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी संयुक्त राज्य अमेरिका करेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका, जिसने 2025 के सम्मेलन का बहिष्कार किया, 2026 में समूह की प्राथमिकताओं को किस प्रकार निर्धारित करता है। अमेरिका द्वारा 2026 में पदभार संभालने का लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, विशेषकर वैश्विक व्यापार और तकनीकी मानकों पर, को पुनः स्थापित करने का हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका ने ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को जो मज़बूती दी है, उस पृष्ठभूमि में अमेरिका पर यह दबाव होगा कि वह विकासशील देशों की जरूरतों को अपने एजेंडे में पर्याप्त रूप से शामिल करे, ताकि G20 की समावेशी प्रकृति बनी रहे। भारत (2023), ब्राज़ील (2024) और दक्षिण अफ्रीका (2025) के लगातार ग्लोबल साउथ देशों द्वारा अध्यक्षता किए जाने के बाद, अमेरिका (2026) की अध्यक्षता को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के प्रमुख मंच के रूप में G20 की भूमिका के परीक्षण के रूप में देखा जाएगा।

G20 सम्मेलन 2025 की सफलता का समीक्षात्मक विश्लेषण:

G20 शिखर सम्मेलन 2025 की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि यह अफ्रीका महाद्वीप की प्राथमिकताओं को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाने में सफल रहा। ‘एकता, समानता और स्थिरता’ का विषय, विशेष रूप से अफ्रीकी संघ की 2023 में मिली स्थायी सदस्यता के संदर्भ में, G20 को एक अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित मंच बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

  • सकारात्मक पहलू: दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता में, समूह ने अमेरिकी बहिष्कार जैसे बड़े राजनयिक तनाव के बावजूद, एक संयुक्त घोषणापत्र को सफलतापूर्वक अपनाया। ‘G20 फाइनेंस ट्रैक अफ्रीका इंगेजमेंट फ्रेमवर्क’ का लॉन्च एक ठोस और कार्रवाई योग्य परिणाम था, जो अफ्रीका में आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा। भारत द्वारा क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और टैलेंट मोबिलिटी पर दिए गए ज़ोर ने भविष्य के कार्यबल और नवाचार के लिए वैश्विक ढांचा विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
  • चुनौतियाँ और आलोचना: अमेरिकी बहिष्कार ने समूह की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सर्वसम्मति की अनिवार्यता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। यह दर्शाता है कि भू-राजनीतिक विभाजन वैश्विक आर्थिक सहयोग को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, घोषणापत्र में उल्लिखित संकल्पों—जैसे जलवायु वित्तपोषण के लक्ष्य—के वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद बने रहने की संभावना है।

निष्कर्ष और आगे की राह:

G20 शिखर सम्मेलन 2025 ने स्पष्ट कर दिया कि यह मंच अब केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, विकास और वैश्विक शासन सुधार से जुड़ी जटिल चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए एक आवश्यक मंच बन गया है। दक्षिण अफ्रीका की सफलता ने यह साबित किया कि ‘ग्लोबल साउथ’ में G20 की प्रासंगिकता और नेतृत्व क्षमता सशक्त है।

आगे की राह में G20 को निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करना होगा:

  • प्रतिबद्धताओं का क्रियान्वयन: घोषणापत्र में किए गए संकल्पों, विशेषकर अफ्रीका के लिए वित्तीय ढांचे और जलवायु वित्तपोषण के वादों, को धरातल पर उतारने के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध तंत्र विकसित करना।
  • समावेशी वैश्विक शासन: बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) में सुधार की गति को तेज़ करना, ताकि विकासशील देशों को वैश्विक वित्तीय संस्थानों में अधिक न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिल सके।
  • भू-राजनीतिक चुनौतियों का प्रबंधन: अमेरिकी बहिष्कार जैसे राजनयिक तनावों को समूह की मुख्य कार्यप्रणाली को बाधित न करने देने के लिए, G20 को आम सहमति बनाने के लिए और अधिक लचीले और रचनात्मक तरीकों की तलाश करनी होगी।

संक्षेप में, G20 2025, वैश्विक एकता की भावना को फिर से जागृत करने और भविष्य की जटिलताओं से निपटने के लिए एक सामूहिक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।


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