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Karl Popper : The Open Society and Its Enemies

Karl Popper की पुस्तक The Open Society and Its Enemies

कार्ल पॉपर – The Open Society and Its Enemies

कार्ल पॉपर इस पुस्तक की शुरुआत यह स्पष्ट करते हुए करते हैं कि यह स्वतंत्रता की रक्षा में लिखी गई पुस्तक है। द्वितीय विश्व युद्ध, फासीवाद, नाज़ीवाद और साम्यवादी तानाशाही के अनुभवों ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि आधुनिक अत्याचार केवल राजनीतिक दुर्घटना नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे गहरे दार्शनिक विचार काम कर रहे हैं।

पॉपर का तर्क है कि कुछ महान दार्शनिकों ने यह दावा करके—कि इतिहास निश्चित नियमों के अनुसार चलता है—अनजाने में तानाशाही को वैचारिक आधार प्रदान किया। इस प्रकार व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी को “इतिहास की अनिवार्यता” के नाम पर समाप्त कर दिया गया।


भाग – 1 : प्लेटो का प्रभाव (The Spell of Plato)


1 : बंद समाज और खुला समाज

पॉपर समाज के दो मूल प्रकार बताते हैं—
बंद समाज और खुला समाज

बंद समाज आदिवासी, परंपरावादी और स्थिर होता है, जहाँ नियमों पर प्रश्न नहीं उठाए जाते। इसके विपरीत खुला समाज वह है जहाँ व्यक्ति संस्थाओं की आलोचना कर सकता है और उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से बदल सकता है।

पॉपर के अनुसार, खुला समाज व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है, लेकिन साथ ही नैतिक जिम्मेदारी का बोझ भी डालता है।


2 : परिवर्तन का भय और तानाशाही की ओर झुकाव

पॉपर बताते हैं कि खुला समाज असुरक्षा पैदा करता है, क्योंकि व्यक्ति को अपने निर्णय स्वयं लेने पड़ते हैं। इस भय से बचने के लिए लोग अक्सर ऐसे नेताओं या विचारधाराओं की ओर आकर्षित होते हैं जो निश्चितता, अनुशासन और भाग्य का वादा करते हैं। यही मनोवैज्ञानिक भय तानाशाही का आधार बनता है।


3 : प्लेटो एक प्रतिक्रियावादी चिंतक

पॉपर प्लेटो को ऐतिहासिक संदर्भ में रखते हैं। प्लेटो ने एथेंस के लोकतंत्र का पतन देखा था। पॉपर के अनुसार, प्लेटो का दर्शन लोकतंत्र की असफलताओं की प्रतिक्रिया था। इसलिए प्लेटो ने ऐसा राज्य सोचा जो परिवर्तन से मुक्त और स्थिर हो।

पॉपर का कहना है कि प्लेटो की राजनीति स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं, बल्कि व्यवस्था और नियंत्रण के पक्ष में थी।


4 : रूपों का सिद्धांत और राजनीतिक निरपेक्षता

प्लेटो का “रूपों का सिद्धांत” यह मानता है कि सत्य और न्याय के शाश्वत रूप होते हैं। पॉपर के अनुसार, यदि कोई यह दावा करे कि उसके पास अंतिम सत्य है, तो राजनीतिक असहमति अनैतिक बन जाती है। इस प्रकार दर्शन तानाशाही का औजार बन जाता है।


 5 : प्लेटो का आदर्श राज्य = बंद समाज

रिपब्लिक के विश्लेषण में पॉपर दिखाते हैं कि प्लेटो का राज्य:

  • वर्ग आधारित है
  • सामाजिक गतिशीलता रोकता है
  • दार्शनिक-राजा द्वारा शासित है
  • सेंसरशिप और मिथकों पर टिका है

पॉपर इसे सर्वसत्तावादी राज्य का प्रारूप मानते हैं।


6 : न्याय की प्लेटोवादी अवधारणा

प्लेटो के अनुसार न्याय का अर्थ है—“हर व्यक्ति अपना निर्धारित कार्य करे।” पॉपर के अनुसार, यह न्याय नहीं बल्कि आज्ञाकारिता है। यह असमानता को स्थायी बना देता है और परिवर्तन को अपराध बना देता है।


भाग – 2 : भविष्यवाणी का चरम (हेगेल और मार्क्स)


7 : इतिहासवाद – मुख्य शत्रु

पॉपर “इतिहासवाद” को पुस्तक का केंद्रीय शत्रु बताते हैं। इतिहासवाद का दावा है कि इतिहास निश्चित नियमों से चलता है और भविष्य को वैज्ञानिक रूप से जाना जा सकता है। पॉपर इसे असंभव मानते हैं, क्योंकि मानव ज्ञान स्वयं अप्रत्याशित रूप से बढ़ता है।


 8 : हेगेल और राज्य की पूजा

पॉपर के अनुसार हेगेल ने राज्य को नैतिक सर्वोच्चता प्रदान की। जब राज्य को इतिहास और विवेक का प्रतिनिधि मान लिया जाता है, तब राज्य का विरोध अनैतिक बन जाता है। पॉपर इसे अधिनायकवाद की दार्शनिक जड़ मानते हैं।


9 : दार्शनिकों की नैतिक जिम्मेदारी

पॉपर चेतावनी देते हैं कि दार्शनिक विचार सत्ता को वैधता दे सकते हैं। जटिल भाषा और ऐतिहासिक नियतिवाद के पीछे वास्तविक दमन छिप सकता है। इसलिए दर्शन की नैतिक जिम्मेदारी अत्यंत गंभीर है।


10 : मार्क्स – नैतिक आलोचक, भविष्यवक्ता नहीं

पॉपर मार्क्स की आलोचना के साथ-साथ उनकी प्रशंसा भी करते हैं। वे मानते हैं कि मार्क्स ने पूँजीवादी शोषण को उजागर किया। किंतु जब मार्क्सवाद यह दावा करता है कि समाजवाद अवश्यंभावी है, तब वह विज्ञान नहीं, बल्कि भविष्यवाणी बन जाता है।


11 : नियतिवाद और क्रांतिकारी हिंसा

पॉपर के अनुसार, यदि इतिहास की दिशा तय है, तो व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। इससे हिंसा को यह कहकर उचित ठहराया जाता है कि वह इतिहास की मांग है।


भाग – 3 : लोकतंत्र और सामाजिक सुधार


 12 : लोकतंत्र की नई परिभाषा

पॉपर लोकतंत्र को इस प्रश्न से नहीं जोड़ते कि “शासन कौन करे?” बल्कि इस प्रश्न से जोड़ते हैं कि—
“खराब शासकों को शांतिपूर्ण ढंग से कैसे हटाया जाए?”


13 : क्रमिक सामाजिक सुधार

पॉपर “यूटोपियाई सामाजिक इंजीनियरिंग” का विरोध करते हैं और “क्रमिक सुधार” का समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि धीरे-धीरे किए गए सुधार कम नुकसानदेह होते हैं।


14 : राजनीति में अंतिम समाधान नहीं

पॉपर निष्कर्ष निकालते हैं कि राजनीति में कोई अंतिम सत्य नहीं होता। खुला समाज इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह अपनी गलतियों को सुधार सकता है


अंतिम निष्कर्ष

पॉपर चेतावनी देते हैं कि स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान नहीं, बल्कि पूर्ण निश्चितता का दावा है। जहाँ भी इतिहास, राष्ट्र या वर्ग के नाम पर अंतिम सत्य घोषित किया जाएगा, वहाँ खुला समाज नष्ट हो जाएगा।


एक पंक्ति में सार

यह पुस्तक इतिहासवाद और तानाशाही के विरुद्ध लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आलोचनात्मक विवेक की रक्षा है।


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