in ,

NCERT को कारण बताओ नोटिस: न्यायपालिका की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही का प्रश्न

न्यायालय की अवमानना क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर की गई चर्चा को लेकर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने इस प्रकरण को अत्यंत गंभीर मानते हुए शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा सचिव और NCERT के अध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी किया है, जिसमें पूछा गया है कि उनके विरुद्ध अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

क्या है मामला?

  • NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के संदर्भ में कुछ सामग्री प्रकाशित की गई थी। इस पर आपत्ति जताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने मुख्य न्यायाधीश से स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने का आग्रह किया था।
  • सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे, ने कड़ा रुख अपनाया।

न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रकरण को न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक साधारण त्रुटि नहीं हो सकती, बल्कि संस्थागत अधिकार को कमजोर करने का एक सोचा-समझा प्रयास प्रतीत होता है।
  • सीजेआई ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “उन्होंने गोली चलाई है और पूरी न्यायपालिका लहूलुहान हो रही है।”
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक इस अध्याय के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान नहीं हो जाती, तब तक स्वतः संज्ञान की कार्यवाही बंद नहीं की जाएगी।

प्रकाशन और प्रसार पर रोक

  • सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पुस्तक के किसी भी प्रकार के आगे प्रकाशन और प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध (blanket ban) लगा दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि आदेश की अवहेलना करते हुए वही सामग्री किसी अन्य शीर्षक या डिजिटल माध्यम से प्रसारित की गई, तो इसे न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाएगा और अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।
  • इसके अतिरिक्त, अदालत ने NCERT को निर्देश दिया कि केंद्र और राज्य शिक्षा विभागों के साथ समन्वय कर पुस्तक की सभी प्रतियाँ चाहे वे हार्ड कॉपी हों या डिजिटल तत्काल जब्त की जाएँ और सार्वजनिक पहुँच से हटाई जाएँ।

लेकिन यह प्रकरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शैक्षणिक विमर्श और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन के प्रश्न को भी सामने लाता है। एक ओर पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत आलोचना की सीमाएँ क्या हों, यह विचारणीय है; दूसरी ओर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और सार्वजनिक विश्वास की रक्षा भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है।

क्या है न्यायालय की अवमानना

न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) वह कृत्य है जो न्यायपालिका की गरिमा, प्राधिकारिता या न्याय प्रशासन की प्रक्रिया को क्षति पहुँचाता है, बाधित करता है या कमजोर करता है। इसका मूल उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता और प्रभावी कार्यप्रणाली को सुरक्षित रखना है।

  • न्यायालय की अवमानना को न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) में परिभाषित किया गया है, जिसे एच.एन. सान्याल समिति (1963) की अनुशंसाओं के आधार पर अधिनियमित किया गया।
  • अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय (Court of Record) घोषित करता है और उसे अवमानना के लिए दंड देने की अंतर्निहित शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालयों को भी अभिलेख न्यायालय का दर्जा देता है तथा अवमानना दंडित करने की शक्ति प्रदान करता है।

अवमानना के प्रकार

(i) सिविल अवमानना

  • किसी न्यायालय के आदेश, डिक्री या निर्णय की जानबूझकर अवज्ञा
  • न्यायालय को दिए गए अंडरटेकिंग (प्रतिबद्धता) का उल्लंघन

(ii) आपराधिक अवमानना

  • न्यायालय की गरिमा को कलंकित करना
  • उसकी प्राधिकारिता को कम करना
  • न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करना
  • ऐसी सामग्री का प्रकाशन (लिखित, मौखिक, दृश्य या डिजिटल) जो न्याय प्रशासन को बाधित करे

अवमानना कार्यवाही की पहल

(A) स्वप्रेरणा (Suo Motu): सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।

(B) तृतीय पक्ष याचिका

  • सुप्रीम कोर्ट में: महान्यायवादी (Attorney General) की अनुमति आवश्यक
  • उच्च न्यायालय में: महाधिवक्ता (Advocate General) की अनुमति आवश्यक

इसमें अधिकतम 6 महीने का साधारण कारावास, या अधिकतम ₹2,000 का जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते है।

यदि आरोपी की माफी ईमानदार और संतोषजनक हो तो न्यायालय दंड से छूट दे सकता है।

प्रमुख ऐतिहासिक निर्णय

  1. अश्विनी कुमार घोष बनाम अरबिंद बोस (1952): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के निर्णयों की निष्पक्ष और तर्कसंगत आलोचना स्वीकार्य है।
    किन्तु यदि आलोचना न्यायालय की प्राधिकारिता को कमज़ोर करने या उसे बदनाम करने के उद्देश्य से हो, तो वह अवमानना मानी जाएगी।
  2. .एम.एस. नंबूदरीपाद बनाम टी.एन. नंबियार (1970): न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका के विरुद्ध वर्ग-आधारित या राजनीतिक बयान, यदि उसकी निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करें, तो अवमानना हो सकते हैं।
    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और न्यायिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।
  3. अनिल रतन सरकार बनाम हीरक घोष (2002): सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की शक्ति के प्रयोग में संयम और सावधानी पर जोर दिया।
    यह शक्ति केवल गंभीर और स्पष्ट मामलों में ही प्रयोग की जानी चाहिए।
  4. एम.वी. जयराजन बनाम केरल उच्च न्यायालय (2015): सार्वजनिक मंच से न्यायालय के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग आपराधिक अवमानना माना गया।
    न्यायालय ने कहा कि अभद्र और अवमाननापूर्ण वक्तव्य न्याय प्रशासन को प्रभावित करते हैं।
  5. प्रशांत भूषण अवमानना मामला (2020): ट्वीट के माध्यम से न्यायपालिका पर की गई टिप्पणी को अवमानना माना गया।
    हालाँकि, अदालत ने सीमित दंड देकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक गरिमा के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
  6. षणमुगम @ लक्ष्मीनारायणन बनाम मद्रास उच्च न्यायालय (2025): न्यायालय ने कहा कि अवमानना दंड का उद्देश्य न्याय प्रशासन की रक्षा करना है।
    इसका प्रयोग आलोचना को दबाने के लिए नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए होना चाहिए।

निष्कर्ष

NCERT की पाठ्यपुस्तक से संबंधित यह मामला केवल एक शैक्षणिक विवाद नहीं, बल्कि संस्थागत मर्यादा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की साख से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से स्पष्ट है कि वह न्यायिक गरिमा पर किसी भी प्रकार के आघात को गंभीरता से लेता है।

 


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

संविधान और उसकी असंतुष्टियाँ: एक राजनीतिक दस्तावेज़ के रूप में पुनर्पाठ