अमेरिका के बाद भारत और चीन में दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संबंधो में बदलाव हो रहे है। हाल के वर्षों में सीमा विवाद के बावजूद संबंधों को समझने के लिए सूक्ष्म दृष्टिकोण जरूरी है, क्योंकि चीन अपनी रणनीतिक स्थिति को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से हिंद महासागर तक बढ़ा रहा है, जबकि भारत अपने समुद्री प्रभाव को सुरक्षित करना चाहता है।
दक्षिण एशिया में भारत और चीन का संबंध ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है, खासकर जब तक चीन हिमालयी सीमा के पार अपने प्रभाव का विस्तार नहीं कर रहा था (Gokhale, 2023)।
- दक्षिण एशिया में, ऐतिहासिक रूप से चीन ने केवल हिमालयी सीमा तक सीमित प्रभाव रखा था, लेकिन अब ‘Strategic Forward Edge’ नीति के तहत समुद्री और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में सक्रिय है।
- इंडो-पैसिफिक स्तर पर चीन का उद्देश्य भारत जैसे देशों के प्रभाव को सीमित करना और मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी हिस्से तक भारत की समुद्री शक्ति को रोकना है।
चीन – भारत संबंध
- इतिहास: 1950 और 1960 के दशक में भारत-चीन संबंध मुख्यतः स्थल सीमा विवाद तक सीमित थे, जैसे कि 1962 का युद्ध (Maxwell, 1970)।
- हाल का बदलाव: 2013 के बाद चीन की “Strategic Forward Edge” नीति के तहत PLA ने सैन्य उपस्थिति को बढ़ाया और ग्वादर (पाकिस्तान), हम्बनटोटा (श्रीलंका), और चिटगाँव (बांग्लादेश) जैसे बंदरगाहों में निवेश किया (Downs et al., 2017)।
- रणनीतिक प्रभाव: यह विस्तार भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए चुनौती बन गया है, क्योंकि यह हिंद महासागर में “String of Pearls” रणनीति को आगे बढ़ाता है (Pehrson, 2006)।

क्षेत्रीय स्तर पर (हिंद–प्रशांत)
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की रणनीति भारत के समुद्री प्रभाव को रोकने और उसे मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी हिस्से तक सीमित करने पर केंद्रित है (Gokhale, 2023)।
- चीन की रणनीति: “Belt and Road Initiative” (BRI) के तहत चीन ने दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और हिंद महासागर में बंदरगाह व आधारभूत ढाँचे पर नियंत्रण मजबूत किया (Rolland, 2017)।
- भारत की प्रतिक्रिया: भारत ने “Act East Policy” और क्वाड (QUAD) जैसे मंचों में भाग लेकर जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ नौसैनिक सहयोग बढ़ाया (Madan, 2021)।
- भू–राजनीतिक निहितार्थ: इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा संतुलन में यह प्रतिस्पर्धा भविष्य में नौसैनिक शक्ति के टकराव को जन्म दे सकती है (Kaplan, 2010)।
वैश्विक स्तर
वैश्विक स्तर पर चीन ने खुद को “Global South” का नेता और पश्चिमी प्रभुत्व के संतुलनकर्ता के रूप में स्थापित किया है (Gokhale, 2023)।
- चीन: चीन ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में ऋण, बुनियादी ढाँचा और निवेश के जरिए प्रभाव बढ़ाया, साथ ही जलवायु परिवर्तन और व्यापार के मुद्दों पर विकासशील देशों की आवाज़ बनने की कोशिश की (Dollar, 2016)।
- भारत के लिए चुनौती: भारत को पश्चिमी सहयोगियों के साथ मिलकर चीन की इस बढ़त का मुकाबला करना है, परन्तु अपनी “Strategic Autonomy” बनाए रखना भी जरूरी है (Jaishankar, 2020)।
- व्यापारिक टकराव: अमेरिका और यूरोप की तकनीकी प्रतिबंध नीतियाँ चीन पर दबाव डाल रही हैं, लेकिन भारत भी इन नीतियों का लाभ उठाने के बजाय अपने दीर्घकालिक हित सुरक्षित करना चाहता है (Bown, 2022)।
राजनीतिक दृष्टि
राजनीतिक दृष्टि से भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक वैश्विक शासन व्यवस्था तक फैली है।
- भारत का दृष्टिकोण: भारत द्विपक्षीय दृष्टिकोण से आगे बढ़कर “Multi-alignment” की नीति अपनाता है, जिसमें वह विभिन्न शक्तियों के साथ समानांतर साझेदारी रखता है।
- चीन का दृष्टिकोण: चीन, संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत के प्रस्तावों को रोकने का प्रयास करता है, जैसे NSG सदस्यता और आतंकवाद के मुद्दे पर।
- रणनीतिक जोखिम: केवल द्विपक्षीय प्रतिस्पर्धा पर ध्यान देने से भारत व्यापक रणनीतिक परिदृश्य को नज़रअंदाज़ कर सकता है, जिससे नीति-निर्माण में असंतुलन आ सकता है।
आगे का रास्ता
- भारत को केवल द्विपक्षीय दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक दृष्टिकोण से चीन को देखना आवश्यक है।
- भारत को सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत की जा सके।
निष्कर्ष
इन सभी स्तरों पर, भारत-चीन संबंध प्रतिस्पर्धा, सहयोग और रणनीतिक प्रबंधन के मिश्रण पर आधारित हैं। भारत को अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक और क्षेत्रीय मंचों पर लचीलापन बनाए रखना होगा, ताकि वह न तो पश्चिम के पूरी तरह प्रभाव में आए और न ही चीन के विस्तारवाद से दबाव में रहे।
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