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भारत में निर्वाचन सुधार

अतीत से वर्तमान तक

निर्वाचन सुधार क्या हैं? भारत में कौन-कौन से निर्वाचन सुधार किए गए हैं?

निर्वाचन सुधार से आशय निर्वाचन प्रणाली में ऐसे सुधारों से है, जिनका उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी और समावेशी चुनाव सुनिश्चित करना होता है। ये सुधार वर्तमान निर्वाचन प्रक्रिया में विद्यमान चुनौतियों और कमियों को दूर करने के लिए किए जाते हैं।

निर्वाचन सुधारों का उद्देश्य स्वच्छ राजनीति, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव तथा आदर्श जनप्रतिनिधियों को बढ़ावा देना है।

भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही निर्वाचन सुधार किए जाते रहे हैं। हालांकि, इन सुधारों को निम्नलिखित समयावधियों के अंतर्गत विभाजित किया जा सकता है:

1- 1996 से पूर्व के महत्वपूर्ण चुनाव सुधार:

 

2- दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशों पर 1996 में किए गए प्रमुख निर्वाचन सुधार:

 

3- 1996 के बाद के प्रमुख निर्वाचन सुधार और मुख्यतः 2003 में किए गए निर्वाचन सुधार:

 

4– 2004-10 के दौरान किए गए निर्वाचन सुधार:

 

5- 2013 में किए गए निर्वाचन सुधार:

 

6- 2013 के बाद किए गए निर्वाचन सुधार:

 

निर्वाचन सुधारों के उद्देश्य क्या हैं?

  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना (अनुच्छेद 324):निर्वाचन सुधारों का उद्देश्य चुनावी कदाचारों की समस्याओं का समाधान करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से संपन्न हों।
  • मतदाता सहभागिता को बढ़ाना:निर्वाचन सुधारों का उद्देश्य मतदाता मतदान प्रतिशत में वृद्धि करना तथा मतदाता उदासीनता, मतदान केंद्रों तक पहुँचने में कठिनाई आदि समस्याओं का समाधान करना है।
  • धनबल एवं बाहुबल के प्रभाव को कम करना:निर्वाचन सुधार चुनावी वित्तपोषण को विनियमित करके तथा मतदाताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करके धनबल एवं बाहुबल के प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं।
  • पारदर्शिता एवं जवाबदेही को प्रोत्साहित करना:निर्वाचन सुधारों के अंतर्गत उम्मीदवारों द्वारा आपराधिक अभिलेखों के अनिवार्य प्रकटीकरण तथा चुनावी प्रक्रिया की निगरानी हेतु प्रौद्योगिकी के उपयोग जैसे उपाय शामिल किए जाते हैं। इस प्रकार ये भारत में चुनावों की पारदर्शिता एवं जवाबदेही को सुदृढ़ करते हैं।
  • चुनावी असमानताओं का समाधान करना:निर्वाचन सुधारों का उद्देश्य महिलाओं तथा वंचित समुदायों के अल्प-प्रतिनिधित्व जैसी असमानताओं को कम करना है।

निष्कर्ष :

भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए निर्वाचन सुधार अत्यंत आवश्यक हैं। भविष्य के सुधारों से संबंधित निरंतर चर्चाओं और प्रस्तावों का केंद्र निम्नलिखित विषयों पर होना चाहिए— निर्वाचन वित्तपोषण में पारदर्शिता, आपराधिक आरोपों वाले प्रत्याशियों के लिए अधिक कठोर अयोग्यता मानदंड, भारत निर्वाचन आयोग को अधिक सशक्त अधिकार प्रदान करना, तथा वास्तविक मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किए बिना निर्वाचक नामावलियों की सुगमता और शुद्धता सुनिश्चित करना।


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