भारत का संघवाद केवल एक संवैधानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि यह विविधताओं से भरे इस देश की एक जीवंत धरा है। यहां संघवाद का अर्थ मात्र केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा नहीं, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और भौगोलिक विशिष्टताओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एकता बनाए रखने का संतुलन है।
भारतीय संघवाद की पहचान
- ‘राज्यों का संघ’: संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया है, जो अमेरिकी मॉडल से अलग है। भारतीय राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं है, जिससे संघ की अविनाशीयता सिद्ध होती है।
- अर्ध–संघीय स्वरूप: के.सी. व्हीयरे के अनुसार, भारत में संघीय और एकात्मक दोनों तत्व मौजूद हैं। यही मिश्रण इसे विशिष्ट बनाता है।
- लचीला लेकिन मजबूत केन्द्र: आपातकालीन प्रावधानों, अवशिष्ट शक्तियों और समवर्ती सूची के विषयों पर नियंत्रण से केन्द्र की भूमिका सशक्त बनी रहती है।
संघीय और एकात्मक विशेषताओं का संगम
संघीय तत्व
- द्विस्तरीय शासन व्यवस्था – केन्द्र और राज्य सरकारें।
- लिखित और सर्वोच्च संविधान।
- शक्तियों का स्पष्ट विभाजन (संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची)।
- स्वतंत्र न्यायपालिका जो संघ-राज्य विवादों का निपटारा करती है।
एकात्मक तत्व
- संसद का अधिकार राज्यों की सीमाओं और नामों में परिवर्तन करने का।
- राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व।
- एकीकृत न्यायपालिका और नागरिकता।
- आपातकाल के दौरान संघीय ढांचे का अस्थायी एकात्मक रूप में बदल जाना।
संघीय प्रणाली की विशेषताएं
- सरकार के विभिन्न स्तर:संघवाद, अपनी परिभाषा के अनुसार, अपने परिभाषित क्षेत्र के अंदर विभिन्न स्तरों की सरकार की कार्यपद्धति की आवश्यकता रखता है।
- शक्ति का विभाजन:सत्ता को संस्थाओं के बीच विषयों के विभाजन द्वारा विभाजित किया जाता है ताकि संघर्ष की संभावना कम से कम हो जाए।
- लिखित संविधान:यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता के संबंधित विभाजन में स्पष्टता हो। फिर से, एक कठोर संविधान यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता का यह विभाजन आसानी से बाधित न हो।
- स्वतंत्र न्यायपालिका:यह सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच विवाद समाधान तंत्र के रूप में कार्य करती है।
- राज्य और केंद्र सरकार की परस्पर निर्भरता: भारत ने जानबूझकर संघवाद का एक ऐसा संस्करण अपनाया, जिसने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को एक-दूसरे पर निर्भर बना दिया (बाद में पहले की तुलना में अधिक)। इस प्रकार संघीय संविधान की मूल विशेषता का उल्लंघन किया गया, अर्थात संघ और राज्य सरकारों के लिए अधिकार के स्वायत्त क्षेत्र।
- संघवाद को एक साथ रखना: भारत का केंद्रीकृत संघीय ढांचा ‘एक साथ आने’ की प्रक्रिया से चिह्नित नहीं था, बल्कि ‘एक साथ रखने’ और ‘एक साथ रखने’ का परिणाम था।
- अविनाशी एवं लचीलापन: बी.आर. अंबेडकर ने भारत के संघ को संघ कहा था क्योंकि यह अविनाशी था, यही कारण है कि संविधान में संघवाद से संबंधित शब्द नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का संविधान आवश्यकता के आधार पर संघीय और एकात्मक होने के लिए अपेक्षित लचीलापन रखता है।
असममित संघवाद: विविधता का सम्मान
भारत में असममित संघवाद राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पहचान देता है:
- संवैधानिक असममता: अनुच्छेद 370 (पूर्व विशेष दर्जा — जम्मू-कश्मीर), अनुच्छेद 371 श्रृंखला (नागालैंड, मिजोरम, गोवा, आदि)।
- प्रशासनिक विविधता: दिल्ली और पुडुचेरी की अपनी विधानसभाएं; चंडीगढ़ जैसे प्रदेश सीधे केन्द्र द्वारा शासित।
- अनुसूचियां: पांचवीं और छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों की विशेष प्रशासनिक व्यवस्था करती हैं।
सहकारी और सौदेबाजी वाला संघवाद
भारत का संघवाद टकराव की बजाय सहयोग को प्राथमिकता देता है:
- नीति आयोग – राज्यों की भागीदारी के साथ नीति-निर्माण।
- जीएसटी परिषद – कर नीतियों में सामंजस्य।
- अंतर–राज्य परिषद – केन्द्र-राज्य समन्वय मंच।
- क्षेत्रीय परिषदें – क्षेत्रीय विकास योजनाओं के लिए।
मॉरिस जोन्स के अनुसार, यह ‘सौदेबाजी का संघवाद’ है, जबकि ग्रेनविले ऑस्टिन ने इसे ‘सहकारी संघवाद’ कहा।
बढ़ते संघीय मतभेदों के बारे में
- सार्वजनिक व्यय पर निर्भरता: 1991 से जारी आर्थिक सुधारों के कारण निवेश पर विभिन्न नियंत्रणों में ढील दी गई है, जिससे राज्यों को कुछ गुंजाइश मिली है।
- लेकिन सार्वजनिक व्यय नीतियों के बारे में स्वायत्तता पूर्ण नहीं है क्योंकि राज्य सरकारें अपनी राजस्व प्राप्तियों के लिए केंद्र पर निर्भर हैं। केंद्र और राज्यों के बीच यह समीकरण हाल के दिनों में उनके बीच टकराव का कारण बना है, जिससे बातचीत के लिए बहुत कम गुंजाइश बची है।
- अन्य: संसाधन साझाकरण से जुड़े मुद्दों के अलावा, ऐसे अन्य क्षेत्र भी हैं जो संघर्ष के स्थल के रूप में उभरे हैं। इनमें सम्मिलित हैं:
- सामाजिक क्षेत्र की नीतियों का समरूपीकरण,
- नियामक संस्थाओं का कार्यपद्धति और
- केंद्रीय एजेंसियों की शक्तियाँ।
- केंद्र का बढ़ता प्रभाव: आदर्श रूप से इन क्षेत्रों में नीतियों का बड़ा भाग राज्यों के विवेक पर होना चाहिए, जिसमें एक शीर्ष केंद्रीय निकाय संसाधन आवंटन की प्रक्रिया की देखरेख करे।
- हालांकि, शीर्ष निकायों ने प्रायः अपना प्रभाव बढ़ाने और राज्यों को उन दिशाओं में धकेलने का प्रयास किया है जो केंद्र के अनुकूल हों।
संघ के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
- क्षेत्रवाद (Regionalism):भाषाई, जातीय, धार्मिक या सांस्कृतिक पहचानपर आधारित क्षेत्रीय दलों और आंदोलनों के उदय ने भारत की राष्ट्रीय अखंडता एवं एकता के लिये चुनौती पेश की है।
- कुछ क्षेत्रों या समूहों नेअधिक स्वायत्तता, विशेष दर्जा या यहाँ तक कि भारतीय संघ से अलग होने की मांग की है।
- उदाहरण के लियेपश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड की मांग आदि।
- शक्तियों का विभाजन (Division of Powers): केंद्र और राज्यों के बीचशक्तियों का विभाजन स्पष्ट और संतुलित नहीं है। केंद्र के पास राज्यों की तुलना में अधिक शक्तियाँ एवं संसाधन हैं और वहराष्ट्रपति शासन, राज्यपाल की भूमिका, केंद्रीय कानून आदि विभिन्न माध्यमों से उनके मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है। राज्यों के पास अपने स्वयं के विकास और कल्याण नीतियों को आगे बढ़ाने के लिये सीमित स्वायत्तता एवं वित्तीय अवसर मौजूद हैं।
- उदाहरण के लिये, वर्ष2016 में संवैधानिक उल्लंघन के आधार पर केंद्र द्वारा अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था, लेकिन बाद में इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया।
- राजकोषीय संघवाद का अभाव (Absence of Fiscal Federalism): केंद्र और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंध न्यायसंगत एवं पारदर्शी नहीं हैं।अधिकांश करों का संग्रह केंद्र द्वारा किया जाता है और वह अपने विवेक या कुछ मानदंडों के अनुसार राज्यों को इसका वितरण करता है। राज्य सहायता अनुदान, ऋण और अन्य हस्तांतरण के लिये केंद्र पर निर्भर होते हैं। राज्यों के पास कराधान शक्तियाँ और उधार लेने की क्षमताएँ सीमित होती हैं।
- उदाहरण के लिये, कई राज्यों ने जीएसटी कार्यान्वयन के कारण हुए राजस्व घाटे के लिये अपर्याप्त मुआवजे के संबंध में शिकायत की है।
- इकाइयों का असमान प्रतिनिधित्व (Unequal Representation of Units): संसद और अन्य संघीय संस्थानों में राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या, क्षेत्र या योगदान के अनुपात में नहीं है। कुछ राज्यों के अति प्रतिनिधित्व तो अन्य राज्यों के अल्प प्रतिनिधित्व की समस्या उत्पन्न हुई है।
- उदाहरण के लिये, उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीट हैं जबकि सिक्किम में केवल एक लोकसभा सीटहै। यह राष्ट्रीय निर्णयन और संसाधन आवंटन में विभिन्न राज्यों की आवाज़ और असर को प्रभावित करता है।
- केंद्रीकृत संशोधन शक्ति (Centralized Amendment Power): संविधान में संशोधन करने की शक्ति विशेष बहुमत वाली संसद में निहित है। राज्यों को प्रभावित करने वाले कुछ मामलों को छोड़कर संशोधन प्रक्रिया में राज्यों की कोई भूमिका या मत नहीं है।
- उदाहरण के लिये, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने का केंद्र का निर्णय राज्य सरकार या अन्य हितधारकों से किसी परामर्श के बिना किया गया था। आंध्र प्रदेश राज्य से तेलंगाना राज्य के निर्माण का आंध्र प्रदेश ने विरोध किया था और इसके परिणामस्वरूप प्रदर्शन एवं हिंसा की घटनाएँ हुईं।
कौन–सी संस्थाएँ संघवाद को बढ़ावा दे रही हैं?
सर्वोच्च न्यायालय: यह देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और संविधान के संरक्षक एवं व्याख्याकार के रूप में कार्य करती है। इसके पास केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपसी विवादों पर निर्णय लेने की शक्ति है।
अंतर्राज्यीय परिषद्: यह सामान्य हित एवं चिंता के मामलों पर केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय एवं सहयोग को बढ़ावा देने के लिये संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है। इसमें प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित छह केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।
वित्त आयोग: यह केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण की अनुशंसा करने के लिये संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है। यह राज्यों के संसाधनों को बढ़ाने और ज़रूरतमंद राज्यों को सहायता अनुदान देने के उपाय भी सुझाता है।
नीति आयोग: इसकी स्थापना वर्ष 2015 में योजना आयोग (Planning Commission) के स्थान पर की गई थी। यह आर्थिक और सामाजिक विकास के मामलों पर केंद्र और राज्यों के लिये एक थिंक टैंक एवं सलाहकार निकाय के रूप में कार्य करता है।
यह नीति निर्माण और कार्यान्वयन में राज्यों को शामिल करके सहकारी संघवाद को भी बढ़ावा देता है। इसमें एक अध्यक्ष (प्रधानमंत्री), एक उपाध्यक्ष, एक कार्यकारी अधिकारी/सीईओ, पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य, पदेन सदस्य (सभी राज्यों के मुख्यमंत्री एवं केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल) और विशेष आमंत्रित सदस्य शामिल होते हैं।
आगे की ओर कदम
- वित्तीय विकेंद्रीकरण को और सुदृढ़ करना चाहिए।
- अंतर-सरकारी संस्थाओं को अधिक अधिकार और प्रभावशीलता देना चाहिए।
- क्षेत्रीय असमानताओं को पाटने के लिए लक्षित योजनाएं चाहिए।
भारत का संघवाद अपनी लचीली लेकिन मजबूत संरचना, विविधताओं के सम्मान और राष्ट्रीय एकता के संकल्प के कारण अद्वितीय है। यह व्यवस्था न केवल संवैधानिक प्रावधानों का परिणाम है, बल्कि यह भारतीय समाज की गहरी बहुलतावादी परंपरा और सहअस्तित्व की संस्कृति का प्रतिबिंब भी है।
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