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परिधीय पूँजीवाद की संरचना (Peripheral Capitalism) – हम्ज़ा अलवी

1. प्रस्तावना

हम्ज़ा अलवी (1921–2003) पाकिस्तान के समाजशास्त्री औरराजनीतिक अर्थशास्त्री थे। उनका मुख्य सवाल था क्योंएशियाअफ्रीका जैसे देशों में पूँजीवाद (Capitalism) वैसा नहींदिखता जैसा यूरोप में?
यूरोप में पूँजीवाद ने धीरेधीरे सामंती व्यवस्था को तोड़कर उद्योग, पूँजीपति और मज़दूर वर्ग को मज़बूत किया। लेकिन औपनिवेशिकदेशों में कहानी अलग रही।
अलवी का कहना था कि इन समाजों में पूँजीवाद तो शुद्ध (pure) है और ही पूरा (complete) यह अधूरा और निर्भर पूँजीवादहै, जिसकी संरचना औपनिवेशिक इतिहास, विदेशी पूँजी औरस्थानीय समाज  तीनों मिलकर बनाते हैं।

2. परिधीय पूँजीवाद (Peripheral Capitalism) क्या है?

यह पूँजीवादकेंद्र (core) में नहीं बल्किकिनारे (periphery) परहै।
ये देश अपनी तकनीक, उद्योग और बाज़ार के लिए यूरोपअमेरिकापर निर्भर हैं।
यहाँ विकास असमान (uneven) है  कहीं आधुनिक फैक्टरी औरबैंक, तो कहीं परंपरागत गाँव और सामंती खेती।
पूँजीवाद टुकड़ोंटुकड़ों में आगे बढ़ता है, एकसमान नहीं। उदाहरण: भारत, पाकिस्तान, मिस्र, नाइजीरिया, लैटिन अमेरिका आदि।

3. औपनिवेशिक विरासत

अलवी मानते हैं कि इन देशों की मौजूदा संरचना औपनिवेशिक राजकी देन है। औपनिवेशिक शासकों का मकसद विकास नहीं, शोषणथा।
उन्होंने यहाँ उद्योग नहीं, बल्कि कच्चा माल निकालने वालीअर्थव्यवस्था बनाई।
खेती को निर्यातमुखी (cash crops) बनाया जैसे कपास, जूट, गन्ना।

परिणाम

स्थानीय पूँजीपति बहुत कमजोर रहे।
मज़दूर वर्ग छोटा और बिखरा रहा।
राज्य (government) सिर्फ़ औपनिवेशिक हितों की रक्षा का औज़ाररहा।

4. परिधीय पूँजीवाद की संरचना

आर्थिक ढाँचा

Dual Economy (द्वैध अर्थव्यवस्था)आधुनिक उद्योग औरपारंपरिक कृषि दोनों साथसाथ।
निर्भर पूँजीवादविदेशी तकनीक, विदेशी बाज़ार और विदेशीनिवेश पर भारी निर्भरता।
असमान विकासशहर और गाँव के बीच गहरी खाई कुछ इलाक़ेतेज़ी से बढ़ते हैं तो कुछ बहुत पीछे रह जाते हैं।

वर्ग संरचना

जमींदार वर्गऔपनिवेशिक समय से ताक़तवर, ग्रामीण राजनीतिपर हावी।
कमज़ोर पूँजीपति वर्गस्थानीय पूँजीपति विदेशी पूँजी पर निर्भर।
मज़दूर वर्गआकार में छोटा, संगठित नहीं।
किसान वर्गबहुसंख्यक लेकिन राजनीतिक रूप से बिखरा औरदबा हुआ।

राज्य (State) की भूमिका

यूरोप में राज्य ज़्यादातर पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधि था।
लेकिन यहाँ राज्य बहुत मज़बूत होता है, क्योंकि कोई भी वर्ग(पूँजीपति, किसान, मजदूर) इतना ताक़तवर नहीं कि राज्य पर पूरानियंत्रण कर ले।
राज्य खुद संतुलन बनाने वाला बनता है।
लेकिन असल में यह विदेशी पूँजी और वैश्विक पूँजीवाद के साथजुड़ा रहता है।

5. Overdeveloped State (अलवी का मुख्य विचार)

हम्ज़ा अलवी का सबसे मशहूर कॉन्सेप्ट है “Overdeveloped State” (अधिक विकसित राज्य)
औपनिवेशिक शासन ने बहुत मज़बूत प्रशासन, सेना और नौकरशाहीछोड़ी।
स्वतंत्रता के बाद भी यह ढाँचा जस का तस रहा।
क्योंकि कोई भी वर्ग इतना ताक़तवर नहीं कि राज्य पर पूरी तरहकब्ज़ा कर ले।
इसलिए राज्य अपेक्षाकृत स्वतंत्र होकर चलता है।
लेकिन असल में इसकी नीतियाँ विदेशी पूँजी और वैश्विक पूँजीवादसे जुड़ी रहती हैं।
यानी राज्य दिखने में मज़बूत और स्वतंत्र है, पर असल में वह “बाहरीपूँजी” का साथी है।

6. विकासशील समाजों की समस्याएँ

1. अधूरा औद्योगीकरणउद्योग छोटेछोटे, ज़्यादातर उपभोक्तावस्तुओं तक सीमित, भारी उद्योग विदेशी तकनीक पर निर्भर।
2. कृषि संकटजमींदारों का दबदबा, किसान शोषित, उत्पादकताकम।
3. राज्य पर निर्भरताकोई भी बड़ा सुधार या बदलाव राज्य के बिनासंभव नहीं।
4. सामाजिक असमानताशहरगाँव, अमीरग़रीब, और इलाकों केबीच गहरी खाई।

7. आलोचनाएँ

अलवी ने ज़्यादा ध्यान संरचना (structure) पर दिया, लेकिन लोगोंकी राजनीतिक भूमिका (agency) पर कम।
जाति, धर्म और स्थानीय राजनीति जैसे आंतरिक तत्वों को उन्होंनेउतना महत्व नहीं दिया।
फिर भी उनका विश्लेषण हमें यह समझाता है कि ग्लोबल साउथ कापूँजीवाद यूरोप जैसा क्यों नहीं है।

8. महत्व और प्रासंगिकता

आज भी हम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में वहीसमस्याएँ देखते हैं विदेशी कंपनियों पर निर्भरता, असमानविकास, राजनीतिक अस्थिरता।
अलवी का सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि इनसमस्याओं की जड़ें कहाँ हैं।
खासकर Overdeveloped State” की थ्योरी विकासशील देशोंकी राजनीति को समझने में बहुत अहम है।


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