in , ,

भारत में नागरिक एवम राजनीतिक समाज : पार्थ चटर्जी के विशेष सन्दर्भ में

चटर्जी मुख्य तौर पर यह देखने का प्रयास करते है कि, उपनिवेश-काल के बाद (post-colonial) समाजों में विशेष रूप से भारत जैसे देशों में नागरिक समाज (civil society) और राजनीतिक समाज (political society) किस प्रकार उत्पन्न हुए, और वे किस प्रकार पश्चिमी आधुनिकता के मॉडल से अलग-अलग तरीके से विकसित हुए हैं।

पार्थ चटर्जी कहते हैं कि भारत की राजनीति दो हिस्सों में बँटी है —

1. नागरिक समाज (Civil Society)
2. राजनीतिक समाज (Political Society)

नागरिक समाज (Civil Society)

चटर्जी के अनुसार, “नागरिक समाज” (Civil Society) का मतलब होता है ऐसे संगठनों या समूहों का समाज जहाँ लोग अपनी इच्छा से शामिल हो सकते हैं या बाहर जा सकते हैं। इन संगठनों में सबको बोलने, निर्णय लेने और अपने विचार रखने का अधिकार होता है। हर सदस्य के कुछ अधिकार और कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। जैसे – क्लब, संघ, संगठन, यूनियन आदि।मुख्य रूप से नागरिक समाज में वे लोग आते हैं जो कानून और नियमों के अनुसार काम करते हैं। यह समाज पश्चिमी देशों के पूँजीवादी लोकतंत्र (capitalist democracy) की तरह बना है जहाँ शिक्षित, अमीर और मध्यम वर्ग के लोग शामिल होते हैं।उन्होंने यह भी दिखाया कि “नागरिक समाज” (Civil Society) की एक सीमा होती है वह सिर्फ पढ़े-लिखे और अमीर लोगों की बात करता है, जबकि गरीब तबकों की असली ज़िंदगी और उनकी राजनीति को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।
नागरिक समाज की उत्पत्ति के सन्दर्भ चटर्जी यह बताते है कि ये संस्थाएँ सबसे पहले पश्चिमी देशों में बनीं, जहाँ लोग स्वतंत्र रूप से सोच सकते थे और सरकार से अलग होकर समाज के मुद्दों पर बात कर सकते थे। लेकिन भारत जैसे देशों में, जो लंबे समय तक अंग्रेज़ों के शासन में रहे (यानि उपनिवेश रहे), वैसा नागरिक समाज पूरी तरह नहीं बन पाया। यह विचार (Concept) केवल कुछ हिस्सों में ही विकसित हुआ। ज़्यादातर सामाजिक संगठन पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे जैसे जाति, धर्म या परिवार के आधार पर बने समूह।
इसलिए, भारत का नागरिक समाज पश्चिमी देशों के मॉडल जैसा नहीं था। यहाँ के समाज और संगठनों की बनावट और सोच अलग थी, जो हमारी ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ी हुई थी।

राजनीतिक समाज

राजनीतिक समाज” का विचार भारतीय समाजशास्त्री पार्थ चटर्जी ने दिया। इस विचार के ज़रिए उन्होंने बताया कि गरीब और अधिकारों से वंचित लोग, जो बहुत कम आमदनी में अपना जीवन चलाते हैं,उनका भी अपना जीवन-संघर्ष और राजनीति करने का तरीका होता है। चटर्जी का कहना है कि आज़ादी के बाद समाज में एक नई तरह की परत बनी, जिसे वे राजनीतिक समाज (Political Society) कहते हैं। वह राजनीतिक समाज को नागरिक समाज (civil society) और राज्य  इन दोनों के बीच का स्थान बताते है।
राजनीतिक समाज को ऐसा क्षेत्र बताते है जहाँ आम लोग (जनसंख्या) और सरकार के बीच का रिश्ता बनता है। यह रिश्ता कई तरीकों से बनता है जैसे आंदोलनों, राजनीतिक दलों की गतिविधियों, धरनों, वोट की राजनीति, या लोगों की सामूहिक माँगों के ज़रिए। जिसमे मुख्य अंतर नागरिक समाज जैसा सधा हुआ और नियमों वाला नहीं होता। यहाँ अक्सर ऐसे लोग होते हैं जो कानून या नियमों का थोड़ा उल्लंघन भी कर लेते हैं, बिना किसी औपचारिक अनुमति के अपनी ज़रूरतें जताते हैं, इसके साथ ही सरकार से सीधेरोज़मर्रा की ज़रूरतों जैसे घर, पानी, बिजली, राशन, नौकरी आदि के लिए मदद माँगते हैं।
राजनीतिक समाज के लोग अधिकतर गरीब या हाशिये पर रहने वाले वर्गों से होते हैं, जो “कानूनी नागरिक अधिकारों” की बजाय “जीविका और कल्याण” (welfare) के लिए राजनीति में हिस्सा लेते हैं।
पार्थ चटर्जी कहते हैं कि “राजनीतिक समाज” के ज़रिए हम भारतीय राज्य (Government) के बदले हुए रूप को समझ सकते हैं। उनके अनुसार, इस समाज में वे लोग आते हैं जैसे रिक्शा चालक, ठेला लगाने वाले, फेरी वाले, गाँव और शहर के गरीब लोग जो बहुत मेहनत से ज़िंदगी चलाते हैं। हालाँकि ये लोग भारत के संविधान के अनुसार नागरिक हैं, लेकिन सरकार इन्हें पूरी तरह अधिकार-युक्त नागरिक की तरह नहीं मानती। सरकार इनसे उसी तरह व्यवहार नहीं करती जैसे वह अमीर या शिक्षित नागरिकों से करती है। भले ही ये लोग भारत में पैदा हुए हैं और उन्हें संविधान के अनुसार नागरिकतामिली है, लेकिन सरकार की नज़र में उनकी रिहाइश जहाँ वे रहते हैंऔर रोज़गार उनका काम अक्सर कानूनी नहीं माने जाते।
इस वजह से उन्हें नागरिक समाज (civil society) का हिस्सा बनने का पूरा मौका नहीं मिल पाता उन्हें वैसे अधिकार और मान्यता नहीं मिलती जैसे अमीर या शिक्षित लोगों को मिलती है।
पार्थ चटर्जी कहते हैं कि नागरिक समाज (civil society) पर शहरी मध्यम वर्ग का नियंत्रण है, और इस वर्ग की सोच पर बड़ी कंपनियों (कॉरपोरेट पूंजी) का असर होता है। जबकि राजनीतिक समाज उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो इन बड़ी कंपनियों से जुड़े नहीं हैं छोटे व्यापारी, मजदूर और गरीब तबके। राजनीतिक समाज ही भारत को सिर्फ पश्चिमी देशों के लोकतंत्र की नकल बनने से बचाता है। गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग अपनी अलग तरह की राजनीति करके भारत की लोकतांत्रिक विविधता को बनाये रखते हैं।

क्रमांक

विषय

नागरिक समाज (Civil Society)

राजनीतिक समाज (Political Society)

1

अर्थ

ऐसे संगठनों या समूहों का समाज जहाँ लोग अपनी इच्छा से जुड़ते हैं, नियमों और अधिकारों के आधार पर काम होता है।

यह वह क्षेत्र है जहाँ आम जनता और राज्य के बीच संबंध बनते हैं जैसे आंदोलन, धरना, वोट या कल्याण की माँगों के माध्यम से।

2

आधार (Foundation)

आधुनिकता (Modernity), समानता, स्वतंत्रता, चर्चा और नियमों पर आधारित।

जनकल्याण (Welfare), ज़रूरतें, माँगें और राजनीति पर आधारित।

3

कौन लोग शामिल होते हैं

शिक्षित, मध्यम या उच्च वर्ग के लोग जो कानून और संस्थाओं के ज़रिए अपने अधिकार जताते हैं।

गरीब, दलित, आदिवासी, झुग्गी-बस्ती के लोग जो सीधे राज्य से मदद या सुविधाएँ माँगते हैं।

4

कार्य करने का तरीका

नियमबद्ध (Organized), औपचारिक (Formal), कानूनी दायरे में।

अनौपचारिक (Informal), कई बार नियमों को तोड़कर या दबाव बनाकर।

5

मुख्य लक्ष्य

नागरिक अधिकारों की रक्षा और विचार-विमर्श के ज़रिए नीति बनाना।

रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी कराना — जैसे घर, पानी, बिजली, राशन आदि।

6

राज्य से संबंध

राज्य से संवाद और संस्थागत (official) बातचीत के ज़रिए जुड़ा।

राज्य पर दबाव डालकर, आंदोलन या जनसहभागिता से जुड़ा।

7

लोकतंत्र में भूमिका

लोकतंत्र के “औपचारिक” हिस्से को मजबूत करता है (जैसे चुनाव, संगठन, कानून)।

लोकतंत्र के “जनसहभागी” हिस्से को जीवित रखता है (जैसे आवाज उठाना, धरना, आंदोलन)।

8

सीमा

समाज के केवल एक हिस्से तक सीमित आम जनता या गरीब वर्ग इसमें पूरी तरह शामिल नहीं हो पाता।

कई बार नियमों या कानूनों के बाहर काम करता है, इसलिए “अवैध” या “अव्यवस्थित” माना जाता है।

भारत में नागरिक समाज (Civil Society in India)

भारत का नागरिक समाज कई तरह के संगठनों से बना है, जोसामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर काम करते हैं। इनमें धर्म आधारित समूह, सदस्यता वाले संगठन, थिंक टैंक और सामाजिक आंदोलन शामिल हैं।

मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं

1. सामुदायिक संगठन (Community-Based Organizations – CBOs)
यह स्वयंसेवी और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले संगठन होते हैं।
ये गांव और शहर दोनों जगह सक्रिय रहते हैं और स्थानीय जरूरतोंको पूरा करते हैं।
उदाहरण: रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (Resident Welfare Associations)
2. गैर-सरकारी संगठन (Non-Governmental Organisations – NGOs)
पेशेवर, लाभ-रहित और स्वतंत्र संगठन होते हैं।
ये स्वच्छता, आवास, महिला सशक्तिकरण, मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याओं पर काम करते हैं।
यह संस्थाए स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करती है
उदाहरण: कई महिला और स्वास्थ्य (focused NGO)
3. धार्मिक और विश्वास आधारित संगठन (Religious and Faith-Based Organisations)
यह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सामाजिक सेवा में काम करते हैं।
उदाहरण: रामकृष्ण मिशन, यूनानी क्लिनिक
4. सदस्यता संगठन (Membership Associations)
ये अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करते हैं।
उदाहरण: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, विभिन्न क्लब और ट्रेड यूनियन
5. थिंक टैंक (Think Tanks)
ये सामाजिक विकास अर्थव्यवस्था और विदेश नीति जैसे विषयों पर अनुसंधान करते हैं।
उदाहरण: Observer Research Foundation
6. सामाजिक आंदोलन (Social Movements)
यह नागरिकों द्वारा शुरू किए गए आंदोलन हैं, जो भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा आदि मुद्दों पर जागरूकता फैलाते हैं।
उदाहरण: अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
7. युवा और छात्र संगठन (Youth and Student Organizations)
ये युवाओं और छात्रों के कल्याण के लिए काम करते हैं।
उदाहरण: नेशनल कैडेट कोर (NCC), छात्र संघ


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

वैश्वीकरण से संबंधित तीन विचारधाराएं

गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement-NAM)