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भारतीय संसदीय संप्रभुता और वैश्विक तुलना

संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty) एक ऐसी संवैधानिक अवधारणा है जिसके अनुसार संसद को सर्वोच्च विधायी शक्ति प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है कि संसद कानून बना सकती है, उसमें संशोधन कर सकती है या उसे निरस्त भी कर सकती है, बिना किसी बाहरी संस्था के हस्तक्षेप के। यह सिद्धांत लोकतंत्र की आधारशिला माना जाता है क्योंकि यह निर्वाचित प्रतिनिधियों को विधायी प्रक्रिया में पूर्ण अधिकार प्रदान करता है। लेकिन संसदीय संप्रभुता की यह अवधारणा प्रत्येक देश में एक समान नहीं होती; इसके स्वरूप और सीमाएं देश के संवैधानिक ढांचे एवं न्यायिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करती हैं।

भारतीय संसदीय संप्रभुता के अर्थ और महत्व:

भारत में संसदीय संप्रभुता का अर्थ ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता मॉडल से भिन्न है। भारत एक लिखित संविधान वाला देश है, जिसमें संसद के विधायी अधिकार संविधान के निर्धारित दायरे के भीतर सीमित हैं। भारतीय संसद संविधान द्वारा स्थापित अनुच्छेद 245 और 246 के अंतर्गत संघीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर विधायी अधिकार रखती है। संसदीय संप्रभुता का यह अर्थ विधायिका को अधिकृत शक्ति देने के साथ-साथ उसे संविधान, मौलिक अधिकारों और संघीय ढांचे की मर्यादाओं के तहत बाँधता भी है। भारत में संसदीय संप्रभुता के ये सीमित स्वरूप लोकतंत्र में बहुसंख्यकवादी तानाशाही को रोकता है और न्यायपालिका को संसद के निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार देता है, जो लोकतांत्रिक संतुलन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत की संविधान सभा में संसदीय संप्रभुता पर बहस:

भारतीय संविधान सभा में संसदीय संप्रभुता को लेकर महत्वपूर्ण और गहन बहस हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1946-1950 के बीच संविधान की रचना का कार्य चल रहा था। बहस का केन्द्र इस बात पर था कि क्या संसदीय संप्रभुता को ब्रिटिश मॉडल के समान पूर्ण रूप से अपनाया जाए या फिर इसे संविधान के सर्वोच्च प्राधिकार, मौलिक अधिकारों की रक्षा और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांतों के तहत सीमित किया जाए। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से संसदीय संप्रभुता की सीमा तय करते हुए कहा कि संसद संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकती और मौलिक अधिकारों का संरक्षण सर्वोपरि है। फिर भी नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू ने संसदीय ताकत की वकालत की, ताकि संसद प्रभावी शासन कर सके। विपक्षी सदस्यों ने संसदीय शक्तियों की असीमता को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। इस बहस का नतीजा ‘मूल संरचना सिद्धांत’ के रूप में सामने आया, जिसके तहत संसद संविधान के मूल ढांचे को नहीं तोड़ सकती। इस प्रकार भारतीय संसदीय संप्रभुता को संवैधानिक सर्वोच्चता के साथ संतुलित कर दिया गया।

ब्रिटिश संसदीय संप्रभुता से तुलना:

ब्रिटेन में संसदीय संप्रभुता का मतलब है संसद के सभी विधायी कामकाज में पूर्ण स्वतंत्रता। ब्रिटिश संसद के कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं होते क्योंकि वहाँ कोई लिखित संविधान नहीं है। ब्रिटिश संसद कानूनों का निर्माण, संशोधन या निरस्तीकरण कर सकती है और उसकी कोई न्यायिक समीक्षा नहीं होती। इसके विपरीत, भारत ने अपने संविधान के तहत संसदीय संप्रभुता को सीमित किया है ताकि संविधान की आधारशिला, मौलिक अधिकार और न्यायपालिका की भूमिका बनी रहे। भारतीय संसद के कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है यदि वे संविधान का उल्लंघन करते हों, जो ब्रिटिश मॉडल से एक मूलभूत अंतर है। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि ब्रिटेन की पूर्ण संसदीय संप्रभुता के मुकाबले भारत की संसदीय संप्रभुता संवैधानिक सर्वोच्चता के अधीन है।

भारतीय संसदीय संप्रभुता के संवैधानिक ढांचे और न्यायिक समीक्षा:

भारतीय संसदीय संप्रभुता संविधान के अनुच्छेद 245 और 246 के अनुरूप काम करती है। अनुच्छेद 245 संसद को देश या उसके हिस्से में कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन संसद केवल संविधान में निर्दिष्ट विषयों पर ही कानून बना सकती है। न्यायपालिका को अधिकार प्राप्त है कि वह संसद द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिकता जांचे। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ‘केशवानंद भारती मामला’ (1973) ने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ को स्थापित किया, जिसके अनुसार संसद संविधान के मूल ढांचे को संशोधित नहीं कर सकती। इसी तरह, ‘गोलकनाथ केस’ (1967) और ‘मिनर्वा मिल्स केस’ ने संसद की शक्ति के सीमांकन को स्पष्ट किया। न्यायपालिका की यह सक्रिय भूमिका संसदीय संप्रभुता को नियंत्रित करती है और संविधान की सर्वोच्चता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है।

संसदीय संप्रभुता के राष्ट्रीय उदाहरण:

भारतीय संसदीय संप्रभुता का प्रभाव 42वें संविधान संशोधन में स्पष्ट हुआ जब संसद ने अपनी शक्तियों का विस्तार करते हुए न्यायपालिका की समीक्षा की सीमाएं घटाईं, मौलिक अधिकारों के ऊपर नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्राथमिकता दी, और आपातकालीन प्रावधानों को सुदृढ़ किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसके कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर संसदीय संप्रभुता और न्यायिक समीक्षा के बीच संतुलन बहाल किया। हाल के उदाहरणों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और विवादित कृषि कानून भी संसदीय संप्रभुता के विस्तार और सीमाओं को दर्शाते हैं। विशेष रूप से, संसद ने कानून बनाए, लेकिन उनकी संवैधानिकता न्यायालयों ने समीक्षा की, जो संसदीय संप्रभुता और न्यायपालिका के बीच गहरा संतुलन स्थापित करता है।

वैश्विक संदर्भ में संसदीय संप्रभुता:

जहाँ ब्रिटेन में संसदीय संप्रभुता पूर्णतया स्वतंत्र है, वहीं अन्य देशों का संसदीय संप्रभुता मॉडल अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए,संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रणाली संसदीय संप्रभुता की अवधारणा से भिन्न है, क्योंकि वहाँ संविधान सर्वोच्च है और न्यायपालिका को कानूनों की संवैधानिकता जांचने का अधिकार प्राप्त है। इसके कारण अमेरिकी विधायिका अपनी शक्तियों में न्यायिक निरस्तीकरण की संभावनाओं के अधीन रहती है।कनाडा, न्यूजीलैंड, अस्ट्रेलिया जैसे राष्ट्र ब्रिटेन के संसदीय मॉडल को अपनाए हैं, किन्तु इन देशों ने अपनी संवैधान्तिक व्यवस्था में सुधार कर संसदीय संप्रभुता को संविधान, न्यायपालिका और मौलिक अधिकारों के समीपस्थ एक संतुलित स्वरूप प्रदान किया है। उदाहरण के लिए, कनाडा का संविधान संसदीय विधायिका की शक्तियों को सीमित करता है और सर्वोच्च न्यायालय कानूनों की समीक्षा करता है।

इज़राइल का संसदीय मॉडल भी रोचक है, जहां संसद सर्वोच्च विधायी संस्था है, परन्तु न्यायपालिका विशेषाधिकारों के साथ संसद के निर्णयों की जांच करती है। इसी तरह इटली और जर्मनी जैसे संघीय देशों में संसदीय संप्रभुता संवैधानिक सर्वोच्चता से सीमित है, क्योंकि वहां के संविधान संसद और सरकार दोनों के कार्यों को नियंत्रित रखते हैं।

इस प्रकार वैश्विक स्तर पर संसदीय संप्रभुता का स्वरूप प्रत्येक देश की संवैधानिक एवं न्यायिक व्यवस्था का प्रतिबिम्ब है। जहाँ ब्रिटेन में यह पूर्ण और असीमित है, वहीं ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में इसे संविधान और न्यायायिक समीक्षा सीमित करती है। यह विविधता संसदीय संप्रभुता के ऐतिहासिक विकास, राजनीतिक आवश्यकताओं और संविधान के मौलिक सिद्धांतों पर आधारित है। भारत में यह मॉडल एक संतुलित संसदीय लोकतंत्र की उत्कृष्ट मिसाल है, जो संसदीय शक्तियों और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन सुनिश्चित करता है, जिससे लोकतंत्र की मजबूती बनी रहती है।

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि संसदीय संप्रभुता का वैश्विक स्वरूप निर्वाचित विधायिका को शक्ति देता है, लेकिन अधिकांश संवैधानिक लोकतंत्र इसे संविधान, संघीयता, मौलिक अधिकारों और न्यायपालिका की निरंतर समीक्षा के माध्यम से नियंत्रित करते हैं, जिससे कानून शासन का संरक्षण होता है और लोकतांत्रिक प्रणाली में संतुलन बना रहता है।

निष्कर्ष:

भारतीय संसदीय संप्रभुता एक संवैधानिक सीमित मॉडल है जो संसद को विधायी शक्तियां प्रदान करता है, लेकिन उसे संविधान, न्यायपालिका और संघीयता की मर्यादाओं में बाँधता है। यह पूर्ण संसदीय संप्रभुता के ब्रिटिश मॉडल से भिन्न है जहाँ संसद का अधिकार असीमित और किसी उच्च संवैधानिक प्राधिकार के अधीन नहीं होता। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में संसदीय संप्रभुता का यह संयोजन लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक शासन के बीच एक स्थायी संतुलन सुनिश्चित करता है। इस तरह संसदीय संप्रभुता भारत के लोकतंत्र की मजबूती और न्याय की रक्षा की कार्यप्रणाली का सशक्त स्तंभ है।


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