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भारत की नई विदेश नीति योजना क्या है?

‘India needs a new foreign policy plan’- श्याम सरन (IE)

विश्व राजनीति एक ऐसे परिवर्तनशील दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ शक्ति-संतुलन (Power Balance) तेजी से बदल रहा है। अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप और वैश्विक दक्षिण (Global South) के बीच नई प्रतिस्पर्धा उभर रही है।
ऐसे समय में भारत, जो एक उभरती हुई शक्ति है, अपनी विदेश नीति को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस कर रहा है। पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने अपने लेख ‘India needs a new foreign policy plan’ में इसी आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा है कि भारत को अब ऐसी नीति अपनानी होगी जो केवल पश्चिमी देशों पर निर्भर न हो, बल्कि स्वतंत्र, व्यावहारिक और दीर्घकालिक दृष्टि पर आधारित हो।

भारतअमेरिका संबंधों की बदलती दिशा

पिछले दो दशकों में भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में गहरी प्रगति हुई है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, आतंकवाद-रोधी सहयोग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ी है।

हाल ही में अमेरिका में राजदूत सर्जियो गोरीटो की नियुक्ति ने इन संबंधों को नए सिरे से मज़बूत करने का संकेत दिया है। परंतु यह भी स्पष्ट है कि इन संबंधों को आगे बढ़ाने में अब चुनौतियाँ भी हैं:-

  • अमेरिका में बदलती सरकारें और नीतियाँ,
  • व्यापारिक संरक्षणवाद (Protectionism),
  • और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता।

श्याम सरन के अनुसार, भारत को इन सभी परिस्थितियों में अपनी नीति ‘संतुलन और विवेक’ के साथ तय करनी होगी।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका

आज विश्व में ‘बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolar World Order)’ का उदय हो रहा है। अब शक्ति केवल अमेरिका के हाथों में नहीं है, बल्कि चीन, रूस, यूरोपीय संघ और एशिया के अन्य देशों का प्रभाव भी बढ़ रहा है।

भारत के पास इस परिस्थिति में एक नया अवसर है कि वह ‘तीसरी शक्ति’ के रूप में उभर सकता है, जो किसी गुट (Bloc) का हिस्सा नहीं बल्कि स्वतंत्र वैश्विक खिलाड़ी हो। किन्तु इसके लिए भारत को केवल ‘संतुलन की राजनीति’ तक सीमित न रहकर अपनी आत्मनिर्भर विदेश नीति विकसित करनी होगी।

डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी और उससे जुड़ी चुनौतियाँ

जबसे डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, भारत के लिए नई कूटनीतिक जटिलताएँ उत्पन्न हो गयी हैं। ट्रम्प की ‘America First’ नीति एकतरफा फैसलों पर आधारित है, जो सहयोगी देशों के लिए भी अनिश्चितता का वातावरण पैदा करती है।

इसलिए भारत को निम्नलिखित बिन्दुओ पर निरंतर विचार करने की आवश्यकता है –

  • व्यापार समझौतों पर पुनर्विचार हो,
  • और बहुपक्षीय मंचों (जैसे WTO, WHO) के साथ संबंधो का पुन: निर्कधारण करे।

समाधान के रूप में भारत को वैकल्पिक साझेदार विकसित करने चाहिए, ताकि दीर्घकालिक हितों की रक्षा हो सके।

भारतअमेरिका सहयोग के स्थायी क्षेत्र

हालाँकि नीतिगत अस्थिरताएँ हैं, फिर भी भारत और अमेरिका के बीच कुछ स्थायी सहयोग क्षेत्र हैं:-

  1. रक्षा सहयोग: दोनों देशों के बीच हुए समझौते (COMCASA, LEMOA, BECA) सामरिक साझेदारी को गहराई देते हैं।
  2. तकनीकी सहयोग: अमेरिकी कंपनियाँ भारत के डिजिटल और तकनीकी क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।
  3. वैज्ञानिक अनुसंधान और शिक्षा: भारत-अमेरिका विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी फोरम जैसे संस्थानों ने दोनों देशों के अनुसंधान को जोड़ा है।
  4. ऊर्जा एवं पर्यावरण साझेदारी: स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है।

भारत को इन क्षेत्रों में साझेदारी बनाए रखनी चाहिए, परंतु अपनी नीति को इस तरह संचालित करना चाहिए कि ‘निर्भरता’ न बने, बल्कि ‘सहयोग’ बने।

चीन और इंडोपैसिफिक की रणनीति

चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए एक प्रमुख सुरक्षा चिंता का विषय है।
अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत का ‘क्वाड समूह (QUAD)’ इस चिंता का जवाब है।

क्वाड का उद्देश्य है

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त नौवहन सुनिश्चित करना,
  • आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा करना,
  • और चीन की आक्रामक नीतियों का संतुलन बनाना।

भारत को क्वाड का ‘सिर्फ अमेरिकी विस्तार’ बनने से बचना चाहिए। भारत की भागीदारी इस आधार पर होनी चाहिए कि वह अपने क्षेत्रीय हितों और आर्थिक स्वायत्तता को बनाए रखे।

वैश्विक तकनीकी और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में भारत की भूमिका

  • 21वीं सदी की कूटनीति का आधार अब तकनीक और अर्थव्यवस्था है।
    चीन और अमेरिका के बीच चल रही ‘टेक्नोलॉजी वॉर’ से भारत को सीख लेनी चाहिए।
  • भारत के पास विशाल बाज़ार, कुशल मानव संसाधन, और नवाचार की क्षमता है।
    यदि भारत अपनी नीतियों को सही दिशा में ले जाए, तो वह वैश्विक तकनीकी महाशक्ति बन सकता है।

इसके लिए भारत को चाहिए कि वह,

  • अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाए,
  • स्टार्टअप्स और सेमीकंडक्टर उद्योग को प्रोत्साहित करे,
  • और अपने डिजिटल डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

पड़ोसी देशों के साथ स्थिर संबंध

  • विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है, पड़ोस में शांति और स्थिरता।
    भारत को पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों के साथ संवाद के मार्ग खुले रखने चाहिए।
  • भारत को क्षेत्रीय कूटनीति (Regional Diplomacy) में नेतृत्व करना चाहिए, ताकि दक्षिण एशिया में स्थिरता बनी रहे।
    Neighbourhood First Policy’ को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखकर व्यावहारिक रूप देना आवश्यक है।

भारत की नई विदेश नीति की प्राथमिकताएँ

भारत को अपनी नई विदेश नीति में निम्नलिखित प्राथमिकताओं को शामिल करना चाहिए:-

(1) रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)

भारत को किसी भी एक शक्ति (अमेरिका या चीन) के प्रभाव में नहीं आना चाहिए।
उसकी नीति ‘Issue-based Partnership’ पर आधारित होनी चाहिए।

(2) आर्थिक आत्मनिर्भरता (Economic Resilience)

विदेश नीति तभी प्रभावी हो सकती है जब अर्थव्यवस्था मजबूत हो।
भारत को आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं को कूटनीतिक उद्देश्यों से जोड़ना चाहिए।

(3) बहुपक्षीय सहयोग (Multilateral Engagement)

भारत को G20, BRICS, SCO, और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर सक्रिय रहकर अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए।

(4) प्रौद्योगिकी और नवाचार को प्राथमिकता देना

भविष्य की विदेश नीति में तकनीकी कूटनीति (Tech Diplomacy) को केंद्र में रखना होगा।

नीतिनिर्माताओं के लिए सुझाव

  1. भारत को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से विदेश नीति बनानी चाहिए।
  2. निर्णय केवल राजनीतिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखकर होने चाहिए।
  3. भारत को अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ संस्कृति, लोकतंत्र, और वैश्विक विश्वसनीयता का उपयोग करना चाहिए।
  4. विदेश नीति को नागरिकों के कल्याण और विकास के लक्ष्यों से जोड़ा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत की विदेश नीति को अब एक नई दिशा की आवश्यकता है। ऐसी दिशा जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा, वैश्विक स्थिरता का समर्थन, और तकनीकी प्रगति को साथ लेकर चले। भारत को अब केवल किसी गुट की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, बल्कि एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और बहुपक्षीय कूटनीतिक शक्ति के रूप में उभरना चाहिए। यदि भारत अपनी रणनीति को समयानुकूल और व्यवहारिक रूप में ढाल पाता है, तो 21वीं सदी न केवल ‘एशिया की सदी’ बल्कि ‘भारत की सदी’ भी बन सकती है।

 


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