पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) की हार के एक दिन बाद, ममता बनर्जी ने घोषणा की कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी। उनका कहना था कि चुनाव परिणाम जनता के जनादेश का नहीं बल्कि एक ‘साजिश’ का परिणाम है।
- उन्होंने विजयी पार्टी पर केंद्रीय बलों के दुरुपयोग, बूथ कब्जाने और चुनाव प्रक्रिया में हेरफेर करने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी चुनाव परिणामों को कानूनी रूप से चुनौती देगी और अपना राजनीतिक संघर्ष जारी रखेगी।

क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री को हटा सकता है
- संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और मुख्यमंत्री ‘राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत’ पद पर बने रहते हैं।
- शाब्दिक रूप से देखने पर ऐसा लगता है कि राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री को हटाने की शक्ति है।

संविधान सभा में उठी चिंताएँ
- संविधान सभा की बहसों के दौरान सदस्यों ने चिंता व्यक्त की थी कि इस प्रकार की भाषा राज्यपाल को मनमाने ढंग से शक्तियों के प्रयोग का अवसर दे सकती है।
- मोहम्मद इस्माइल खान ने प्रस्ताव रखा था कि ‘प्रसाद पर्यंत’ शब्द हटाकर यह स्पष्ट किया जाए कि मंत्री तभी तक पद पर रहेंगे जब तक उन्हें विधानसभा का विश्वास प्राप्त है।
- हालांकि, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट किया कि संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद तभी तक बनी रहती है जब तक उसे विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो, भले ही यह बात संविधान में स्पष्ट रूप से न लिखी गई हो।

सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या
- समय के साथ भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल की शक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा है कि राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की ‘सहायता और सलाह’ के अनुसार कार्य करते हैं।
- G. Perarivalan बनाम State Through Superintendent of Police मामले में न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल मुख्यतः एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं और स्वतंत्र कार्यकारी अधिकारों का प्रयोग सीमित परिस्थितियों में ही कर सकते हैं।
- व्यवहार में राज्यपाल किसी ऐसे मुख्यमंत्री को मनमाने ढंग से नहीं हटा सकते जिसके पास विधानसभा का बहुमत समर्थन हो।
- वास्तविक वैधता की कसौटी विधानसभा में बहुमत का समर्थन ही है।

Pleasure Withdraw क्या है?
संविधान विशेषज्ञ और विधि विद्वान फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के अनुसार, ममता बनर्जी के इस्तीफ़ा न देने के बयान से कोई बड़ा संवैधानिक संकट पैदा नहीं होगा।
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल इस विश्वास के आधार पर करते हैं कि उसके पास विधानसभा का बहुमत समर्थन है। यदि चुनाव हारने के बाद भी कोई मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा नहीं देता, तो राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत अपना ‘Pleasure’ वापस ले सकते हैं।
- फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने स्पष्ट किया कि ‘Pleasure Withdraw’ का अर्थ यह है कि राज्यपाल सैद्धांतिक रूप से मुख्यमंत्री को पद से हटा सकते हैं। पश्चिम बंगाल के मामले में विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और ममता बनर्जी स्वयं विधायक भी नहीं हैं, इसलिए राज्यपाल के पास नई सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का पूरा अधिकार है।

विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए फ्लोर टेस्ट
- जब यह संदेह हो कि मुख्यमंत्री के पास अभी भी विधानसभा का बहुमत समर्थन है या नहीं, तब फ्लोर टेस्ट आवश्यक हो जाता है।
- विशेष रूप से तब, जब राज्यपाल मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगें और किसी अन्य नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने पर विचार करें।
- फ्लोर टेस्ट एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सदन में बहुमत की पुष्टि की जाती है। मुख्यमंत्री को यह साबित करना होता है कि उन्हें आधे से अधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
- यदि मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करने में असफल रहते हैं, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ता है।
- यदि फ्लोर टेस्ट के बाद भी कोई दल या गठबंधन स्थिर बहुमत सिद्ध नहीं कर पाता, तो अंतिम उपाय के रूप में राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद क्या होता है
संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार राज्य विधानसभा सामान्यतः अपनी पहली बैठक की तारीख से पाँच वर्ष तक चलती है, जब तक कि उसे पहले भंग न कर दिया जाए। पाँच वर्ष पूरे होने पर विधानसभा स्वतः भंग हो जाती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल: निर्वाचन आयोग के अनुसार वर्तमान पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 8 मई 2021 से शुरू हुआ था और इसका कार्यकाल 7 मई को समाप्त होना निर्धारित है।
नई सरकार का गठन: विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्यपाल नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू करते हैं। नव-निर्वाचित विधायक शपथ लेते हैं, जिसके बाद सदन में बहुमत के आधार पर नई सरकार का गठन होता है।
चुनाव हारने के बाद आगे क्या होता है
- विशेषज्ञों के अनुसार विधानसभा चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना मुख्यतः एक संवैधानिक परंपरा है, न कि कोई कठोर कानूनी अनिवार्यता।
- यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं भी देते, तब भी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने और सदन के भंग हो जाने पर उनका पद स्वतः समाप्त हो जाता है।
चुनाव याचिका की संभावना
- चुनाव परिणामों को कानूनी रूप से चुनौती देने के लिए परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर की जा सकती है।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण और चुनाव प्रक्रिया में प्रक्रियागत अनियमितताओं जैसे आधारों पर चुनौती दी जा सकती है।
रिट याचिकाओं की गुंजाइश
- चुनाव याचिका के अतिरिक्त, यदि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो रिट याचिकाएँ भी दायर की जा सकती हैं।
- उदाहरण के लिए, मतदाता सूची से मनमाने ढंग से नाम हटाने के आरोपों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी जा सकती है।
- कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े स्तर पर अनियमितताएँ मतदाताओं की भागीदारी को प्रभावित करती हैं, तो यह न्यायिक जांच का विषय बन सकता है, विशेष रूप से तब जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न जुड़ा हो।
पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं
भारत की राजनीति में पहले भी कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जब किसी मुख्यमंत्री ने कानूनी या राजनीतिक दबाव के बावजूद तुरंत इस्तीफा नहीं दिया।
(i) लालू प्रसाद यादव (1997)
- वर्ष 1997 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में आरोपित हुए थे। भारी राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उन्होंने शुरुआत में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। बाद में उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया।
(ii) अरविंद केजरीवाल (2024)
- दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गिरफ्तारी के बाद भी लंबे समय तक अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया। वे जेल में रहते हुए भी मुख्यमंत्री बने रहे। इस मुद्दे पर राजनीतिक विवाद बढ़ने और विपक्ष के लगातार दबाव के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया।
(iii) हेमंत सोरेन (2024)
- झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर ईडी की कार्रवाई के दौरान इस्तीफे का दबाव बढ़ गया था। इसके बावजूद उन्होंने काफी समय तक इस्तीफा टाल दिया और अंततः गिरफ्तारी से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया।
हालांकि, इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद पद पर बने रहने की कोशिश नहीं कर रहे थे। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल का वर्तमान मामला अलग और अभूतपूर्व माना जा रहा है, क्योंकि यहां चुनावी हार के बाद भी मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देने से इनकार किया है।
स्रोत: द हिंदू (TH)
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