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धारा 17A और अनुच्छेद 14: भ्रष्टाचार विरोधी कानून पर संवैधानिक द्वंद्व

Split Verdict on Section 17A

सुप्रीम कोर्ट (SC) की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर खंडित फैसला सुनाया है। इससे ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार की जांच को बिना बाधा जारी रखने के बीच की मूल बहस एक बार फिर सामने आ गई है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 क्या है?

  • PCA, 1988 भारत का प्रमुख भ्रष्टाचार-रोधी कानून है, जिसे संथानम समिति (1962-64) की सिफारिशों के आधार पर अधिनियमित किया गया था।
  • यह “लोक सेवक” की व्यापक परिभाषा देता है, जिसमें सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश तथा कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक कर्तव्य निभाता हो, शामिल है।
  • यह रिश्वत, अनुचित लाभ और आपराधिक कदाचार जैसे अपराधों को दंडनीय बनाता है।
  • यह अधिनियम लोक सेवकों द्वारा उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए इन अपराधों के लिए दंड का प्रावधान करता है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A क्या है?

  • यह प्रावधान, जो भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 के माध्यम से जोड़ा गया था, तीव्र संवैधानिक समीक्षा का केंद्र बन गया।
  • याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह प्रावधान असंवैधानिक संरक्षण का “तीसरा अवतार” है, जिसे न्यायालय पहले ही दो बार ऐतिहासिक फैसलों में निरस्त कर चुका है।
  • इसका उद्देश्य निर्णय-निर्माण में अधिकारियों को “सुरक्षित क्षेत्र” प्रदान करना था, ताकि सद्भावना में लिए गए निर्णयों के कारण जांच का भय न हो और नौकरशाही में ‘प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम’ से बचा जा सके।
  • PCA, 1988 की धारा 17A के अनुसार, किसी लोक सेवक के आधिकारिक कार्यों से संबंधित अपराधों की जांच या अन्वेषण शुरू करने से पहले संबंधित सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
  • धारा 17A, PCA की धारा 19 से भिन्न है। धारा 19 न्यायालय में अभियोजन के चरण पर पूर्व स्वीकृति की मांग करती है।

PCA की धारा 17A यह अनिवार्य करती है कि जब किसी लोक सेवक पर अधिनियम के तहत लगाया गया अपराध उसके आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से संबंधित हो, तब किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा कोई जांच/अन्वेषण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक निर्दिष्ट प्राधिकरणों से पूर्व स्वीकृति प्राप्त न हो।

यह प्रावधान दो महत्वपूर्ण उपबंध (प्रोवाइज़ो) भी प्रदान करता है।

  • पहला उपबंध “ट्रैप मामलों” (रंगे हाथ रिश्वत लेते/लेने का प्रयास करते हुए गिरफ्तारी) को अपवाद देता है।
  • दूसरा उपबंध समय-सीमा निर्धारित करता है- स्वीकृति देने वाला प्राधिकरण तीन महीनों के भीतर निर्णय देगा, जिसे लिखित कारणों सहित एक माह और बढ़ाया जा सकता है।

धारा 17A का स्वीकार्य रीडिंग डाउन

  • विधि आयोग की 254वीं रिपोर्ट में भी सरकार के बजाय लोकपाल/लोकायुक्त से स्वीकृति की सिफारिश की गई थी। अतः धारा 17A की वैधता तभी बच सकती है जब सूचना पहले लोकपाल/लोकायुक्त को भेजी जाए और उनकी सिफारिश बाध्यकारी हो।
  • उन्होंने ईमानदार अधिकारियों पर झूठी/दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के “चिलिंग इफेक्ट” और नौकरशाही में “प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम” के खतरे पर भी बल दिया।

खंडित फैसला/Split Verdict क्या है?

  • 13 जनवरी 2025 को, सुप्रीम कोर्ट की एक द्विसदस्यीय पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCA) की धारा 17A की संवैधानिकता पर विभाजित फैसला सुनाया।
  • यह प्रावधान लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से पहले पूर्व सरकारी स्वीकृति की मांग करता है, जब ऐसे अपराध उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिए गए निर्णयों से संबंधित हों।

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन: ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण और तुच्छ शिकायतों से बचाने के लिए पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। हालांकि इसकी वैधता सशर्त है कि स्वीकृति सरकार द्वारा नहीं, बल्कि किसी स्वतंत्र प्राधिकरण (केंद्र के लिए लोकपाल और राज्यों के लिए लोकायुक्त) की बाध्यकारी राय पर आधारित होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने धारा 17A को “पुरानी शराब, नई बोतल में” बताते हुए असंवैधानिक घोषित किया।

  • उनके अनुसार यह अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करती है।
  • उन्होंने यह भी कहा कि अभियोजन के स्तर पर धारा 19 पहले से ही पर्याप्त संरक्षण प्रदान करती है।

यह विमर्श कुछ पूरक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जैसे:

  • भ्रष्टाचार मामलों का शीघ्र निपटारा ताकि निवारक प्रभाव बने।
  • झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दर्ज करने वालों पर दंड का प्रावधान, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो।

पूर्व न्यायमूर्ति का पुनर्पाठ

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने दो प्रमुख फैसलों सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014) और विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997) का गहन पुनर्पाठ किया।

  • DSPE अधिनियम की धारा 6A (सुब्रमण्यम स्वामी मामला) केवल संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों पर लागू थी, जिससे पद-आधारित वर्गीकरण बनता था। धारा 17A, इसके विपरीत, औपचारिक रूप से सभी लोक सेवकों पर समान रूप से लागू होती है।
  • धारा 17A का दायरा भी संकीर्ण है, यह केवल उन मामलों पर लागू होती है जो आधिकारिक सिफारिशों या निर्णयों से जुड़े हों।

विनीत नारायण मामले में, ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को इसलिए निरस्त किया गया क्योंकि:

  1. वह एक कार्यकारी निर्देश था जो वैधानिक जांच शक्तियों को सीमित करता था, और
  2. शिकायतों की छानबीन किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ निकाय के बजाय सरकार के हाथ में थी।

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने समाधान के रूप में धारा 17A को लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के साथ पढ़ने का सुझाव दिया।

न्यायालय ने माना कि यह निर्देश एक मनमाना संरक्षित वर्ग बनाता है और निष्पक्ष जांच में बाधा डालता है, जिससे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है।

निष्कर्ष

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट का यह विभाजित फैसला प्रशासनिक निष्पक्षता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी जांच के बीच नाज़ुक संतुलन को उजागर करता है। न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए धारा 17A को सीमित रूप में वैध ठहराने का प्रयास किया, बशर्ते कि पूर्व स्वीकृति की प्रक्रिया सरकार के बजाय स्वतंत्र संवैधानिक निकायों लोकपाल या लोकायुक्त के माध्यम से हो। इसके विपरीत, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक घोषित किया और कहा कि जांच से पहले स्वीकृति की बाध्यता भ्रष्टाचार से लड़ने की संवैधानिक प्रतिबद्धता को कमजोर करती है।

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि लोकतंत्र, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों पर सीधा आघात है। साथ ही, यह भी सच है कि भयमुक्त और निर्णयक्षम नौकरशाही के बिना सुशासन संभव नहीं है। अब यह दायित्व बड़ी पीठ पर है कि वह इस संवैधानिक द्वंद्व का अंतिम समाधान निकाले और ऐसा ढांचा विकसित करे जो एक ओर ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण दे, और दूसरी ओर भ्रष्टाचार की निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभावी जांच को सुनिश्चित करे।

 

 


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