in , ,

महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण

लोकतंत्र का मूल सार यह है कि शासन व्यवस्था में समाज के सभी वर्गों की समान और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो। यदि समाज का कोई बड़ा वर्ग निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया से बाहर रह जाता है, तो लोकतंत्र की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ महिलाओं की आबादी लगभग आधी है।

फिर भी लंबे समय तक राजनीति और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में भी इसी प्रकार की असमानता देखी गई है। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं, किंतु अभी भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर लैंगिक असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की गुणवत्ता, नीति-निर्माण की दिशा और समाज में समानता की स्थापना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जब महिलाएँ राजनीतिक संस्थाओं में प्रभावी रूप से भागीदारी करती हैं, तो शासन की प्राथमिकताएँ अधिक समावेशी और संवेदनशील बनती हैं।

इसी संदर्भ में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के महत्व, वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और संभावित समाधान को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व : एक संक्षिप्त परिदृश्य

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाकर महिलाओं को मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार प्रदान किया। यह उस समय के लिए एक अत्यंत प्रगतिशील कदम था, क्योंकि कई विकसित देशों में भी महिलाओं को यह अधिकार बाद में मिला।इसके बावजूद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लंबे समय तक बहुत सीमित रहा।
  • 1952 में पहली लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 4 प्रतिशत के आसपास थी। अगले कुछ दशकों तक यह संख्या मामूली उतार-चढ़ाव के साथ कम ही रही। 1971 में यह घटकर लगभग 4 प्रतिशत से भी नीचे चली गई थी।
  • इसके बाद धीरे-धीरे स्थिति में सुधार देखने को मिला। 2009 में पहली बार लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 10 प्रतिशत से अधिक हुई। 2019 में यह लगभग 14 प्रतिशत तक पहुँच गई। हाल के चुनावों में भी महिला सांसदों की संख्या में वृद्धि देखने को मिली है।
  • हालाँकि यह वृद्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि इसे वैश्विक औसत से तुलना करके देखा जाए तो भारत अभी भी पीछे दिखाई देता है। विश्व स्तर पर संसदों में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व लगभग एक चौथाई से अधिक है, जबकि भारत में यह उससे काफी कम है।

  • राज्य विधानसभाओं में स्थिति और भी चिंताजनक है। अधिकांश राज्यों में महिला विधायकों का प्रतिशत 10 से 12 प्रतिशत के बीच ही रहता है। कुछ राज्यों में यह थोड़ा अधिक है, लेकिन समग्र रूप से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी भी सीमित है।
  • इस स्थिति से स्पष्ट होता है कि भारत में लोकतांत्रिक ढाँचा तो समावेशी है, परंतु वास्तविक प्रतिनिधित्व के स्तर पर अभी भी लैंगिक असमानता मौजूद है।

 

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का महत्व

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व का विषय नहीं है। इसके दूरगामी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव होते हैं।

1. लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार: जब राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो लोकतंत्र अधिक प्रतिनिधिक और उत्तरदायी बनता है। निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में विविध अनुभव और दृष्टिकोण शामिल होते हैं, जिससे नीतियाँ अधिक संतुलित और समावेशी बनती हैं।

2. लैंगिक संवेदनशील नीतियों का निर्माण: महिलाएँ जब नीति-निर्माण में शामिल होती हैं, तो वे स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, बाल संरक्षण और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को अधिक प्राथमिकता देती हैं। इससे समाज के कमजोर वर्गों के हितों को बेहतर तरीके से संबोधित किया जा सकता है।

3. सामाजिक रूढ़ियों में परिवर्तन: राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक धारणाओं को चुनौती देती है। जब महिलाएँ नेतृत्व की भूमिका में दिखाई देती हैं, तो समाज में यह संदेश जाता है कि नेतृत्व और निर्णय-निर्माण केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है।

4. विकास के नए आयाम: अनेक अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि महिला नेतृत्व वाले क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन अपेक्षाकृत बेहतर होता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिला प्रतिनिधियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से संबंधित योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया है।

इस प्रकार महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शासन की गुणवत्ता और विकास की दिशा को भी प्रभावित करती है।

महिलाओं की सीमित राजनीतिक भागीदारी के कारण

हालाँकि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, फिर भी अनेक सामाजिक और संरचनात्मक बाधाएँ उनके सामने मौजूद हैं।

1. पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था: भारतीय समाज लंबे समय तक पितृसत्तात्मक संरचना से प्रभावित रहा है। इस व्यवस्था में सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व की भूमिकाएँ मुख्यतः पुरुषों के लिए आरक्षित मानी जाती रही हैं। परिणामस्वरूप महिलाओं को राजनीति में आने के लिए अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।

2. राजनीतिक महत्वाकांक्षा में लैंगिक अंतर: कई अध्ययन बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाएँ राजनीति में प्रवेश करने के लिए कम प्रेरित होती हैं। इसका कारण केवल व्यक्तिगत रुचि का अभाव नहीं बल्कि सामाजिक अपेक्षाएँ, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और आत्म-संशय जैसी परिस्थितियाँ भी होती हैं।

3. संसाधनों की कमी: चुनाव लड़ना आर्थिक रूप से महंगा और संसाधन-सघन प्रक्रिया है। महिलाओं के पास अक्सर आर्थिक संसाधनों, राजनीतिक नेटवर्क और संगठनात्मक समर्थन की कमी होती है, जिससे उनका चुनावी राजनीति में प्रवेश कठिन हो जाता है।

4. राजनीति का अपराधीकरण: भारतीय राजनीति में अपराधीकरण और आक्रामक चुनावी प्रतिस्पर्धा भी महिलाओं के लिए एक बड़ी बाधा बनती है। कई महिलाएँ इस वातावरण को असुरक्षित या अनुकूल नहीं मानतीं।

5. घरेलू जिम्मेदारियाँ:भारतीय समाज में परिवार और घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर अधिक होती है। यह स्थिति उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए आवश्यक समय और ऊर्जा से वंचित कर देती है।

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयास

  • महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए भारत में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
  • सबसे महत्वपूर्ण पहल स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था है। पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर आधी सीटों तक कर दिया है।
  • इस कदम का प्रभाव उल्लेखनीय रहा है। लाखों महिलाएँ पंचायत प्रतिनिधि के रूप में उभरी हैं और उन्होंने स्थानीय स्तर पर शासन में सक्रिय भूमिका निभाई है। इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है बल्कि नेतृत्व के नए अवसर भी उत्पन्न हुए हैं।
  • इसके अतिरिक्त संसद में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और उनसे जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए विभिन्न संस्थागत तंत्र भी विकसित किए गए हैं।

हाल के वर्षों में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की गई है। यह कदम यदि प्रभावी रूप से लागू होता है तो भारतीय राजनीति में लैंगिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक परिवर्तन ला सकता है।

आगे की राह

  • महिलाओं के वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए केवल संवैधानिक या विधायी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए व्यापक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की आवश्यकता है।
  • सबसे पहले राजनीतिक दलों को अपनी आंतरिक संरचना में महिलाओं को अधिक अवसर देना होगा। यदि दल टिकट वितरण में महिलाओं को प्राथमिकता दें, तो उनकी प्रतिनिधित्व की स्थिति में तेजी से सुधार हो सकता है।
  • दूसरा, राजनीति को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाना आवश्यक है। अपराधीकरण और धनबल के प्रभाव को कम करने से महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश अपेक्षाकृत आसान होगा।
  • तीसरा, महिलाओं के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण और राजनीतिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। स्थानीय स्तर पर कार्यरत महिला प्रतिनिधियों को उच्च स्तर की राजनीति में आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए।
  • अंततः समाज में भी लैंगिक समानता की भावना को मजबूत करना आवश्यक है। जब तक सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक राजनीतिक संस्थाओं में वास्तविक समानता स्थापित करना कठिन रहेगा।

निष्कर्ष

  • महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण लोकतंत्र की पूर्णता की दिशा में एक अनिवार्य कदम है। भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल की हैं और महिलाओं की भागीदारी में धीरे-धीरे वृद्धि भी हुई है।
  • फिर भी वास्तविक समानता की मंजिल अभी दूर है। राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें प्रभावी निर्णय-निर्माता के रूप में स्थापित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
  • यदि भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को और मजबूत बनाना चाहता है, तो उसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को केवल एक औपचारिक लक्ष्य के रूप में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विकास की अनिवार्य शर्त के रूप में स्वीकार करना होगा।
  • जब राजनीति में महिलाओं की आवाज समान रूप से सुनी जाएगी, तभी लोकतंत्र वास्तव में समावेशी और न्यायपूर्ण बन सकेगा।

Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

वॉशिंगटन कंसेंसस के मूल सिद्धांत और पोस्ट-वॉशिंगटन कंसेंसस का उदय