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त्रिशंकु विधानसभा और राज्यपाल की भूमिका

भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता अक्सर चुनाव परिणामों की स्पष्टता में नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में जांची जाती है जहाँ जनादेश धुंधला या ‘त्रिशंकु’ (Hung Assembly) होता है। 4 मई 2026 को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के आए अप्रत्याशित परिणामों ने एक बार फिर इस संवैधानिक बहस को जीवित कर दिया है। जब किसी भी एक दल को बहुमत का जादुई आँकड़ा प्राप्त नहीं होता, तब राजभवन मात्र एक रबर स्टैंप नहीं रह जाता, बल्कि वह सत्ता के संतुलन का केंद्र बन जाता है। तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करने के राज्यपाल के हालिया निर्णय ने अनुच्छेद 163 और 164 के तहत निहित विवेकाधीन शक्तियों को फिर से विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है।

संवैधानिक रूपरेखा और राज्यपाल का विवेक

भारतीय संविधान का ढांचा संसदीय शासन प्रणाली पर आधारित है, जहाँ कार्यपालिका की वैधता विधायिका के विश्वास पर टिकी होती है। सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति में परिषद की सलाह मानने को बाध्य है, लेकिन जब विधानसभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होता, तब अनुच्छेद 164 राज्यपाल को ‘विवेकाधीन शक्ति’ (Discretionary Power) प्रदान करता है। यहाँ राज्यपाल का प्राथमिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि जो व्यक्ति मुख्यमंत्री नियुक्त किया जाए, वह सदन के पटल पर अपना बहुमत सिद्ध कर सके। हालांकि संविधान यह स्पष्ट नहीं करता कि राज्यपाल को पहले किसे बुलाना चाहिए—सबसे बड़े दल को या चुनाव पूर्व बने किसी गठबंधन को। यही ‘मौन’ अक्सर राजनीतिक खींचतान का कारण बनता है, जैसा कि हम तमिलनाडु के वर्तमान परिदृश्य में देख रहे हैं।

तमिलनाडु 2026: एक नया संवैधानिक संकट

  • तमिलनाडु में आए परिणामों में विजय की पार्टी TVK सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरी है, लेकिन वह बहुमत के आंकड़े से दूर है। दूसरी ओर, पुराने द्रविड़ दलों DMK और AIDMK  की बात करें तो वो बहुमत के आंकड़े से दूर हैं।
  • हालांकि राज्यपाल द्वारा TVK को आमंत्रित न करने के पीछे यह तर्क दिया जा सकता है कि उनके पास सदन का विश्वास प्राप्त करने के लिए पर्याप्त सहयोगियों का अभाव है। परंतु, लोकतांत्रिक परंपराओं में अक्सर सबसे बड़े दल को अपनी योग्यता सिद्ध करने का पहला अवसर दिया जाता रहा है।
  • जब राज्यपाल इस परंपरा से हटकर किसी गठबंधन को प्राथमिकता देते हैं, तो उन पर ‘पक्षपात’ या ‘केंद्र के इशारे पर काम करने’ के आरोप लगना स्वाभाविक है।
  • यह स्थिति न केवल वैधानिक है, बल्कि गहरे रूप में नैतिक भी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर जनता के जनादेश की व्याख्या से जुड़ी है।

ऐतिहासिक विवाद और राजभवन की बदलती भूमिका

  • राज्यों में सरकार गठन को लेकर राज्यपाल की भूमिका का विवाद भारत के राजनीतिक इतिहास में नया नहीं है।
  • 1952 में मद्रास (अब तमिलनाडु) में ही सी. राजगोपालाचारी की नियुक्ति से लेकर 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश में एन.टी. रामा राव की सरकार की बर्खास्तगी तक, राजभवन कई बार विवादों के केंद्र में रहा है।
  • हाल के वर्षों में कर्नाटक (2018), गोवा (2017) और महाराष्ट्र (2019) के उदाहरणों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। गोवा और मणिपुर में सबसे बड़े दल (कांग्रेस) को दरकिनार कर चुनाव बाद बने भाजपा गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया गया, जबकि कर्नाटक में सबसे बड़े दल (भाजपा) को पहले बुलाया गया।
  • इन विरोधाभासी निर्णयों ने यह सिद्ध किया है कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के लिए कोई एक निश्चित ‘ब्लूप्रिंट’ नहीं है, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंता का विषय है।

न्यायपालिका का हस्तक्षेप और ऐतिहासिक निर्णय

जब-जब राजभवन की शक्तियों का कथित दुरुपयोग हुआ है, न्यायपालिका ने लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में हस्तक्षेप किया है। 1994 का ‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ मामला इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी थी कि किसी सरकार के बहुमत का परीक्षण राजभवन के कमरों में नहीं, बल्कि ‘सदन के पटल’ (Floor of the House) पर होना चाहिए।

इसके बाद 2016 के ‘नबाम रेबिया’ मामले में कोर्ट ने फिर दोहराया कि राज्यपाल अपनी मर्जी से समानांतर सरकार नहीं चला सकते और उनकी शक्तियाँ संविधान के दायरे में सीमित हैं।

तमिलनाडु के मौजूदा मामले में भी TVK द्वारा कानूनी चुनौती देने की स्थिति में, न्यायपालिका पुनः इन निर्णयों के प्रकाश में राज्यपाल के कदम की समीक्षा कर सकती है, जिससे यह स्पष्ट होगा कि क्या राज्यपाल का निर्णय वास्तव में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए था या किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाने के लिए।

सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग की सिफारिशें

राज्यपाल पद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समय-समय पर कई समितियों ने सुझाव दिए हैं। 1983 के सरकारियों आयोग ने स्पष्ट रूप से एक प्राथमिकता क्रम (Order of Priority) तय किया था। आयोग के अनुसार, राज्यपाल को सबसे पहले उस चुनाव पूर्व गठबंधन को बुलाना चाहिए जिसके पास बहुमत हो, और यदि ऐसा न हो, तो सबसे बड़े एकल दल (Single Largest Party) को दावेदारी का मौका देना चाहिए। इसके बाद 2007 के पुंछी आयोग ने भी इन्ही सिफारिशों को पुख्ता किया। यदि तमिलनाडु के राज्यपाल इन आयोगों की सिफारिशों का पालन करते, तो शायद विवाद की गुंजाइश कम होती। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राज्यपाल इन विशेषज्ञों की राय को दरकिनार कर अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि को आधार बनाते हैं, जो अक्सर न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर विफल हो जाती है।

निष्कर्ष:

तमिलनाडु का वर्तमान घटनाक्रम केवल एक सरकार के गठन का मामला नहीं है, बल्कि यह इस सवाल का जवाब खोजने की प्रक्रिया है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति राजनीति से ऊपर उठकर निर्णय ले सकते हैं। राज्यपाल का पद एक पुल की तरह है जो केंद्र और राज्यों को जोड़ता है, लेकिन इसे किसी एक दल की सेतु के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। एक ‘त्रिशंकु विधानसभा’ में राज्यपाल की जिम्मेदारी केवल सरकार बनवाना नहीं, बल्कि जनादेश का सम्मान करना है। यदि सबसे बड़े दल को मौका नहीं दिया जाता, तो वह जनता की उस पसंद की अवहेलना मानी जाती है जिसने उसे सबसे अधिक सीटें दी हैं। अंततः, भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि शक्ति का अंतिम स्रोत जनता है, और राजभवन के निर्णयों को सदैव संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

राज्यपाल की शक्तियों से जुड़े प्रावधानों के बारे में प्रमुख तथ्य:

संवैधानिक स्थिति और कार्यकारी शक्तियाँ

  • अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा (एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी हो सकता है)।
  • अनुच्छेद 154: राज्य की कार्यकारी शक्ति राज्यपाल में निहित होती है, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थों के माध्यम से करता है।
  • नियुक्ति: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of President) पद धारण करता है।
  • अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद होगी (विवेकाधीन शक्तियों को छोड़कर)।
  • प्रमुख नियुक्तियाँ: वह मुख्यमंत्री, अन्य मंत्रियों, राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करता है।

विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

  • सत्र आहूत करना: वह राज्य विधानमंडल के सत्र को बुला सकता है, सत्रावसान (Prorogue) कर सकता है और विधानसभा को भंग (Dissolve) कर सकता है।
  • अनुच्छेद 200: विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को वह सहमति दे सकता है, रोक सकता है या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है।
  • अनुच्छेद 213: जब विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो, तो राज्यपाल को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
  • मनोनयन: वह विधान परिषद (जहाँ उपलब्ध हो) के कुल सदस्यों के 1/6 भाग को साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र से मनोनीत करता है।

वित्तीय और न्यायिक शक्तियाँ

  • धन विधेयक: राज्य विधानसभा में धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुमति के बिना पेश नहीं किया जा सकता।
  • बजट: वह सुनिश्चित करता है कि वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) राज्य विधानमंडल के सामने रखा जाए।
  • अनुच्छेद 161: राज्यपाल को राज्य सूची के विषयों पर दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है (लेकिन वह मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता)।
  • न्यायिक नियुक्ति: वह जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति के संबंध में उच्च न्यायालय के परामर्श से निर्णय लेता है।

विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers)

  • त्रिशंकु विधानसभा: चुनाव में स्पष्ट बहुमत न होने पर मुख्यमंत्री का चयन करना।
  • अनुच्छेद 356: राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना।
  • विधेयक आरक्षित करना: किसी विधेयक को अनिवार्य रूप से राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना (विशेषकर यदि वह उच्च न्यायालय की स्थिति को खतरे में डालता हो)।

महत्वपूर्ण अनुच्छेद एक नजर में

  • अनुच्छेद 155: राज्यपाल की नियुक्ति।
  • अनुच्छेद 159: राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान (संबंधित राज्य के मुख्य न्यायाधीश द्वारा)।
  • अनुच्छेद 161: क्षमादान की शक्तियाँ।
  • अनुच्छेद 213: अध्यादेश जारी करने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 333: एंग्लो-इंडियन समुदाय का मनोनयन (अब 104वें संशोधन द्वारा निष्प्रभावी)।


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