सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को यह महत्वपूर्ण फैसला दिया कि वे लोग भी एसिड अटैक पीड़ित माने जाएंगे जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया और जिनके शरीर के भीतर गंभीर चोटें आईं, भले ही उनके शरीर पर बाहर से कोई निशान दिखाई न देता हो। ऐसे पीड़ितों को अब दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) के तहत एसिड अटैक सर्वाइवर का दर्जा मिलेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह स्पष्टीकरण उस दिन से लागू माना जाएगा जब यह कानून अस्तित्व में आया था। अदालत ने सरकार को यह भी बताया कि एसिड अटैक के मामलों में मौजूदा सजा अपराधियों के लिए डर पैदा करने में नाकाम रही है। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों पर ही यह साबित करने का भार डाला जाए कि वे दोषी नहीं हैं। साथ ही, एसिड बेचने वालों को भी इन मामलों में सह-आरोपी बनाया जाना चाहिए।
यह आदेश शाहीन मलिक की याचिका पर आया। शाहीन स्वयं एसिड अटैक की पीड़िता हैं। उन्होंने अदालत का ध्यान कानून की उस कमी की ओर दिलाया था, जिसके कारण एक पूरी श्रेणी के पीड़ित सरकारी सहायता से वंचित रह जा रहे थे।
‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ क्या है?
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए एक ऐतिहासिक कानून है। इसने 1995 के पुराने अधिनियम को प्रतिस्थापित किया है।इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों को नीचे दिए चित्र में विस्तार से दर्शाया गया है:

कानून में क्या कमी थी?
- RPwD Act में एसिड अटैक पीड़ितों को “निर्दिष्ट दिव्यांगता” की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन इसकी परिभाषा बेहद सीमित थी। अधिनियम की अनुसूची 2(zc) के अनुसार, “एसिड अटैक पीड़ित” वह व्यक्ति है जिसका चेहरा या शरीर एसिड या किसी अन्य संक्षारक पदार्थ फेंके जाने से विकृत हो गया हो।
- यानी जिन लोगों को जबरन एसिड पिलाया गया, वे इस परिभाषा के दायरे से बाहर रह गए।
- अदालत ने कहा कि “विकृत” (disfigured) शब्द का इस्तेमाल केवल बाहरी शारीरिक विकृति तक सीमित दिखाई देता है, जिससे वे मामले बाहर हो जाते हैं जिनमें एसिड शरीर के अंदर गंभीर घाव और स्थायी क्षति पहुंचाता है।
- ऐसे मामलों में चोटें उतनी ही भयावह होती हैं। एसिड निगलने से मुंह, गला, भोजन नली और पेट बुरी तरह जल जाते हैं। अक्सर यह नुकसान स्थायी होता है।
- शाहीन मलिक की याचिका में कहा गया कि संक्षारक पदार्थ शरीर के अंदरूनी अंगों, विशेषकर पाचन तंत्र, को गहरा नुकसान पहुंचाता है। इसके कारण पीड़ितों को जीवनभर चिकित्सा समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है और लगातार गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी उपचार की जरूरत पड़ती है। कई पीड़ितों को खाने, निगलने और पाचन में लंबे समय तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इस कमी को दूर करना क्यों जरूरी था?
- RPwD Act के दायरे से बाहर होने के गंभीर परिणाम हैं। इस कानून के तहत मिलने वाला दिव्यांगता प्रमाणपत्र ही आर्थिक सहायता, पुनर्वास योजनाओं, चिकित्सा सहयोग और सरकारी मुआवजे तक पहुंच का आधार है। इसके बिना पीड़ित किसी भी सरकारी सहायता का लाभ नहीं ले सकते।
- याचिका में इसे “अधूरी वर्गीकरण व्यवस्था” का उदाहरण बताया गया, जहां कानून किसी वर्ग के लोगों की मदद करने का दावा तो करता है, लेकिन उसी श्रेणी के एक उपसमूह को मनमाने तरीके से बाहर कर देता है।
- याचिका में कहा गया कि दोनों प्रकार के पीड़ितों के बीच केवल हमले का तरीका अलग है—एक में एसिड फेंका गया और दूसरे में पिलाया गया—लेकिन दोनों को होने वाली क्षति समान रूप से गंभीर है।
याचिका में क्या चुनौती दी गई?
- इस मामले के केंद्र में संविधान का अनुच्छेद 14 था, जो समानता का अधिकार देता है। याचिका में कहा गया कि कानून पीड़ितों के साथ मनमाना और अनुचित भेदभाव करता है, क्योंकि वह हमला किस तरीके से हुआ, इस आधार पर फर्क करता है, जबकि वास्तविक नुकसान समान है।
- याचिका के अनुसार, कानून का उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों को सहायता देना है, इसलिए ध्यान चोट और दिव्यांगता पर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि हमला कैसे किया गया।
- याचिका में कहा गया कि एसिड फेंके जाने और एसिड पिलाए जाने वाले दोनों प्रकार के पीड़ित “एसिड हिंसा से दिव्यांग बने लोगों का एक ही अविभाज्य वर्ग” हैं।
- याचिका ने यह भी कहा कि आपराधिक कानून और कल्याणकारी कानून के बीच विरोधाभास है। भारतीय न्याय संहिता, 2024 की धारा 124 में एसिड फेंकना और एसिड पिलाना—दोनों को एक समान अपराध माना गया है और दोनों के लिए समान सजा का प्रावधान है।
- याचिका में कहा गया कि जब दंड कानून दोनों को समान अपराध मानता है, तो कल्याणकारी कानून में इनके बीच अंतर करना “कानूनी रूप से असंगत और मनमाना” है।
अनुच्छेद 21 का सवाल
- याचिका में यह भी कहा गया कि जबरन एसिड पिलाए गए पीड़ित कानून की परिभाषा में शामिल नहीं होने के कारण दिव्यांगता प्रमाणपत्र नहीं पा सकते। इससे वे सरकारी मुआवजे, पुनर्वास योजनाओं और चिकित्सा सहायता से वंचित हो जाते हैं।
- याचिका के अनुसार, यह स्थिति उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार—जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है—का उल्लंघन है।
- याचिका में कहा गया, “ऐसे गंभीर अंदरूनी घावों से पीड़ित व्यक्ति के लिए चिकित्सा और सहायता कोई दया नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का मूल अधिकार है।”
- इसमें यह भी कहा गया कि मौजूदा दिव्यांगता मूल्यांकन प्रणाली मुख्यतः बाहरी विकृति और चलने-फिरने की अक्षमता पर केंद्रित है, जिसके कारण अंदरूनी चोटों को औपचारिक मान्यता नहीं मिल पाती।
अदालत से क्या मांग की गई थी?
- याचिका में अदालत से “उद्देश्यपूर्ण व्याख्या” (purposive interpretation) अपनाने की मांग की गई। इसका अर्थ है कि कानून की व्याख्या उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जाए, न कि केवल शब्दशः अर्थ के आधार पर।
- क्योंकि RPwD Act एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है, इसलिए याचिका में कहा गया कि अदालत को इसकी उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या करनी चाहिए ताकि पीड़ितों को वास्तविक राहत मिल सके।
- विशेष रूप से अदालत से अनुरोध किया गया कि “एसिड फेंकने द्वारा हिंसक हमला” वाली परिभाषा को “एसिड के इस्तेमाल से किया गया हिंसक हमला” के रूप में पढ़ा जाए, ताकि एसिड हमले के सभी रूप कानून के संरक्षण में आ सकें।
लंबित मामलों का बढ़ता बोझ
- कानून के दायरे का विस्तार करने के साथ-साथ अदालत एसिड अटैक मामलों में धीमी सुनवाई की समस्या पर भी लगातार चिंता जता रही है।
- दिसंबर पिछले वर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी लंबी चलने वाली सुनवाइयों को “न्याय व्यवस्था का मजाक” बताया था और सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से लंबित मामलों का ब्योरा मांगा था।
- सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अनुपालन हलफनामों से अलग-अलग राज्यों में लंबित मामलों की तस्वीर सामने आई।

- उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 198 मामले लंबित पाए गए।
- इसके बाद पश्चिम बंगाल में 160 और गुजरात में 114 मामले लंबित थे।
- बिहार में 68 मामले लंबित बताए गए।
- अन्य राज्यों में महाराष्ट्र में 58 मामले, असम में 27, झारखंड में 26 और ओडिशा में अधीनस्थ अदालतों में 23 तथा हाई कोर्ट में 8 मामले लंबित थे।
- दिल्ली की निचली अदालतों में पिछले वर्ष दिसंबर तक 21 मामले लंबित थे। वहीं उत्तराखंड में केवल 3 मामले लंबित थे, जबकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 5 मामले लंबित पाए गए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे उन पीड़ितों को भी कानूनी पहचान और सरकारी सहायता मिल सकेगी जो अब तक कानून की सीमित परिभाषा के कारण वंचित थे। यह निर्णय समानता, गरिमा और न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों को मजबूत करता है।
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