दक्षिण-पूर्व एशिया की भू-राजनीति में भारत और वियतनाम के बीच के संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। हाल ही में वियतनामी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को ‘उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ (Enhanced Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर तक ले जाकर एक नया इतिहास रचा है। यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि साझा मूल्यों, सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक आकांक्षाओं का एक संगम है। आज वियतनाम भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और ‘विज़न सागर’ (MAHASAGAR) का एक मुख्य स्तंभ बन चुका है।
संबंधों का ऐतिहासिक विकास: उपनिवेशवाद विरोधी जड़ों से आधुनिक युग तक
भारत और वियतनाम के संबंधों की नींव साझा संघर्षों पर टिकी है। इन संबंधों के क्रमिक विकास को हम निम्नलिखित चरणों में देख सकते हैं:
उपनिवेशवाद विरोधी जड़ें: दोनों देशों के बीच भावनात्मक जुड़ाव महात्मा गांधी और हो ची मिन्ह के दौर से है। भारत ने फ्रांस के खिलाफ वियतनाम के स्वतंत्रता संग्राम का पुरजोर समर्थन किया था और 1954 के जिनेवा समझौते के बाद गठित अंतरराष्ट्रीय आयोग (ICSC) के अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1970 का दशक: वर्ष 1972 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए। दिलचस्प बात यह है कि वियतनाम युद्ध के दौरान भारत उन गिने-चुने गैर-कम्युनिस्ट देशों में से था, जिन्होंने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना की थी। साथ ही, 1979 में चीन के साथ संघर्ष के दौरान भी भारत वियतनाम के साथ मजबूती से खड़ा रहा।
1990 के बाद का आर्थिक जुड़ाव: 1992 में भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ के साथ यह रिश्ता केवल वैचारिक न रहकर आर्थिक और रणनीतिक दिशा में मुड़ गया।
2000 से वर्तमान तक: 2007 में रणनीतिक साझेदारी, 2016 में इसे ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ (CSP) में बदला गया और अब 2026 में इसे ‘उन्नत’ स्तर पर पहुँचा दिया गया है। आज वियतनाम उन बहुत कम देशों में शामिल है जिनके साथ भारत के इतने गहरे सुरक्षा और सामरिक संबंध हैं।
संबंधों का रणनीतिक और सुरक्षा महत्व
भारत और वियतनाम की साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
दक्षिण चीन सागर में उपस्थिति: वियतनाम के साथ मजबूत रिश्ते भारत को दक्षिण चीन सागर में एक रणनीतिक उपस्थिति प्रदान करते हैं। यह क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
रक्षा आधुनिकीकरण: वियतनाम भारत को एक ‘विश्वसनीय मित्र’ के रूप में देखता है। ब्रह्मोस मिसाइल सौदे (लगभग 629 मिलियन डॉलर) पर बातचीत अंतिम चरण में है, जो यह दर्शाता है कि अब संबंध केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सक्रिय रक्षा सहयोग में बदल चुके हैं।
वियतनाम की ‘फोर नो’ (Four No’s) नीति: वियतनाम की नीति है कि वह न तो किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनेगा, न ही किसी देश के खिलाफ किसी दूसरे का पक्ष लेगा। भारत के साथ जुड़ाव उसे अपनी सुरक्षा के लिए किसी एक शक्ति (जैसे चीन या अमेरिका) पर निर्भर होने के बजाय अपने विकल्पों को विस्तार देने की अनुमति देता है।
आर्थिक साझेदारी और भविष्य के लक्ष्य
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य 25 बिलियन डॉलर तय किया है। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन: 2026 में दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) और महत्वपूर्ण खनिजों पर हस्ताक्षरित समझौता एक मील का पत्थर है। यह चीन के एकाधिकार को कम करने और ईवी (EV) व सेमीकंडक्टर जैसे भविष्य के उद्योगों के लिए कच्चा माल सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
डिजिटल कनेक्टिविटी: भारत के UPI और वियतनाम के VietQR प्रणालियों के बीच आपसी जुड़ाव ने छोटे व्यापारियों और पर्यटकों के लिए लेन-देन को बेहद आसान बना दिया है।
व्यापार पूरकता: भारत वियतनाम को लोहा, स्टील और कपास निर्यात करता है, जबकि वियतनाम से इलेक्ट्रॉनिक सामान और मोबाइल घटकों का आयात करता है, जो भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए महत्वपूर्ण हैं।
प्रमुख चुनौतियाँ और बाधाएं
इतने गहरे संबंधों के बावजूद कुछ ऐसी चुनौतियाँ हैं जिनका समाधान आवश्यक है:
अप्रयुक्त व्यापार क्षमता: 15 बिलियन डॉलर का व्यापार लक्ष्य भी अभी तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हो पाया है। भारत को वियतनाम के साथ व्यापार घाटे का सामना करना पड़ रहा है।
लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचा: दोनों देशों के बीच सीधी शिपिंग लाइनों की कमी है। त्रिपक्षीय राजमार्ग (भारत-म्यांमार-थाईलैंड) का विस्तार अभी भी कागजों पर है, जिससे परिवहन लागत बढ़ जाती है।
चीन का प्रभाव: रणनीतिक घर्षण के बावजूद, चीन वियतनाम का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बना हुआ है। वियतनाम को भारत के साथ अपने सुरक्षा संबंधों और चीन के साथ अपने आर्थिक हितों के बीच एक बहुत ही बारीक संतुलन बनाना पड़ता है।
प्रतिस्पर्धा: रक्षा बाजार में भारत को रूस, इजरायल और अमेरिका जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है।
संबंधों को मजबूती देने वाली प्रमुख पहलें (2026 तक)
हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं:
2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता: भारत और वियतनाम के बीच विदेश और रक्षा मंत्रियों के स्तर पर यह वार्ता शुरू हुई है, जो भारत केवल अपने सबसे करीबी साझेदारों (जैसे अमेरिका, जापान) के साथ करता है।
साझा विजन 2030: रक्षा क्षेत्र में क्षमता निर्माण और संयुक्त अभ्यास के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक जुड़ाव: भारत वियतनाम में प्राचीन ‘चम’ पांडुलिपियों के संरक्षण में मदद कर रहा है। इसके अलावा, नालंदा विश्वविद्यालय और वियतनाम के बीच शैक्षणिक सहयोग को बढ़ाया गया है।
आगे की राह: क्या किया जाना चाहिए?
भारत-वियतनाम संबंधों को भविष्य में और अधिक प्रगाढ़ बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
संस्थागत मजबूती: केवल बहुपक्षीय मंचों के इतर वार्षिक शिखर सम्मेलनों का आयोजन किया जाए ताकि राजनीतिक गति बनी रहे।
भौतिक संपर्क: चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे भारतीय बंदरगाहों को वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी से जोड़ने वाली सीधी शिपिंग लाइनें शुरू की जानी चाहिए।
डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा: भारत अपने ‘आधार’ और ‘डिजिटल गवर्नेंस’ मॉडल को वियतनाम को निर्यात कर सकता है, जो वर्तमान में तेजी से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहा है।
जन-जन का जुड़ाव: छात्रवृत्ति कार्यक्रमों में वृद्धि और बौद्ध सांस्कृतिक कूटनीति के माध्यम से दोनों देशों के नागरिकों के बीच संबंधों को गहरा किया जा सकता है।
निष्कर्ष भारत और वियतनाम की साझेदारी केवल दो देशों का मेल नहीं है, बल्कि यह एक ‘शांतिपूर्ण और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ की गारंटी है। आर्थिक सहयोग, रक्षा सौदे और डिजिटल एकीकरण के माध्यम से यह संबंध आने वाले दशक में एशिया की राजनीति को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। दोनों देशों को चाहिए कि वे अपनी चुनौतियों को अवसरों में बदलें और इस ‘उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ को धरातल पर उतारें।
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