in , ,

लोकसभा का आकार बढ़ाने के निहितार्थ

भारत में संसदीय प्रतिनिधित्व और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। सरकार ने लोकसभा के आकार को बढ़ाने और महिला आरक्षण को लागू करने से संबंधित तीन प्रमुख विधेयक पेश किए हैं, जो भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप और संसद के कामकाज के तरीके को पूरी तरह बदल सकते हैं। इन परिवर्तनों के पीछे जहाँ प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाने का तर्क दिया जा रहा है, वहीं संघीय ढांचे और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर कई गंभीर चिंताएँ भी व्यक्त की जा रही हैं।

प्रस्तावित विधायी ढांचे का स्वरूप

  • सरकार द्वारा लाए गए विधेयकों में सबसे महत्वपूर्ण ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ है, जो लोकसभा की सदस्य संख्या में भारी वृद्धि का प्रस्ताव करता है।
  • इसके साथ ही ‘परिसीमन विधेयक, 2026’ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर फिर से तय करने का एक वैधानिक ढांचा प्रदान करता है। यह दशकों से सीटों के आवंटन पर लगी रोक को हटाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • तीसरा विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनों में संशोधन से संबंधित है, ताकि दिल्ली, जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों को नए सीट आवंटन और आरक्षण प्रावधानों के दायरे में लाया जा सके।
  • इन प्रस्तावों के तहत लोकसभा की अधिकतम क्षमता को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना है, जिसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें आरक्षित होंगी।
  • इसके लिए एक शक्तिशाली परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे।

परिवर्तनों की आवश्यकता और लोकतांत्रिक महत्व

  • लोकसभा की सीटों में विस्तार का सबसे बड़ा कारण प्रतिनिधित्व का पुराना हो चुका ढांचा है।
  • वर्तमान में सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर आधारित है, जिसे जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए अस्थायी रूप से स्थिर (फ्रीज़) कर दिया गया था।
  • पिछले 50 वर्षों में भारत की आबादी 55 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो गई है, लेकिन संसद सदस्यों की संख्या वही रही है।
  • इसके परिणामस्वरूप आज कुछ सांसद 30 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि कुछ के पास केवल 5 लाख मतदाता हैं।
  • यह स्थिति ‘एक वोट, एक मूल्य’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत के विरुद्ध है। 850 सीटों का विस्तार इस ‘लोकतांत्रिक घाटे’ को कम करने और प्रत्येक नागरिक के वोट की कीमत को समान बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
  • इसके अलावा, यह कदम महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को जल्द लागू करने में सहायक होगा, क्योंकि यह अगली आधिकारिक जनगणना की प्रतीक्षा करने के बजाय 2011 के आंकड़ों के आधार पर तत्काल परिसीमन का विकल्प देता है।

संघीय ढांचा और राज्यों के बीच असंतुलन की चुनौती

  • इन प्रस्तावों के साथ सबसे बड़ी चिंता उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच पैदा होने वाले राजनीतिक असंतुलन को लेकर है। चूंकि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होगा, इसलिए जिन उत्तर भारतीय राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान) में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, उन्हें भारी संख्या में नई सीटें मिलेंगी।
  • दूसरी ओर, दक्षिण भारतीय राज्यों ने अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य नीतियों के माध्यम से जनसंख्या को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, जिसके कारण राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है।
  • यह डर जायज है कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को राजनीतिक शक्ति खोकर ‘पुरस्कृत’ होने के बजाय ‘दंडित’ महसूस हो सकता है।
  • यदि यह असंतुलन बढ़ता है, तो भविष्य में राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण केवल कुछ अधिक आबादी वाले राज्यों के हाथ में सिमट कर रह सकता है।

संसदीय कार्यक्षमता और संस्थागत चुनौतियाँ

  • सदन के आकार में वृद्धि का सीधा असर संसद की कार्यप्रणाली और चर्चाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
  • 850 सदस्यों वाली लोकसभा में प्रत्येक सांसद को अपनी बात रखने, मंत्रियों से प्रश्न पूछने या शून्यकाल में हस्तक्षेप करने का समय और अवसर बहुत कम मिलेगा।
  • वर्तमान में भी संसद साल में औसतन 70 दिन से कम बैठती है और विधेयकों की संसदीय समितियों द्वारा जांच की दर भी काफी कम है।

  • ऐसे में सदस्यों की संख्या बढ़ने से अराजकता बढ़ सकती है और विधायी कार्यों में गहराई की कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त, लोकसभा का आकार बढ़ने से राज्यसभा के सापेक्ष महत्व में भी बदलाव आएगा।
  • संयुक्त सत्रों के दौरान लोकसभा की शक्ति राज्यसभा के मुकाबले तीन गुना से अधिक हो जाएगी, जो भारतीय संसद के द्विसदनीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
  • साथ ही, लोकसभा के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रिपरिषद का आकार भी बढ़कर 122 तक पहुँच सकता है, जिससे शासन की जटिलता बढ़ेगी।

भविष्य की राह और संभावित समाधान

  • लोकतंत्र की इस बड़ी प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए केवल जनसंख्या को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
  • एक संभावित समाधान ‘कैप एंड कॉम्पेंसेट’ (सीमा और मुआवजा) फॉर्मूला हो सकता है, जिसमें सीटों के आवंटन में जनसंख्या के साथ-साथ मानव विकास सूचकांक (HDI) और आर्थिक योगदान जैसे प्रदर्शन संकेतकों को भी महत्व दिया जाए। इससे प्रगतिशील राज्यों का राजनीतिक प्रभाव सुरक्षित रहेगा।
  • इसके अलावा, इतने बड़े बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है। इन विधेयकों को एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाना चाहिए और सभी क्षेत्रीय दलों तथा नागरिक समाज के साथ सघन विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
  • भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में संसदीय प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण केवल एक सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य और एकता को प्रभावित करने वाला एक संवेदनशील राजनीतिक निर्णय है, जिसे अत्यंत सावधानी और पारदर्शिता के साथ लिया जाना चाहिए।

Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

परिवर्तनकारी संविधान: मुक्ति और समानता का एक नया विजन