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‘हम, भारत के लोग’ की पुनर्परिभाषा

जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्चस्तरीय समिति और उससे उपजे प्रश्न

किसी लोकतंत्र की आत्मा उसके ‘लोग’ होते हैं। भारतीय संविधान की उद्देशिका का आरंभ ‘हम, भारत के लोग’ से होता है, जो इस बात की घोषणा है कि राष्ट्र की संप्रभुता नागरिकों में निहित है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा गठित ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्चस्तरीय समिति’ (High-Level Committee on Demographic Changes) ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है। सरकार इसे अवैध घुसपैठ से उत्पन्न असंतुलन का वैज्ञानिक अध्ययन बताती है, जबकि आलोचकों का मत है कि यह समिति जनसांख्यिकी के स्थापित विज्ञान से हटकर नागरिकों को धर्म के आधार पर वर्गीकृत करने की दिशा में बढ़ता कदम है। इस विमर्श को समझने के लिए जनसांख्यिकी की अवधारणा, भारत में उसकी समृद्ध परंपरा, समिति के स्वरूप और समानांतर चल रही गणना प्रक्रियाओं का समग्र विश्लेषण आवश्यक है।

‘डेमोस’ से ‘डेमोग्राफी’ तक: अवधारणा की यात्रा

प्राचीन यूनानी शब्द ‘डेमोस’ (Demos) का मूल अर्थ था ‘जनता’ या ‘लोग’। आश्चर्यजनक रूप से इसका भाव हमारी उद्देशिका के ‘हम, भारत के लोग’ के लगभग समान है। अंग्रेजी के अनेक शब्द इसी मूल से उपजे हैं:

  • डेमोक्रेसी (Democracy): जनता का शासन
  • डेमोटिक (Demotic): जनसाधारण से संबंधित
  • डेमागॉगी (Demagogy): जनभावनाओं को भड़काकर सत्ता प्राप्त करने की प्रवृत्ति
  • एपिडेमिक और एंडेमिक (Epidemic, Endemic): जनसमुदाय में फैलने वाले या स्थानिक रोग

उन्नीसवीं शताब्दी में इस शब्द को एक अन्य यूनानी शब्द ‘ग्राफिया’ (लेखन या वर्णन) से जोड़ा गया।

फ्रांसीसी विद्वान अशील गियार (Achille Guillard) ने 1855 में ‘डेमोग्राफी’ शब्द को जनसंख्या अध्ययन की एक शाखा के रूप में प्रतिष्ठित किया। तब से यह अनुशासन एक सुव्यवस्थित सामाजिक विज्ञान के रूप में अत्यंत विकसित हो चुका है, जिसके केंद्र में जनसंख्या की संरचना, जन्म, मृत्यु, प्रवासन और स्वास्थ्य जैसे मापनीय तत्व हैं।

भारत में जनसांख्यिकी की समृद्ध परंपरा

बीसवीं शताब्दी में भारत ने ऐसे जनसांख्यिकीविद दिए जिन्होंने वैश्विक प्रतिष्ठा अर्जित की। एस. चंद्रशेखर, आशीष बोस और पी. एन. मारी भट जैसे विद्वानों ने भारतीय जनसंख्या के अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुँचाया।

संस्थागत आधार

  • अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS), मुंबई: 1956 में स्थापित यह संस्थान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन मानद विश्वविद्यालय है और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की नोडल संस्था है।
  • विश्वविद्यालय आधारित जनसंख्या अध्ययन केंद्र: देश के अनेक विश्वविद्यालयों में ऐसे केंद्र कार्यरत हैं जिन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर गहन अध्ययन किए।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: IIPS लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के एशिया-प्रशांत आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (UNESCAP) से जुड़ा रहा है, जहाँ सामाजिक विकास, संसाधन प्रबंधन और ऊर्जा वितरण के लिए जनसंख्या मानचित्रण किया गया।

नीति निर्माण में योगदान

इन विद्वानों और संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों से मृत्यु दर, प्रजनन दर और लिंगानुपात के सटीक आकलन संभव हुए, जिनसे राष्ट्रीय नीति और नियोजन को गहरा लाभ मिला। दशकों के श्रम से संचित आँकड़ा भंडार में आज लगभग 370 संकेतक और 1,500 आँकड़ा श्रृंखलाएँ उपलब्ध हैं, जो जनगणना, नागरिक पंजीकरण प्रणाली के महत्वपूर्ण आँकड़ों (Vital Statistics) तथा संयुक्त राष्ट्र और समाजवैज्ञानिकों के अध्ययनों का सुदृढ़ समन्वय प्रस्तुत करती हैं।

नई समिति: घोषणा, गठन और संरचना

इस परिपक्व व्यवस्था के रहते, प्रधानमंत्री द्वारा 15 अगस्त 2025 को स्वतंत्रता दिवस संबोधन में एक नई ‘उच्चस्तरीय जनसांख्यिकीय मिशन’ की घोषणा अनेक विशेषज्ञों को अप्रत्याशित लगी। प्रधानमंत्री ने घुसपैठ के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी बदलने के ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ की चेतावनी दी थी और विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में इसके सुरक्षा निहितार्थों पर बल दिया था।

गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को एक संकल्प (Resolution) के माध्यम से इस समिति का गठन किया। आलोचकों ने इस तिथि को भी प्रतीकात्मक माना, क्योंकि 2014 के बाद की राजनीतिक यात्रा में इसका विशेष स्थान है।

समिति की संरचना

  • अध्यक्ष: सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर, जो उस पीठ का हिस्सा रहे जिसने संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की मृत्युदंड की सजा बरकरार रखी थी।
  • सदस्य: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़ी अर्थशास्त्री डॉ. शमिका रवि, सुरक्षा एवं पुलिस पृष्ठभूमि वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव, तथा आवास एवं शहरी मामलों से जुड़े रहे पूर्व नौकरशाह दुर्गा शंकर मिश्र।
  • पदेन सदस्य: भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त, तथा गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (विदेशी प्रभाग-I), जो सदस्य सचिव हैं।
  • समय सीमा: एक वर्ष में अंतिम प्रतिवेदन, आवश्यकता पड़ने पर छह माह का विस्तार।

सबसे विचित्र तथ्य यह है कि जिस समिति के नाम में ही ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन’ जुड़ा है, उसमें एक भी प्रशिक्षित जनसांख्यिकीविद नहीं है।

समिति का अधिदेश: आधिकारिक और प्रतिवेदित पक्ष

  • आधिकारिक संदर्भ शर्तें
  • जनसांख्यिकीय परिवर्तनों की प्रकृति, कारणों और परिणामों का वैज्ञानिक अध्ययन
  • प्रजनन दर में अंतर, सीमापार आवागमन, अवैध प्रवासन, आर्थिक प्रवासन और सामाजिक-पर्यावरणीय कारकों की पड़ताल
  • धार्मिक एवं सामाजिक समुदायों की जनसंख्या संरचना में असामान्य बदलावों का विश्लेषण
  • केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय तथा नीतिगत, प्रशासनिक और विधिक उपायों की अनुशंसा

प्रतिवेदित कार्यभार

समाचारों के अनुसार समिति से पिछले 15 वर्षों का धर्मवार तुलनात्मक अध्ययन करने को कहा गया है, जिसमें शामिल हैं:

  • जन्म पंजीकरण
  • विद्यालयी नामांकन
  • वाहन पंजीकरण
  • संपत्ति लेनदेन
  • राशन कार्ड
  • मतदाता पंजीकरण

घोषित उद्देश्य ‘अवैध प्रवासन से उत्पन्न असंतुलनों’ की पहचान है, जिसे सरल शब्दों में ‘घुसपैठिया प्रभाव अध्ययन’ कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त समिति से अपेक्षा है कि वह आधार नामांकन, राशन कार्ड या अन्य जाली दस्तावेजों में असामान्य उछाल, और बिना स्थापित वंशावली के हुए मतदाता पंजीकरण की जाँच करे। इससे भी महत्वपूर्ण, उसे धार्मिक शैक्षिक संस्थानों, विशेषकर अल्पसंख्यक संस्थानों का अध्ययन करना है। एक विशेष कार्य पिछले 15 वर्षों के धर्मांतरण आँकड़ों की जाँच भी है।

‘जनसांख्यिकी’ से ‘धर्म-नृवंशवर्णन’ की ओर?

स्थापित जनसांख्यिकी विज्ञान अपने अध्ययन के केंद्र में जनसंख्या को रखता है, धर्म को नहीं। जब किसी अध्ययन का मूल आधार ही धार्मिक पहचान बन जाए, तो वह जनसांख्यिकी न रहकर एक प्रकार की ‘थियो-एथ्नोग्राफी’ (Theo-ethnography) अर्थात धर्म-आधारित नृवंशवर्णन बन जाता है। आलोचकों की दृष्टि में यह समिति इसी नई और चिंताजनक भूमि पर कदम रख रही है।

समानांतर गणना प्रक्रियाएँ: दोहराव या विशेष उद्देश्य?

यह समिति ऐसे समय में कार्य कर रही है जब कई समान गणना प्रक्रियाएँ पहले से चल रही हैं:

  • मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): यह अत्यंत विवादित प्रक्रिया पहले से जारी है, जिसका केंद्रीय उद्देश्य, जैसा अनेक अवसरों पर कहा गया, कथित घुसपैठिया मतदाताओं की पहचान कर उन्हें मताधिकार से वंचित करना है।
  • जनगणना 2027: महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त जनगणना का आधा कार्य पूरा कर चुके हैं। मकान सूचीकरण चरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक चला और जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में होगी, जिसकी संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 है (हिमाच्छादित क्षेत्रों हेतु 1 अक्टूबर 2026)। 1931 के बाद पहली बार राष्ट्रव्यापी जाति गणना भी इसमें सम्मिलित है। जनगणना के अनेक प्रश्न वही आँकड़े दे सकते हैं जो समिति खोज रही है।
  • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC): इसके पुनर्जीवन की चर्चाएँ भी चल रही हैं।

यदि ऐसा है, तो प्रश्न उठता है कि समिति का वह विशेष उद्देश्य क्या है जिसे न SIR, न जनगणना और न ही उपलब्ध परिष्कृत आँकड़ा भंडार पूरा कर सकते हैं। आलोचकों के अनुसार यह उद्देश्य है:

  • जीपीएस मानकों पर ‘सुनियोजित प्रवासन’ और ‘असामान्य बसावटों’ की पहचान
  • घुसपैठियों के ‘प्रबंधन’ हेतु विधायी, प्रशासनिक और तकनीकी उपायों का विकास
  • स्थायी निर्वासन ढाँचे (Deportation Frameworks) का क्रियान्वयन

समय-सीमा का संयोग और जनगणना की असामान्यता

इस संदर्भ में जुलाई में बेलगावी में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसके तीन दिवसीय विमर्श और प्रशिक्षण का एकमात्र विषय, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जनगणना था। साथ ही समिति के कार्य की समय सीमा जनगणना आँकड़ों के प्रकाशन की घोषित समय सीमा, दिसंबर 2027, से मेल खाती है।

जनगणना 2026-27 स्वयं में स्थापित परंपरा से एक बड़ा विचलन है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से भारत में जनगणना सामान्यतः दशक के पहले वर्ष में होती रही है। कोविड महामारी ने 2021 की जनगणना असंभव बना दी, परंतु संयुक्त राष्ट्र के ‘जनसंख्या एवं आवास जनगणना हेतु सिद्धांत एवं अनुशंसाएँ’ का पालन करने वाले अन्य सभी देशों ने 2023 तक अपनी जनगणना पूरी कर ली। भारत ने बिना विशिष्ट कारण बताए इसे स्थगित रखा।

परिसीमन से संबंध

संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में 2001 (84वाँ संशोधन) तथा 2003 (87वाँ संशोधन) के संशोधनों के माध्यम से यह व्यवस्था की गई कि लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनः आवंटन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर होगा। आलोचकों का तर्क है कि 2026-27 की जनगणना स्पष्टतः इसी प्रावधान को साधने के लिए है, अन्यथा ऐसी जनगणना का क्या औचित्य जिसके आँकड़े 2011 या 2041 के आँकड़ों से सार्थक तुलना योग्य ही न हों।

नए प्रश्न, नई आशंकाएँ

जनगणना में कुछ नए प्रश्न जोड़े गए हैं, जिनमें जीवनसाथी का नाम भी शामिल है। आलोचकों के अनुसार SIR, जनगणना और जनसांख्यिकी समिति मिलकर निम्नलिखित सूचनाओं का एक विशाल भंडार तैयार कर लेंगे:

  • कथित घुसपैठियों की पहचान
  • नागरिकों की धार्मिक संबद्धता
  • भूमि और संपत्ति लेनदेन
  • देशभर में अंतरधार्मिक दंपतियों का विवरण
  • आर्थिक स्थिति (वाहन, रोजगार आदि)

पिछले बारह वर्षों में ‘घर वापसी’ और ‘लव जिहाद’ जैसे पद भाषणों और गतिविधियों के माध्यम से सार्वजनिक विमर्श में परिचित हो चुके हैं। अब ‘लैंड जिहाद’ की चर्चा भी होने लगी है। यदि समिति का कार्य घुसपैठ के भय को और प्रबल करे तथा ‘निष्कासन तंत्र के क्रियान्वयन’ का दायित्व निगरानी समूहों (Vigilantes) के हाथ चला जाए, तो इसके दुष्परिणामों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

सरकार का पक्ष

संतुलित विश्लेषण के लिए सरकार के तर्क भी समझने होंगे:

  • अनियंत्रित घुसपैठ से संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर प्रत्यक्ष संकट उत्पन्न होता है।
  • सीमावर्ती जिलों, विशेषकर असम, पश्चिम बंगाल और झारखंड में असामान्य जनसंख्या परिवर्तन की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं।
  • जनजातीय समाजों की भूमि और सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण आवश्यक है।
  • स्थानीय संसाधनों, लोक सेवाओं और सामाजिक सद्भाव पर दबाव का वैज्ञानिक आकलन नीति निर्माण के लिए अपरिहार्य है।

आगे की राह

  • विशेषज्ञता का समावेश: समिति में प्रतिष्ठित जनसांख्यिकीविदों और IIPS जैसे संस्थानों की सहभागिता सुनिश्चित हो।
  • पारदर्शिता: कार्यप्रणाली, आँकड़ा स्रोत और निष्कर्ष सार्वजनिक समीक्षा हेतु उपलब्ध हों।
  • निजता का संरक्षण: पुट्टास्वामी निर्णय (2017) में मान्य निजता के मौलिक अधिकार और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के अनुरूप डेटा का उपयोग हो।
  • संवैधानिक मूल्यों की रक्षा: अनुच्छेद 14, 15 और 21 के अनुरूप किसी समुदाय को संदेह की दृष्टि से न देखा जाए।
  • विधि का शासन: अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन केवल वैधानिक संस्थाओं द्वारा, न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हो, निगरानी समूहों के हाथों नहीं।

निष्कर्ष

सीमाओं की सुरक्षा और अवैध प्रवासन पर नियंत्रण किसी भी संप्रभु राष्ट्र का वैध दायित्व है, परंतु इसका साधन विज्ञानसम्मत, पारदर्शी और संवैधानिक होना चाहिए। भारत के पास जनसांख्यिकी की विश्वस्तरीय परंपरा और विशाल आँकड़ा संपदा है। यदि नई समिति इस विरासत को दरकिनार कर धर्म को जनसंख्या अध्ययन की धुरी बना देती है, तो ‘हम, भारत के लोग’ की समावेशी अवधारणा संकुचित होने का खतरा है। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि राज्य अपने नागरिकों को गिनते समय उन्हें बाँटे नहीं।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • ‘डेमोस’ यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ ‘लोग’ है।
  • ‘डेमोग्राफी’ शब्द 1855 में फ्रांसीसी विद्वान अशील गियार ने प्रचलित किया।
  • IIPS मुंबई में स्थित है और NFHS की नोडल संस्था है।
  • उच्चस्तरीय जनसांख्यिकीय मिशन की घोषणा 15 अगस्त 2025 को लाल किले से हुई।
  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्चस्तरीय समिति का गठन 26 मई 2026 को गृह मंत्रालय के संकल्प द्वारा हुआ।
  • समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) प्रकाश प्रभाकर नावलेकर हैं।
  • समिति के सदस्य सचिव गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (विदेशी प्रभाग-I) हैं।
  • समिति को एक वर्ष में अंतिम प्रतिवेदन देना है।
  • जनगणना 2027 भारत की 16वीं और स्वतंत्रता के बाद 8वीं जनगणना है।
  • जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 है; हिमाच्छादित क्षेत्रों हेतु 1 अक्टूबर 2026।
  • 1931 के बाद पहली बार राष्ट्रव्यापी जाति गणना जनगणना 2027 में हो रही है।
  • जनगणना, जनगणना अधिनियम 1948 और जनगणना नियम 1990 के अंतर्गत होती है।
  • 84वें संविधान संशोधन (2001) ने सीटों के पुनः आवंटन को 2026 के बाद की पहली जनगणना तक स्थगित किया।

अभ्यास प्रश्न

1. ‘डेमोग्राफी’ शब्द को सर्वप्रथम जनसंख्या अध्ययन की शाखा के रूप में किसने प्रचलित किया?

(a) थॉमस माल्थस

(b) अशील गियार

(c) अगस्त कॉम्ट

(d) जॉन ग्रांट

2. जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्चस्तरीय समिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इसका गठन जनगणना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत किया गया है।
  2. इसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश कर रहे हैं।
  3. भारत के जनगणना आयुक्त इसके सदस्य हैं।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

3. जनगणना 2027 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. देश के अधिकांश भाग के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 है।
  2. स्वतंत्र भारत में यह पहली जनगणना है जिसमें व्यापक जाति गणना हो रही है।
  3. लद्दाख के लिए संदर्भ तिथि 1 जनवरी 2027 निर्धारित है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

4. अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (IIPS) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(a) यह नई दिल्ली में स्थित है।

(b) यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

(c) यह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की नोडल संस्था है।

(d) यह नीति आयोग का एक संबद्ध कार्यालय है।

5. लोकसभा सीटों के राज्यवार पुनः आवंटन को ‘2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना’ तक स्थगित करने का प्रावधान किस संविधान संशोधन द्वारा किया गया?

(a) 42वाँ संशोधन

(b) 61वाँ संशोधन

(c) 84वाँ संशोधन

(d) 91वाँ संशोधन


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