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न्यायिक क्षमता और कार्यपालिका की शक्ति

Judicial capacity and executive power – Andrew Coan और Nicholas Bullard द्वारा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका को संविधान की संरक्षक, मौलिक अधिकारों की रक्षक और विधि के शासन की आधारभूत संस्था माना जाता है। सामान्यतः न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा करते समय उसका संवैधानिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review), न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। किंतु Judicial Capacity and Executive Power लेख एक अपेक्षाकृत अलग और महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने रखता है कि क्या न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका को उसकी संस्थागत क्षमता (Judicial Capacity) से अलग करके समझा जा सकता है?

Andrew Coan और Nicholas Bullard द्वारा 2016 में Virginia Law Review में प्रकाशित यह अध्ययन मुख्यतः अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका की शक्ति के संबंध का विश्लेषण करता है।

लेखक का केंद्रीय तर्क यह है कि न्यायालयों की भूमिका केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि वे संवैधानिक रूप से क्या कर सकते हैं, बल्कि इस बात से भी प्रभावित होती है कि वे व्यावहारिक और संस्थागत रूप से कितना कर सकते हैं

न्यायिक क्षमता का प्रश्न क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका को सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है। यदि विधायिका या कार्यपालिका संविधान की सीमाओं से बाहर जाती है, तो न्यायालय उसके विरुद्ध हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन इस सिद्धांत को व्यवहार में लागू करने के लिए न्यायालय के पास पर्याप्त संस्थागत क्षमता होना आवश्यक है।
  • न्यायालयों के पास सीमित संख्या में न्यायाधीश, न्यायिक कर्मचारी, समय और प्रशासनिक संसाधन होते हैं। इसके विपरीत, विधायिका और कार्यपालिका के पास व्यापक प्रशासनिक तंत्र, विशेषज्ञ संस्थाएँ, अधिकारी और संसाधन होते हैं।
  • इसलिए यदि न्यायालय किसी व्यापक सरकारी नीति या संवैधानिक प्रश्न पर अत्यधिक कठोर और प्रत्येक मामले में गहन समीक्षा करने का दृष्टिकोण अपनाता है, तो उसके सामने मुकदमों की संख्या बहुत बढ़ सकती है। इससे न्यायालय की कार्यक्षमता और निर्णयों की गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
  • यहीं से न्यायिक क्षमता मॉडल (Judicial Capacity Model) का विचार सामने आता है।

न्यायिक क्षमता मॉडल क्या है?

  • लेखक न्यायिक निर्णय-निर्माण को समझाने के लिए न्यायिक क्षमता मॉडल प्रस्तुत करते हैं। इस मॉडल का आधार यह है कि न्यायिक व्यवस्था की संस्थागत संरचना स्वयं उसकी क्षमता को सीमित करती है।
  • अमेरिकी संघीय न्यायपालिका में अनेक जिला न्यायालय, उनके ऊपर अपीलीय न्यायालय और सबसे ऊपर एक सर्वोच्च न्यायालय है। इस संरचना के शीर्ष पर स्थित Supreme Court के पास राष्ट्रीय स्तर पर संघीय कानून की अंतिम और बाध्यकारी व्याख्या करने की विशेष भूमिका है। इसलिए शीर्ष न्यायालय की क्षमता पूरे न्यायिक तंत्र की अंतिम क्षमता को प्रभावित करती है।
  • लेखक के अनुसार, Supreme Court अपने प्रत्येक मामले पर निश्चित स्तर की पेशेवर गंभीरता बनाए रखना चाहता है। इसलिए वह असीमित संख्या में मामलों का उसी स्तर की विस्तृत समीक्षा नहीं कर सकता।

इससे एक संस्थागत बाध्यता पैदा होती है

सीमित न्यायिक क्षमतासीमित मामलों की विस्तृत समीक्षान्यायिक सिद्धांतों के निर्माण पर प्रभाव।

अर्थात् न्यायिक क्षमता केवल यह निर्धारित नहीं करती कि न्यायालय कितने मामले सुन सकता है; यह यह भी प्रभावित कर सकती है कि न्यायालय किस प्रकार के कानूनी नियम विकसित करेगा।

न्यायिक क्षमता और कार्यपालिका की शक्ति

  • लेख का मुख्य अनुप्रयोग कार्यपालिका की शक्ति के संवैधानिक नियंत्रण से संबंधित है।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका के पास प्रशासनिक निर्णय लेने और नीतियों को लागू करने की व्यापक शक्ति होती है। न्यायालय इन शक्तियों की संवैधानिक समीक्षा कर सकता है। लेकिन यदि कार्यपालिका की प्रत्येक प्रशासनिक कार्रवाई न्यायिक चुनौती के लिए खुल जाए, तो संभावित मुकदमों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है।
  • यहीं मुकदमेबाजी की मात्रा (Volume of Litigation) महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • यदि किसी संवैधानिक सिद्धांत को लागू करने से हजारों या लाखों संभावित मामलों का रास्ता खुल जाए, तो Supreme Court की सीमित संस्थागत क्षमता एक महत्वपूर्ण बाधा बन सकती है।

लेखक के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय के सामने सामान्यतः दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ उभर सकती हैं;

  1. वह अधिक स्पष्ट और सीमित श्रेणीगत नियम (Categorical Rules) बनाए।
  2. वह सरकार की कार्रवाई के प्रति अधिक न्यायिक संयम या सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण (Deference) अपनाए।

इस प्रकार न्यायिक क्षमता कार्यपालिका की शक्ति पर न्यायिक नियंत्रण की सीमा को प्रभावित कर सकती है।

उच्चजोखिम और उच्चमात्रा वाले क्षेत्र

  • लेख में High-Stakes और High-Volume क्षेत्रों की अवधारणा विशेष रूप से उपयोगी है।
  • कुछ संवैधानिक प्रश्नों का महत्व बहुत अधिक होता है और वे सरकार की शक्ति की व्यापक संरचना को प्रभावित करते हैं। ये High-Stakes Domains हैं।
  • दूसरी ओर, कुछ विषय ऐसे होते हैं जिनमें किसी सिद्धांत को व्यापक रूप से लागू करने पर बहुत बड़ी संख्या में मुकदमे उत्पन्न हो सकते हैं। ये High-Volume Domains हैं।
  • जब कोई संवैधानिक क्षेत्र दोनों विशेषताओं से युक्त हो अर्थात् वह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भी हो और उससे बड़ी संख्या में मुकदमे भी पैदा हो सकते हों तब न्यायिक क्षमता की सीमा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
  • लेखक के अनुसार, ऐसे क्षेत्रों में न्यायालय के लिए प्रत्येक मामले का विस्तृत और संदर्भ-विशिष्ट मूल्यांकन करना कठिन हो सकता है। इसलिए वह अधिक स्पष्ट नियम या अधिक संयमित न्यायिक दृष्टिकोण की ओर जा सकता है।

कांग्रेस द्वारा शक्तियों का प्रत्यायोजन और न्यायिक क्षमता

लेख का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण शक्तियों का प्रत्यायोजन (Delegation of Power) है।

  • अमेरिकी व्यवस्था में Congress द्वारा प्रशासनिक एजेंसियों को कुछ अधिकार सौंपे जाने का प्रश्न लंबे समय से संवैधानिक बहस का विषय रहा है। सैद्धांतिक रूप से Supreme Court यह निर्धारित कर सकता है कि Congress ने अपनी विधायी शक्ति का अत्यधिक प्रत्यायोजन किया है या नहीं।
  • लेकिन यदि न्यायालय इस सिद्धांत को बहुत कठोरता से लागू करे, तो प्रशासनिक राज्य की बड़ी संख्या में संस्थाएँ और उनके निर्णय न्यायिक चुनौती के दायरे में आ सकते हैं।

इससे अत्यधिक मुकदमेबाजी उत्पन्न होने की संभावना होगी।

  • लेखक इसी बिंदु के आधार पर बताते हैं कि न्यायालय द्वारा किसी सिद्धांत को व्यापक रूप से लागू न करने के पीछे केवल संवैधानिक विचारधारा ही नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता की सीमा भी एक कारण हो सकती है।
  • इस प्रकार न्यायिक संयम को केवल “सरकार के प्रति सहानुभूति” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; उसके पीछे न्यायालय की संस्थागत क्षमता का प्रश्न भी हो सकता है।

राष्ट्रपति और प्रशासनिक शक्ति

  • लेख में दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रपति की प्रशासनिक शक्ति से संबंधित है। यदि न्यायालय कार्यपालिका के प्रत्येक निर्णय, नियुक्ति, प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकार-संबंधी प्रश्न की व्यापक संवैधानिक समीक्षा करने लगे, तो न्यायपालिका के सामने मामलों का भारी बोझ आ सकता है।
  • ऐसी स्थिति में न्यायालय को अपनी संस्थागत क्षमता और न्यायिक समीक्षा की व्यापकता के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ सकता है।
  • लेखक का तर्क यह नहीं है कि न्यायपालिका को कार्यपालिका की समीक्षा नहीं करनी चाहिए। बल्कि उनका तर्क यह है कि न्यायिक समीक्षा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए उसकी संस्थागत लागत और संभावित मुकदमेबाजी को भी ध्यान में रखना चाहिए।

स्पष्ट नियम बनाम लचीले मानक

  • लेख का एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक पक्ष औपचारिकतावाद (Formalism) और कार्यात्मकतावाद (Functionalism) की बहस से संबंधित है।
  • औपचारिकतावादी दृष्टिकोण में स्पष्ट, निश्चित और नियम-आधारित संवैधानिक मानकों को महत्त्व दिया जाता है। इसके विपरीत, कार्यात्मकतावादी दृष्टिकोण में किसी संस्था की वास्तविक भूमिका, उद्देश्य, परिस्थितियों और व्यावहारिक परिणामों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
  • लेखक का तर्क है कि यदि न्यायालय बहुत अधिक लचीले और संदर्भ-विशिष्ट मानकों का उपयोग करे, तो प्रत्येक नए मामले में अलग-अलग तथ्य और परिस्थितियाँ न्यायिक समीक्षा के लिए सामने आ सकती हैं। इससे मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है।
  • इसके विपरीत, एक स्पष्ट और सीमित नियम कानूनी अनिश्चितता को कम कर सकता है और संभावित मुकदमेबाजी को सीमित कर सकता है।
  • इसीलिए लेख judicial capacity को इस प्रश्न से जोड़ता है कि न्यायालय किसी संवैधानिक सिद्धांत को किस प्रकार के doctrinal form में व्यक्त करता है।

“Ought Implies Can” : संवैधानिक सिद्धांत का संस्थागत यथार्थवाद

लेख का एक प्रमुख सैद्धांतिक निष्कर्ष है “Ought Implies Can”

  • सरल शब्दों में इसका आशय है कि यदि हम कहते हैं कि न्यायालय को किसी क्षेत्र में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, तो हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या उसके पास ऐसा करने की पर्याप्त संस्थागत क्षमता है।
  • उदाहरण के लिए, यदि न्यायालय से अपेक्षा की जाए कि वह कार्यपालिका की प्रत्येक प्रशासनिक कार्रवाई की गहन संवैधानिक समीक्षा करे, तो यह देखना आवश्यक है कि ऐसी व्यवस्था से कितने नए मुकदमे उत्पन्न होंगे और क्या न्यायालय उन्हें उचित समय और गुणवत्ता के साथ निपटा पाएगा।

इस दृष्टिकोण से लेख संवैधानिक आदर्शवाद को संस्थागत यथार्थवाद (Institutional Realism) से जोड़ता है।

अर्थात् संवैधानिक रूप से वांछित भूमिका और संस्थागत रूप से संभव भूमिका के बीच संबंध को समझना आवश्यक है।

लेखक इसी कारण न्यायिक क्षमता को संवैधानिक सिद्धांत की बहस के केंद्र में लाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।

न्यायिक क्षमता और न्यायिक दक्षता

  • न्यायिक क्षमता को न्यायिक दक्षता (Judicial Competence) से भी जोड़ना आवश्यक है।
  • विधायिका और कार्यपालिका के पास प्रशासन, बजट, विशेषज्ञता और व्यापक सूचनात्मक संसाधन होते हैं। न्यायालय के पास इन क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप से सीमित प्रत्यक्ष अनुभव और प्रशासनिक संसाधन हो सकते हैं।
  • इसलिए कुछ विषयों पर न्यायालय स्वयं यह मान सकता है कि राजनीतिक या प्रशासनिक संस्थाएँ निर्णय लेने के लिए अधिक उपयुक्त स्थिति में हैं।
  • लेकिन लेख इस पारंपरिक तर्क को और आगे बढ़ाता है। वह बताता है कि यदि न्यायालय के पास हर मामले को व्यापक तथ्यात्मक और संस्थागत विश्लेषण के साथ देखने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन नहीं हैं, तो उसकी सीमित क्षमता स्वयं उसके विकल्पों को सीमित कर देती है।

परिणामतः उसे अक्सर दो सीमित विकल्पों के बीच चयन करना पड़ सकता है; कठोर और स्पष्ट नियम अथवा अधिक न्यायिक सम्मान (Deference)

लेखक के अनुसार, दोनों ही विकल्पों की अपनी सीमाएँ हैं। कठोर नियम कुछ परिस्थितियों में अत्यधिक व्यापक या अत्यधिक संकीर्ण हो सकते हैं, जबकि अत्यधिक deference व्यवहार में न्यायिक समीक्षा को बहुत सीमित कर सकता है।

न्यायिक स्वतंत्रता की नई व्याख्या

  • न्यायिक स्वतंत्रता सामान्यतः राजनीतिक दबाव से स्वतंत्रता के रूप में समझी जाती है। लेकिन लेख न्यायिक क्षमता को इससे जोड़कर एक अतिरिक्त संस्थागत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
  • यदि किसी न्यायिक निर्णय से बड़े पैमाने पर मुकदमे उत्पन्न होने की संभावना है, तो न्यायालय की सीमित क्षमता स्वयं उसके निर्णय लेने के विकल्पों को प्रभावित कर सकती है।
  • इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधीश राजनीतिक दबाव में निर्णय लेते हैं। बल्कि यह बताता है कि संस्थागत संरचना और संसाधन न्यायिक निर्णयनिर्माण की संभावनाओं की सीमा निर्धारित करते हैं।
  • लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि judicial capacity को न्यायिक निर्णयों का एकमात्र कारण नहीं माना जाना चाहिए। न्यायिक विचारधारा, कानूनी सिद्धांत, संस्थागत मानदंड और अन्य कारक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा : एक अलग स्थिति

  • लेख में विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा (Foreign Affairs and National Security) को एक महत्त्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा गया है।
  • इन क्षेत्रों में संभावित मुकदमों की मात्रा अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसलिए न्यायालय के पास अपेक्षाकृत अधिक लचीले और संदर्भ-आधारित मानकों का उपयोग करने की गुंजाइश रहती है।

यहाँ judicial capacity model का मूल तर्क स्पष्ट होता है; जहाँ संभावित मुकदमे कम हैं, वहाँ न्यायालय की सीमित क्षमता उतनी बड़ी बाधा नहीं बनती।

इसके विपरीत, जहाँ किसी संवैधानिक सिद्धांत के कारण मुकदमों की बहुत बड़ी संख्या उत्पन्न हो सकती है, वहाँ judicial capacity अधिक निर्णायक constraint बन सकती है।

क्या Judicial Capacity ही न्यायिक निर्णयों का एकमात्र कारण है?

लेख स्वयं इस प्रश्न का सावधानीपूर्वक उत्तर देता है; नहीं।

  • लेखक स्पष्ट करते हैं कि judicial capacity Supreme Court के प्रत्येक निर्णय को समझाने वाला एकमात्र कारक नहीं है। न्यायिक विचारधारा, राजनीतिक परिस्थितियाँ, न्यायिक विनम्रता, न्यायिक क्षमता, संवैधानिक सिद्धांत और अन्य संस्थागत कारक भी निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • इसलिए Judicial Capacity Model को एक व्याख्यात्मक संस्थागत मॉडल के रूप में देखना अधिक उचित है।
  • लेखक विशेष रूप से यह भी स्वीकार करते हैं कि उनका मॉडल अंतिम रूप से सिद्ध नहीं हुआ है और इसके लिए आगे तुलनात्मक तथा अनुभवजन्य शोध आवश्यक है।

निष्कर्ष

Judicial Capacity and Executive Power का मूल योगदान यह है कि यह न्यायपालिका की भूमिका को केवल उसके संवैधानिक अधिकारों के आधार पर समझने के बजाय उसकी संस्थागत क्षमता और संसाधनों के संदर्भ में समझने का आग्रह करता है।

लेख का केंद्रीय तर्क है कि न्यायालयों की क्षमता सीमित है और यह सीमा उनके निर्णयों की संख्या, न्यायिक समीक्षा की व्यापकता तथा संवैधानिक सिद्धांतों के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से उच्च-जोखिम और उच्च-मात्रा वाले क्षेत्रों में न्यायालय को यह विचार करना पड़ता है कि किसी व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप से भविष्य में कितनी मुकदमेबाजी उत्पन्न होगी।

इसी कारण न्यायालय कभी स्पष्ट श्रेणीगत नियमों का उपयोग कर सकता है और कभी न्यायिक सम्मान या संयम की ओर बढ़ सकता है। लेख इस प्रक्रिया को न्यायिक विचारधारा का पूर्ण विकल्प नहीं मानता, बल्कि एक अतिरिक्त संस्थागत व्याख्या प्रस्तुत करता है।

संदर्भ

Coan, A., & Bullard, N. (2016). Judicial capacity and executive power. Virginia Law Review, 102(3), 765-832.


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