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शुम्पीटर का अभिजन लोकतंत्र सिद्धांत

बीसवीं शताब्दी के लोकतांत्रिक सिद्धांत में यदि किसी एक ग्रंथ ने लोकतंत्र की परिभाषा को जड़ से बदल दिया, तो वह जोसेफ एलॉइस शुम्पीटर की कृति “Capitalism, Socialism and Democracy” (1942) है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में लोकतंत्र को “जनता का शासन” माना जाता था, जिसमें जनता स्वयं सामान्य हित (Common Good) को पहचानती है और अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से उसे लागू करवाती है। शुम्पीटर ने इस आदर्शवादी चित्र को अव्यावहारिक और अनुभवजन्य तथ्यों के विपरीत बताया। उनके अनुसार लोकतंत्र कोई आदर्श या लक्ष्य नहीं, बल्कि एक पद्धति (Method) है, जिसके द्वारा राजनीतिक निर्णय लेने वाले नेताओं का चयन होता है।

इसी कारण शुम्पीटर को प्रतिस्पर्धात्मक अभिजनवादी लोकतंत्र (Competitive Elitist Democracy) और लोकतंत्र की न्यूनतम या प्रक्रियात्मक परिभाषा (Minimalist / Procedural Definition) का प्रवर्तक माना जाता है। प्रायः “लोकतंत्र के सिद्धांत” के अंतर्गत शुम्पीटर, डाल, पेटमैन और हैबरमास की तुलना बार-बार पूछी जाती है, इसलिए शुम्पीटर की अवधारणाओं की स्पष्ट समझ अनिवार्य है।

शुम्पीटर: जीवन और बौद्धिक पृष्ठभूमि

  • जोसेफ एलॉइस शुम्पीटर (1883-1950) का जन्म ट्राइश (Triesch), मोराविया में हुआ, जो उस समय ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का भाग था।
  • वे मूलतः अर्थशास्त्री थे और ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्र परंपरा से जुड़े थे। 1919 में वे कुछ समय के लिए ऑस्ट्रिया के वित्त मंत्री भी रहे।
  • 1932 से जीवन के अंत तक वे अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन करते रहे।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: “The Theory of Economic Development” (1911), “Business Cycles” (1939), “Capitalism, Socialism and Democracy” (1942) तथा मृत्यु के बाद प्रकाशित “History of Economic Analysis” (1954)।

  • अर्थशास्त्र में वे उद्यमी (Entrepreneur) की भूमिका, नवाचार (Innovation) और “सृजनात्मक विनाश” (Creative Destruction) की अवधारणा के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • शुम्पीटर का राजनीतिक चिंतन उनके आर्थिक चिंतन से अलग नहीं है। जिस प्रकार बाज़ार में उद्यमी उपभोक्ताओं का समर्थन पाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, उसी प्रकार राजनीति में नेता मतदाताओं के वोट पाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • यही आर्थिक सादृश्य (Economic Analogy) उनके लोकतंत्र सिद्धांत की रीढ़ है। उन पर मैक्स वेबर के “नेतृत्व लोकतंत्र” तथा पैरेटो, मोस्का और मिशेल्स जैसे इतालवी-यूरोपीय अभिजन सिद्धांतकारों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

इनकी पुस्तक “Capitalism, Socialism and Democracy” पाँच भागों में विभाजित है:

  • भाग 1: मार्क्सवादी सिद्धांत (The Marxian Doctrine), जिसमें मार्क्स को पैगंबर, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और शिक्षक के रूप में परखा गया है।
  • भाग 2: क्या पूंजीवाद बच सकता है? (Can Capitalism Survive?), जिसमें “सृजनात्मक विनाश” की अवधारणा आती है।
  • भाग 3: क्या समाजवाद काम कर सकता है? (Can Socialism Work?)
  • भाग 4: समाजवाद और लोकतंत्र (Socialism and Democracy), जिसमें अध्याय 21 “शास्त्रीय लोकतांत्रिक सिद्धांत” (The Classical Doctrine of Democracy) और अध्याय 22 “लोकतंत्र का एक अन्य सिद्धांत” (Another Theory of Democracy) हैं।
  • भाग 5: समाजवादी दलों का ऐतिहासिक रेखाचित्र।

राजनीति विज्ञान की दृष्टि से भाग 4 सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि शुम्पीटर ने शास्त्रीय सिद्धांत के स्थान पर “Another Theory of Democracy” प्रस्तुत की।

शास्त्रीय लोकतंत्र की आलोचना

शुम्पीटर के अनुसार अठारहवीं शताब्दी का शास्त्रीय लोकतांत्रिक सिद्धांत (मुख्यतः रूसो और उपयोगितावादियों से प्रेरित) लोकतंत्र को इस प्रकार परिभाषित करता है: लोकतांत्रिक पद्धति वह संस्थागत व्यवस्था है जिसमें जनता स्वयं मुद्दों का निर्णय करके सामान्य हित को साकार करती है, और यह कार्य वह ऐसे प्रतिनिधियों के चुनाव द्वारा करती है जो उसकी इच्छा को कार्यरूप देने के लिए एकत्र होते हैं। शुम्पीटर ने इस परिभाषा के प्रत्येक तत्व पर प्रश्न उठाया।

1. “सामान्य हित” की अवधारणा का खंडन

शास्त्रीय सिद्धांत मानता है कि एक ऐसा सामान्य हित होता है जिसे प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति तर्क के सहारे पहचान सकता है। शुम्पीटर का उत्तर है कि ऐसा कोई सर्वसम्मत रूप से निर्धारित सामान्य हित (Uniquely Determined Common Good) होता ही नहीं। अलग-अलग व्यक्तियों और समूहों के लिए “सामान्य हित” का अर्थ अलग-अलग होता है, क्योंकि उनके मूल्य ही भिन्न होते हैं। यह मतभेद केवल अज्ञान का परिणाम नहीं, बल्कि मूल्यों के वास्तविक टकराव का परिणाम है, जिसे तार्किक बहस से समाप्त नहीं किया जा सकता।

2. यदि सामान्य हित हो भी, तो भी समाधान एक नहीं

शुम्पीटर आगे कहते हैं कि यदि मान भी लिया जाए कि सब लोग किसी सामान्य लक्ष्य, जैसे स्वास्थ्य या आर्थिक समृद्धि, पर सहमत हैं, तब भी उस लक्ष्य तक पहुँचने के साधनों पर तीव्र मतभेद होंगे। स्वास्थ्य सब चाहते हैं, पर टीकाकरण या शल्य चिकित्सा पर सहमति नहीं होती। अतः व्यक्तिगत नीतिगत प्रश्नों का कोई एक निश्चित उत्तर नहीं निकलता।

3. “सामान्य इच्छा” (General Will) का पतन

जब सामान्य हित ही अनिश्चित है, तो रूसो की “सामान्य इच्छा” की अवधारणा भी आधारहीन हो जाती है। शुम्पीटर के अनुसार शास्त्रीय सिद्धांत की पूरी इमारत इस धारणा पर खड़ी है कि जनता की कोई एक सुनिश्चित इच्छा होती है जिसे प्रतिनिधि केवल लागू करते हैं। जब यह आधार ढह जाता है, तो “जनता का शासन” एक मिथक बनकर रह जाता है।

4. राजनीति में मानव स्वभाव: नागरिक की तर्कबुद्धि पर संदेह

शुम्पीटर की आलोचना का सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद पक्ष यही है। ग्राहम वालस और गुस्ताव ली बॉन जैसे विचारकों की भीड़ मनोविज्ञान (Crowd Psychology) संबंधी खोजों का सहारा लेते हुए वे कहते हैं कि:

  • सामान्य नागरिक अपने दैनिक जीवन, परिवार, व्यवसाय और स्थानीय मामलों में तो जिम्मेदारी और यथार्थबोध के साथ निर्णय लेता है, क्योंकि उनका परिणाम उसे सीधे भुगतना पड़ता है।
  • किंतु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रश्न उसके प्रत्यक्ष अनुभव से दूर होते हैं। इन पर उसकी “यथार्थ की भावना” (Sense of Reality) कमजोर पड़ जाती है।
  • परिणामस्वरूप राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करते ही सामान्य नागरिक का मानसिक प्रदर्शन निचले स्तर पर गिर जाता है। वह ऐसे तर्क करता है जिन्हें अपने निजी हितों के क्षेत्र में वह स्वयं बचकाना मानता। शुम्पीटर के शब्दों का सार यह है कि राजनीति में नागरिक फिर से “आदिम” (Primitive) हो जाता है।

राजनीतिक मुद्दों पर उसकी राय भावनाओं, पूर्वाग्रहों और आवेगों से संचालित होती है, तर्क से नहीं।

5. “निर्मित इच्छा” (Manufactured Will)

जब नागरिक की अपनी कोई सुविचारित राजनीतिक इच्छा नहीं होती, तब यह रिक्तता दूसरों द्वारा भरी जाती है। शुम्पीटर के अनुसार राजनीतिक दल, नेता और हित-समूह विज्ञापन की उन्हीं तकनीकों से जनमत का निर्माण करते हैं जिनसे कंपनियाँ उपभोक्ता की माँग पैदा करती हैं। इसलिए जिसे हम “जनता की इच्छा” कहते हैं, वह अधिकतर राजनीतिक प्रक्रिया का कारण नहीं, बल्कि उसका उत्पाद है। यह एक “निर्मित इच्छा” है, स्वाभाविक इच्छा नहीं।

लोकतंत्र की “प्रक्रियात्मक” परिभाषा

शास्त्रीय सिद्धांत को अस्वीकार करने के बाद शुम्पीटर ने अध्याय 22 में “लोकतंत्र का एक अन्य सिद्धांत” प्रस्तुत किया। उन्होंने लोकतंत्र में जनता और नेतृत्व की भूमिकाओं को उलट दिया। शास्त्रीय सिद्धांत में मुद्दों का निर्णय प्राथमिक था और प्रतिनिधियों का चुनाव गौण। शुम्पीटर के सिद्धांत में प्रतिनिधियों का चुनाव प्राथमिक है और मुद्दों का निर्णय उन चुने हुए नेताओं का काम है।

उनकी प्रसिद्ध परिभाषा का भावार्थ इस प्रकार है:

“लोकतांत्रिक पद्धति राजनीतिक निर्णयों तक पहुँचने की वह संस्थागत व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति जनता के वोट के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष (Competitive Struggle for the People’s Vote) के माध्यम से निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करते हैं।”

इस परिभाषा के प्रमुख तत्व:

  • लोकतंत्र एक पद्धति (Method) है, साध्य (End) नहीं। यह स्वयं में कोई नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि सरकार चुनने की एक प्रक्रिया है।
  • यह एक संस्थागत व्यवस्था (Institutional Arrangement) है, यानी इसकी पहचान संस्थाओं और नियमों से होती है।
  • शक्ति प्रतिस्पर्धा के माध्यम से प्राप्त होती है। यदि नेताओं के बीच वोट के लिए स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा नहीं है, तो व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है।
  • जनता की भूमिका सरकार बनाना (To Produce a Government) है, और आवश्यकता पड़ने पर उसे हटाना भी।
  • शुम्पीटर के अनुसार लोकतंत्र का अर्थ केवल इतना है कि जनता के पास उन व्यक्तियों को स्वीकार या अस्वीकार करने का अवसर हो जो उस पर शासन करेंगे। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि जनता वास्तव में “शासन” करती है।

प्रक्रियात्मक परिभाषा के लाभ (शुम्पीटर के अनुसार)

यह लोकतांत्रिक और गैर-लोकतांत्रिक सरकारों में अंतर करने का एक स्पष्ट और मापने योग्य मानदंड देती है: क्या नेताओं के बीच वोट के लिए खुली प्रतिस्पर्धा है?

  • यह नेतृत्व (Leadership) के महत्व को स्वीकार करती है, जिसे शास्त्रीय सिद्धांत ने अनदेखा किया था।
  • यह समूह हितों और “निर्मित इच्छा” की वास्तविकता को सिद्धांत में स्थान देती है।
  • यह प्रतिस्पर्धा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संबंध को स्पष्ट करती है: वोट के लिए स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा तभी संभव है जब भाषण और प्रेस की पर्याप्त स्वतंत्रता हो।
  • यह बहुमत शासन (Majority Rule) को लोकतंत्र की परिभाषा का अनिवार्य अंग नहीं मानती, जिससे आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाएँ भी लोकतंत्र के दायरे में आ जाती हैं।

नेतृत्व हेतु प्रतिस्पर्धा: बाज़ार का सादृश्य

शुम्पीटर का लोकतंत्र सिद्धांत राजनीति को एक बाज़ार की तरह देखता है:

राजनीतिक दल

शुम्पीटर दल को किसी सिद्धांत पर सहमत लोगों का समूह मानने की बर्क (Burke) की परिभाषा को अस्वीकार करते हैं। उनके लिए दल ऐसे लोगों का समूह है जो राजनीतिक सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष में मिलकर कार्य करने का प्रस्ताव रखते हैं। दल की नीतियाँ और कार्यक्रम वैसे ही हैं जैसे किसी व्यापारिक संस्था के उत्पाद: वे लक्ष्य नहीं, बल्कि वोट पाने के साधन हैं।

मतदाता की सीमित भूमिका और “पिछली सीट से ड्राइविंग”

शुम्पीटर के मॉडल में मतदाता का कार्य चुनाव के दिन नेता चुनने तक सीमित है। चुनाव के बाद मतदाताओं को राजनीतिक कार्य नेताओं पर छोड़ देना चाहिए। वे नागरिकों द्वारा प्रतिनिधियों पर लगातार दबाव डालने, पत्र लिखने या उन्हें निर्देश देने को “राजनीतिक बैक-सीट ड्राइविंग” (Political Back-seat Driving) कहकर हतोत्साहित करते हैं। प्रतिनिधि जनता के प्रवक्ता या प्रत्यायुक्त (Delegate) नहीं हैं; वे स्वतंत्र निर्णयकर्ता हैं जिनका मूल्यांकन अगले चुनाव में होगा।

प्रतिस्पर्धा का स्वरूप

शुम्पीटर स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कभी पूर्ण नहीं होती, जैसे बाज़ार में भी पूर्ण प्रतियोगिता दुर्लभ है। फिर भी “स्वतंत्र वोट के लिए स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा” (Free Competition for a Free Vote) लोकतंत्र की न्यूनतम शर्त है। जहाँ यह प्रतिस्पर्धा बलपूर्वक रोकी जाती है, जैसे सैन्य तख्तापलट या एकदलीय व्यवस्था में, वहाँ लोकतंत्र नहीं है।

लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता की शर्तें

शुम्पीटर यह नहीं मानते कि लोकतांत्रिक पद्धति हर समाज में सफल होगी। उन्होंने इसकी सफलता के लिए चार शर्तें बताईं:

  1. राजनीति का “मानवीय तत्व” उच्च गुणवत्ता का हो: अर्थात् सक्षम और नैतिक व्यक्ति राजनीति में आएँ। इसके लिए वे एक ऐसे सामाजिक वर्ग की आवश्यकता बताते हैं जिसके लिए राजनीति स्वाभाविक व्यवसाय हो।
  2. राजनीतिक निर्णयों का प्रभावी क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत न हो: हर विषय को राजनीतिक निर्णय का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए; न्यायपालिका, केंद्रीय बैंक जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं को स्वायत्तता मिले।
  3. एक सुप्रशिक्षित, स्वतंत्र और प्रतिष्ठित नौकरशाही (Well-trained Bureaucracy) हो, जिसमें कर्तव्यबोध और “एस्प्री द कोर” (Esprit de Corps) हो।
  4. लोकतांत्रिक आत्म-संयम (Democratic Self-control) हो: मतदाता और राजनेता दोनों मतभेदों को सहन करें, हारने वाला पक्ष परिणाम स्वीकार करे, और विपक्ष सरकार को अनावश्यक रूप से अस्थिर न करे।

पूंजीवाद, समाजवाद और लोकतंत्र

ग्रंथ का शीर्षक तीन अवधारणाओं को जोड़ता है, और उनका आपसी संबंध परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है:

  • सृजनात्मक विनाश: पूंजीवाद की मूल गतिशीलता नवाचार है, जो पुरानी संरचनाओं को नष्ट कर नई संरचनाएँ बनाता है।
  • पूंजीवाद का भविष्य: “क्या पूंजीवाद बच सकता है?” इस प्रश्न पर शुम्पीटर का उत्तर नकारात्मक है। किंतु मार्क्स के विपरीत वे मानते हैं कि पूंजीवाद अपनी विफलता के कारण नहीं, बल्कि अपनी सफलता के कारण समाप्त होगा। बड़े निगम उद्यमी की भूमिका को नौकरशाही में बदल देते हैं, और पूंजीवाद द्वारा पोषित बुद्धिजीवी वर्ग स्वयं पूंजीवाद का आलोचक बन जाता है।
  • समाजवाद और लोकतंत्र: शुम्पीटर के अनुसार समाजवाद और लोकतंत्र में कोई अनिवार्य विरोध नहीं है। चूँकि लोकतंत्र केवल एक पद्धति है, इसलिए समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी नेताओं के बीच वोट के लिए प्रतिस्पर्धा संभव है, बशर्ते ऊपर बताई गई शर्तें पूरी हों।

प्रभाव और विरासत

शुम्पीटर की परिभाषा ने युद्धोत्तर राजनीति विज्ञान, विशेषकर व्यवहारवादी (Behavioural) आंदोलन, को गहराई से प्रभावित किया:

  • एंथनी डाउन्स ने “An Economic Theory of Democracy” (1957) में शुम्पीटर के बाज़ार सादृश्य को तार्किक चयन सिद्धांत (Rational Choice Theory) में विकसित किया।
  • रॉबर्ट डाल का बहुलवाद और “बहुतंत्र” (Polyarchy) प्रतिस्पर्धा के तत्व को शुम्पीटर से ग्रहण करता है, यद्यपि वह इसमें सहभागिता और समूह-बहुलता का आयाम जोड़ता है।
  • सैमुअल हंटिंगटन ने “The Third Wave” (1991) में लोकतंत्रीकरण की लहरों को मापने के लिए स्पष्ट रूप से शुम्पीटर की परिभाषा अपनाई।
  • जियोवानी सार्तोरी और एडम प्रेज़ेवोर्स्की जैसे विचारकों ने भी न्यूनतम (Minimalist) लोकतंत्र की परंपरा को आगे बढ़ाया।
  • डेविड हेल्ड ने “Models of Democracy” में वेबर और शुम्पीटर के विचारों को “प्रतिस्पर्धात्मक अभिजनवादी लोकतंत्र” (Competitive Elitist Democracy) मॉडल कहा।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

शुम्पीटर का सिद्धांत जितना प्रभावशाली रहा, उतना ही आलोचना का विषय भी बना:

  • पीटर बैकरक (Peter Bachrach) ने “The Theory of Democratic Elitism: A Critique” (1967) में इसे “लोकतांत्रिक अभिजनवाद” कहकर आलोचना की कि यह लोकतंत्र के नैतिक लक्ष्य, यानी व्यक्ति के आत्म-विकास, को त्याग देता है।
  • कैरोल पेटमैन ने “Participation and Democratic Theory” (1970) में कहा कि शुम्पीटर ने “शास्त्रीय सिद्धांत” का एक काल्पनिक और सरलीकृत रूप गढ़कर उसका खंडन किया। रूसो, जे.एस. मिल और जी.डी.एच. कोल के लिए सहभागिता स्वयं नागरिक को शिक्षित करने वाली प्रक्रिया थी।
  • सी.बी. मैकफर्सन ने “The Life and Times of Liberal Democracy” (1977) में इस मॉडल को “संतुलन लोकतंत्र” (Equilibrium Democracy) या “बहुलवादी-अभिजनवादी-संतुलन मॉडल” कहा और बताया कि यह राजनीतिक बाज़ार को उसी असमानता से ग्रस्त मानता है जो आर्थिक बाज़ार में होती है।
  • जैक वॉकर (1966) ने लिखा कि अभिजनवादी सिद्धांत लोकतंत्र के आदर्श को यथास्थिति (Status Quo) के औचित्य में बदल देता है।
  • नागरिक को अतार्किक मानना एक प्रकार का अभिजातवादी पूर्वाग्रह है; उचित शिक्षा और सूचना से नागरिक की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
  • चुनाव के बीच की अवधि में नागरिक की निष्क्रियता को आदर्श मानना जवाबदेही (Accountability) को कमजोर करता है।
  • यह सिद्धांत यह नहीं बताता कि जब वोट के लिए प्रतिस्पर्धा धनबल और मीडिया पर नियंत्रण से विकृत हो जाए, तब लोकतंत्र का क्या होगा।

समकालीन प्रासंगिकता

आलोचनाओं के बावजूद शुम्पीटर आज भी प्रासंगिक हैं। तुलनात्मक राजनीति में किसी देश को लोकतांत्रिक मानने की पहली कसौटी आज भी “स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी चुनाव” ही है। भारत के संदर्भ में देखें तो चुनावी प्रतिस्पर्धा की तीव्रता, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, पेशेवर चुनाव प्रबंधन और व्यक्तित्व-केंद्रित प्रचार शुम्पीटर के मॉडल की पुष्टि करते दिखते हैं। साथ ही, पंचायती राज, सूचना का अधिकार, सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) और जन आंदोलनों जैसी व्यवस्थाएँ यह भी बताती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं रह सकता, जैसा पेटमैन और हैबरमास तर्क देते हैं। आज “चुनावी लोकतंत्र” (Electoral Democracy) और “उदार लोकतंत्र” (Liberal Democracy) के बीच जो अंतर किया जाता है, वह मूलतः शुम्पीटर की न्यूनतम परिभाषा और उससे आगे की अपेक्षाओं के बीच का अंतर है।

निष्कर्ष

शुम्पीटर ने लोकतंत्र को आदर्शवाद के आकाश से उतारकर यथार्थ की भूमि पर खड़ा किया। उनके लिए लोकतंत्र “जनता का शासन” नहीं, बल्कि “जनता द्वारा अनुमोदित नेताओं का शासन” है। शास्त्रीय सिद्धांत की आलोचना, प्रक्रियात्मक परिभाषा, नेतृत्व हेतु प्रतिस्पर्धा और सफलता की चार शर्तें उनके सिद्धांत के चार स्तंभ हैं। उनकी परिभाषा अपनी सरलता और मापनीयता के कारण अनुभवजन्य राजनीति विज्ञान का आधार बनी, किंतु इसी सरलता ने सहभागी और विमर्शात्मक लोकतंत्र के सिद्धांतों को जन्म भी दिया। अतः समकालीन लोकतांत्रिक सिद्धांत को समझने का कोई भी प्रयास शुम्पीटर से ही आरंभ होता है।

 

UGC NET परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • “Capitalism, Socialism and Democracy” का प्रकाशन वर्ष 1942 है।
  • शुम्पीटर ने लोकतंत्र को “पद्धति” (Method) कहा, साध्य नहीं।
  • परिभाषा: जनता के वोट के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष द्वारा निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करना; यह शुम्पीटर की परिभाषा है।
  • शुम्पीटर ने ग्रंथ के अध्याय 21 में शास्त्रीय सिद्धांत की आलोचना की और अध्याय 22 में “Another Theory of Democracy” दी।
  • “सृजनात्मक विनाश” (Creative Destruction) शुम्पीटर की अवधारणा है।
  • “निर्मित इच्छा” (Manufactured Will) और “राजनीतिक बैक-सीट ड्राइविंग” शुम्पीटर से जुड़े पद हैं।
  • शुम्पीटर के अनुसार पूंजीवाद अपनी सफलता के कारण समाप्त होगा, विफलता के कारण नहीं।
  • डेविड हेल्ड ने वेबर और शुम्पीटर के मॉडल को “Competitive Elitist Democracy” कहा।
  • सी.बी. मैकफर्सन के चार मॉडल: संरक्षणात्मक, विकासात्मक, संतुलन (Equilibrium) और सहभागी। शुम्पीटर का मॉडल “संतुलन लोकतंत्र” है।
  • “The Theory of Democratic Elitism: A Critique” (1967) के लेखक पीटर बैकरक हैं।
  • “Participation and Democratic Theory” (1970) के लेखक कैरोल पेटमैन हैं।
  • “अल्पतंत्र का लौह नियम” रॉबर्ट मिशेल्स ने दिया।
  • “अभिजनों का परिभ्रमण” और “शेर-लोमड़ी” पैरेटो से संबंधित हैं।
  • “शासक वर्ग” (Ruling Class / Political Class) की अवधारणा मोस्का की है।
  • “The Power Elite” (1956) सी. राइट मिल्स की कृति है।
  • “सामान्य इच्छा” और “सबकी इच्छा” का भेद रूसो ने “The Social Contract” (1762) में किया।
  • “बहुमत का अत्याचार” की चिंता जे.एस. मिल और टॉकविल दोनों से जुड़ी है।
  • हंटिंगटन ने “The Third Wave” (1991) में शुम्पीटर की न्यूनतम परिभाषा अपनाई।
  • एंथनी डाउन्स की “An Economic Theory of Democracy” (1957) शुम्पीटर के बाज़ार सादृश्य का विस्तार है।
  • “Plebiscitary Leadership Democracy” मैक्स वेबर की अवधारणा है।

अभ्यास प्रश्न 

1. “Capitalism, Socialism and Democracy” का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?

(A) 1932 (B) 1939

(C) 1942 (D) 1950

उत्तर: (C) 1942। तीसरा संस्करण 1950 में आया, जो शुम्पीटर की मृत्यु का वर्ष भी है।

2. “लोकतांत्रिक पद्धति राजनीतिक निर्णयों तक पहुँचने की वह संस्थागत व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति जनता के वोट के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष द्वारा निर्णय की शक्ति प्राप्त करते हैं।” यह परिभाषा किसकी है?

(A) रॉबर्ट डाल (B) जोसेफ शुम्पीटर

(C) मैक्स वेबर (D) एंथनी डाउन्स

उत्तर: (B)। यह लोकतंत्र की प्रक्रियात्मक (न्यूनतम) परिभाषा है, जो ग्रंथ के अध्याय 22 में दी गई है।

3. निम्नलिखित में से कौन-सी शुम्पीटर द्वारा बताई गई लोकतंत्र की सफलता की शर्त नहीं है?

(A) राजनीतिज्ञों की उच्च गुणवत्ता

(B) राजनीतिक निर्णयों का सीमित क्षेत्र

(C) सुप्रशिक्षित नौकरशाही

(D) नीति-निर्माण में नागरिकों की व्यापक प्रत्यक्ष सहभागिता

उत्तर: (D)। शुम्पीटर व्यापक प्रत्यक्ष सहभागिता के पक्षधर नहीं थे; चौथी शर्त “लोकतांत्रिक आत्म-संयम” है।

4. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए:

सूची-I: (a) पैरेटो (b) मोस्का (c) मिशेल्स (d) सी. राइट मिल्स | सूची-II: (i) Political Parties (ii) The Power Elite (iii) Mind and Society (iv) The Ruling Class

कूट:

(A) a-iii, b-iv, c-i, d-ii (B) a-iv, b-iii, c-ii, d-i

(C) a-iii, b-i, c-iv, d-ii (D) a-i, b-iv, c-iii, d-ii

उत्तर: (A)।

5. सी.बी. मैकफर्सन ने शुम्पीटर के लोकतंत्र मॉडल को क्या नाम दिया?

(A) संरक्षणात्मक लोकतंत्र (B) विकासात्मक लोकतंत्र

(C) संतुलन लोकतंत्र (D) सहभागी लोकतंत्र

उत्तर: (C)। “The Life and Times of Liberal Democracy” (1977) में इसे बहुलवादी-अभिजनवादी-संतुलन मॉडल कहा गया।


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